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Full text of "Hazrat Umar RZ (H)"

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हज़रत उमर (रज़ि०) 


डॉ० कौसर यज़दानी नदवी 


विषय सूची 


क्या? 


रत 9 ्फऊेी ० >:- 


जन्म, लड़कपन और जवानी 


. इस्लाम का विरोध 
. इस्लाम की गोद में 


मक्का में 
मदीना में 


- हजरत अबूबक्र खलीफा बने 
. इराक की विजय 

. कादसिया की लड़ाई 

. दमिश्क्‌ की लड़ाई 


. यरमूक की लड़ाई 

. कुछ महत्वपूर्ण घटनायें 

. अजमी इराक 

. फ़ारस की विजय 

. मिस्र की विजय 

. खलीफा की निर्मम हत्या 

. लड़ाइयों पर एक विहंगम दृष्टि 
- शासन-व्यवस्था 

- हजरत उमर (रजि०) का प्रशासन 
. वित्त-विभाग 

. न्‍्याय-विभाग 

- सेना-विभाग 

. इस्लाम का प्रचार-प्रसार 

. इस्लामी राज्य की जिम्मी प्रजा 
. न्‍्यायप्रिय शासक- 

. आदर्श चरित्र 


ह दो शब्द 

अगर आपने 'विश्व-नायक' और 'हज़रत अबूबक़र' पढ़ी होगी 
तो लेखक की ओर से किया गया आपसे एक वादा भी याद होगा, वह 
यह कि 'इस्लामी इतिहास” पर जुटाई जा रही सामग्री की ये दो 
आर्राम्भिक कड़ियां हैं, तीसरी कड़ी "हज़रत उमर' से सम्बन्धित 
होगी। 

प्रस्तुत पुस्तक 'इस्लामी' राज्य के दूसरे खलीफा- हजरत 
: उमर (र्राज़०) इस्लामी इतिहास को आगे बढ़ाने की ही एक कड़ी है. 
जिसमें हज़रत उमर (रजि०) का पूरा जीवन-चरित्र, आपके 
कारनामे, आपका प्रशासन और आपके -युग का आदर्श लोकतंत्र 
आदि अंकित है और यह सब कुछ इस स्पष्टीकरण के साथ है कि 
हजरत उमर (र्राजु०) की प्राकृतिक क्षमताएं अपनी जगह पर, 
किन्तु इन क्षमताओं को सही रुख पर डालने वाला, इन्हें प्रदीप्तमान 
और आदर्शोन्मुख करने वाला इस्लाम और केवल इस्लाम है। अगर 
इस्लाम न होता और हजरत उमर (राजि०) ने इस्लामी शिक्षाओं को 
अपने जीवन में न उतार लिया होता, दूसरे शब्दों में अगर सच्चे 
स्वामी व पालनहार की कृपा-दृष्टि हजरत उमर (रजि०) पर न हुई 
होती, तो कौन कह सकता है कि, हजरत उमर (रजि०) 
जग-इतिहास में इसी प्रकार प्रसिद्धि पाते, और इतना ऊँचा स्थान 
प्राप्त कर लेते कि आज भी इस ऊंचाई को देखकर लोग स्तम्भित 
रह जाते हैं। 

प्रस्तुत पुस्तक अपने उद्देश्य में कहां तक सफल है, यह तो 

पाठकगण ही बतायेंगे। 


- कौसर यज़दानी 


बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम 
'अल्लाह, दयावान कृपाशील के नाम से' 


जन्म, लड़कपन और जवानी 


इस्लाम के पहले खूलीफ़ा हजरत अबूबक़ (राज ०) बीमार पड़े 
और उनके रोग ने जोर पकड़ा तो लोगों की यही इच्छा हुई कि वह 
अपना उत्तराधिकारी स्वयं ही नियुक्त कर दें, वरन्‌ बाद में मतभेद 
हो सकता हैं। हजरत अबबक्र तो इस मसले पर सोचते ही रहते थे 
उन्होंने इस बारे में वरिष्ठ साथियों से मशावरे किए और इसी नतीजे ' 
पर पहुंचे कि हजरत उमर (र्रजु०) को खलीफ़ा बनाना चाहिए 

कछ लोगों ने, जिन्हें हजरत उमर राज० के स्वभाव की तेजी का 
भय था, अपने इस विचार को अबृबक्र के सामने प्रकट किया, तो 
उन्होंने जवाब दिया कि उमर की सख्ती इस कारण थीं कि वह मेरी 
नरमी को जानते थे। मेरा तजुबां है कि जव मैं गुस्से में होता तो वह 
गुस्सा दूर करने की कोशिश करते, नरमी देखते तो सख्ती का सुझाव 
देते। . 

मशविरे के बाद जब बात पक्की हो गईं तो एक दिन हजरत 
अबबक़ कोंठे पर चढ़े। कमजोरी की वजह से चढ़ने की ताकत नहीं 
थी। उनकी पत्नी हज़रत असमा बिन्त अमीस उन्हें हाथों से संभाले 
हुए थीं। नीचे लोग इकट्ठा थे। हजरत अबूबक़ ने उन्हें सम्बोधित 
करते हुए कहा: 


# 

'क्या तुम उस व्यक्ति को पसन्द करोगे, जिसे मैं 
उत्तराधिकारी वनाऊं? उसे खूब समझ लो। मैं कुसम खाकर कहता 
हूँ कि मैंने सोच-विचार करने में कोई कमी नहीं की है और न ही मैंने 
अपने किसी सगगे-सम्बन्धी को नियुक्त किया है। मैं खत्ताब के बेटे 
उमर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता हूँ, तुम मेरा कहा 
सुनो और मानों।' 

सबने कहा, 'हमने सुना और माना।' 

इसके वाद हजरत अवूब॒क़ नीचे उतर आए। हजरत उस्मान 
(रजि०) को बुलाया और वसीयत लिखवाई, जो इस प्रकार थी- 

'यह अबू क॒हाफ़ा के बेटे अबूबक़् के आखिरी वक्‍त का 
वसीयतनामा है, जबकि वह इस लोक से विदा हो रहा है और 
परलोक में प्रवेश कर रहा है- मैंने उमर इब्न खत्ताब को अपना 
उत्तराधिकारी नियुक्त किया, इर्सालए उनका ह॒कक्‍म' सुनो और 
मानों। अच्छी तरह समझ लो कि इस सम्बन्ध में, अल्लाह, उसके 
रसूल,उसके दीन (धर्म) और स्वयं अपनी और तुम्हारी भलाई का 
हक अदा करने की मैंने भरपूर कोशिश की है। अगर वह न्याय से 
ही काम लें तो उनका पालन करो और वह न्याय से ही काम लेंगे, 
ऐसा मेरा विचार है और मेरा अनुभव भी यही है। लेकिन अगर वह 
न्याय से काम न करें और बदल जायें तो हर व्यक्ति खुद अपनी 
करनी को भोगेगा। वैसे मेरी नीयत ठीक है, आगे की नहीं जानता। 
जो लोग अन्याय करेंगे, वे जल्द देख लेंगे कि वे किस पहलू पर पलटा 

_ खा रहें हैं और तुम पर शांत और अल्लाह की दया व कृपा हो।' 

अपना वर्सायतनामा लिखवाने और पढ़कर ऐलान क़र देने के 
बाद हजरत उमर (र्राज०) को एकांत में बुलाया और जो समझाना 
था, समझाया, फिर हाथ उठाकर दुआ की- 

"हे अल्लाह! मैंने यह नियुक्ति सिर्फ मुसलमानों की भलाई के 


हे 
लिए की है और इस भय को सामने रखकर की है कि इनमें बिगाड़ न 
पैदा हो जाए। मैंने ऐसा काम किया है, जिसे तू अच्छी तरह जानता 
है। मैंने बहुत सोच-विचार के बाद यह राय बनाई है। सबसे अच्छे 
और दृढ़ व्यक्ति को उत्तराधिकारी बनाया है, जो मुसलमानों का 
सबसे बड़ा हितैषी है। मेरे लिए तेरा जो हुक्म आना था, आ चुका 
अब मैं उनको तेरे सुपुर्द करता हूँ। वह तेरे बन्दे हैं और उनकी 
लगाम तेरे हाथ में है। हे अल्लाह! उनके अधिकारियों को योग्य 
बना, उत्तराधिकारी को सन्‍्मार्ग पर चल रहे खलीफ़ाओं में से बना 
और उनकी जनता को क्षमताएं प्रदान कर।' 

इस तरह हजरत उमर (रराज०) इस्लामी राज्य के दूसरे 
खुलीफ़ा चुन लिए गए, वह राज्य, जिसकी नींव पड़े अभी [3 वर्ष भी 
पूरे नहीं हुए थे और जो अभी अपने आरम्भिक काल ही से गुज़र रहा | 
था। * 
जन्म 

यहू वहीं हजरत उमर (राज ०) हैं, जिनकी जन्म-तिथि के बारे 
में कोई बात भरोसे से नहीं कहीं जा सकती। अनुमान है कि हिजरत 
के समय उनकी उम्र लगभग 40 साल रही होगी और मृत्यु के समय 
उनकी उम्र लगभग साठ साल थी। 

हजरत उमर (र्राज़०) जिस वंश से सम्बन्ध रखते थे, बह 
आठवीं पीढ़ी ऊपर पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद (सलल०) के 
बंश से जाकर मिल जाता था। इस प्रकार इनका भी सम्बन्ध क्रैश 
कबीले के एक प्रतिष्ठित वंश से ही था। 

“इनके बाप खृत्ताब अपनी बिरादरी में आदर की दृष्टि से देखे 
जाते थे, बैसे न बहुत ज़्यादा धनी थे और न नौकरों-चाकरों वाले ही, 
फिर भी समाज में उन्हें सम्मान प्राप्त था। वे बड़े वीर और 
पराक्रमी जो थे। 


लड़कपन और जवानी 
' ऐसे बाप के ही लायक बेटे थे हज़रत उमर। 
हजरत उमर (ररज़॒०) का लड़कपन कुछ असाधारण न था। 
आम लड़कों की तरह खेलना-कूदना और अरब की परम्पराओं के 
अनसार जीवन बिताना ही लड़कपन की मुख्य बात थी। 
बाद में उन्होंने लिखना-पढ़ना भी सीख लिया था। 
जव हजुरत उमर (र्राज०) जवान हुए तो जजांन और मक्का 
के आसपास के क्षेत्र में अपने पिता के ऊँट चराने लगे। उस समय 
ऊंटों का चराना क्रैश के जवानों के लिए कोई निदनीय बात.न थी 
. बल्कि बह॒धा इसमें भी लोग गर्व का अनुभव करत थ। 
हजरत उमर (र्राजु०) अपनी जवानी में अपने तमाम सार्थियों 
के मकाबले में आधिक शक्ति रखते थे और कोई भी जवान उनके 
स्वास्थ्य और उनके कद को न पहुंचता था। वे लम्बे बहुत थं। एक 
बार औफ इब्न मालिक ने कछ लोगों को इकट्ठा देखा, जिनमें एक 
व्यक्त सबसे ऊँचा था, इतना ऊँचा कि निगाहें उस पर टिकती न 
थीं। पछा, 'यह कौन हैं? 
जवाब मिला, 'खत्ताब के बेटे उमर। 
हजरत उमर (र्राज०) का रंग सफेद था, जिस पर लाली छायी 
. रहती थी। टांगें लम्बी होने और जिस्म में ताकृत होने से 'व; बहुत 
तेज चलते थे और चाल में यह तेजी उनकी आदत-सी बन गंई थी। 
भी जवानी का आरम्भ ही था कि उन्होंने व्यायाम में 
महारत हासिल कर लीं, मुख्य रूप से पहलवानी में और घुड़सवारी 
में। जब हजरत उमर (र्राज०) मुसलमान हुए तो एक व्यक्ति किसी 
चरवाहे से मिला और बताने लगा- 
तम्हें मालम है वह शक्तिशाली व्याक्त मुसलमान हो गया? ' 


9 

“वही, जो उकाज के मेले में कश्ती लड़ता था?' चरवाहे ने 
पूछा। 

"हां, वही।' उस व्यक्ति ने जवाब दिया। 

घोड़े की सवारी हज़रत उमर (र्राजु०) का बड़ा प्रिय काम था, 
यहां तक कि इसमें उन्हें जीवन भर दिलचस्पी रही। जब वह 
खलीफ़ा थे उसी समय की यह घटना है कि एक दिन वे घोड़े पर 
सवार हुए। एड़ जो लगाईं तो घोड़ा हवा से बातें करने लगा और कई 
रास्ता चलने वाले उसकी चपेट में आते-आते रह गए 

जिस तरह हजरत उमर (र्रज़०) पहलवानी और घड़सवारी 
में माहिर थे, वैसे ही उनकी रुचि कविता में भी थी। वह उकाज 
और उसके अलावा दूसरी जगह के कवियों की कविताएं.सनते। जो 
पद पसन्द आते, उन्हें कंठस्थ कर लेते और उचित अवसरों पर रस 
ले-लेकर पढ़ते। 

अरब की वंशार्वलियों को याद रखने में तो वे पारंगत थे। यह 
गुण उन्हें अपने बाप से मिला (था। 

हजरत उमर (ररज०) बातचीत करने और मन की बांत को 
दूसरों तक पूरे प्रभाव के साथ पहुंचा देने में बड़े दक्ष थे। इसीलिए 
इन्हें क्रैश का दूत बनाकर दूसरे कबीलों को भेजा जाता और 
इसीलिए आपसी झगड़ों में इनके निर्णयों को ऐसे ही मान लिया 
जाता, जैसे इनसे पहले इत्तके बाप के निर्णय मान लिए जाते थे। 

हजरत उमर (र्राज०) मक्का के दूसरे .नौजवानों की तरह,. 

' बल्कि उनसे ज़्यादा ही शराब के रसिया थे और उन्हें . 

अरब-सुन्दारियों से प्रेम करने और प्रेम की पेंगें बढ़ाने का बड़ा शौक 
रहा करता। ये दोनों रुचियां हजरत उमर (राजि०) ही तक सीमित 
नहीं थीं, बल्कि क्रैशी नौजवानों की सामान्य रुचि ही यही थी। 


जब हजरत उमर (रजि०) की जवानी अपनी रंगीनियों 


॥॥॥ 


के साथ विदा होने लगी तो उनके मन में विवाह की इच्छा पैदा हुई। 
संतान अधिक प्राप्त करने के लिए बहु पत्नित्व विवाह उनकी 
वंश-परम्परा थी। इसीलिए उन्होंने भी अपने जीवन में 9 औरंतों से 
विवाह किया जिनसे-2 बच्चे पैदा हुए-आठ लड़के और चार 
लड़कियाँ। 

हजरत उमर (रजि०) अपने बाप की तरह बड़े सख्त और 
तीखे स्वभाव के थे। जवानी में यह स्वभाव और भी स्पष्ट था। 
इसीलिए जब मसलमानों का अमीर (खलीफ़ा) उन्हें बनाया गया तो 
उनकी सबसे पहली दुआ यह थी- 

हे अल्लाह!-मैं सख्त हूँ, मुझे नम्र बना। 

इस प्रकार अभी हजरत उमर (र्रज़०) 26-27 वर्ष ही के थे 
कि हजरत मुहम्मद (सलल०) ने इस्लाम कां आहवान शुरू कर 
दिया। आरम्भ में एक अल्हड़ नौजवान की तरह उन्हें इस्लाम से 
कोई दिलचस्पी न थी, उससे न लगाव था, न वैर ही, लेकिन इस नई 
बात' से उन्हें जिस 'हलचलं' का आभास हो रहा था, उससे उन्हें 
क॒ढ़न जरूर रहती और ' वे मन ही मन कढ़ते रहते। 


॥8 ६ 


इस्लाम का विरोध 


इस्लामी आहवान ज्यों-ज्यों फैलता रहा, हज़रत उमर 
(रजि०) की क॒ढ़न भी बढ़ती रही, यहां तक कि वे इस्लाम के कट्टर 
'शत्रु हो गए। इस्लाम में शक्ति जिस तेजी से पैदा हो रही थी, उमर 
का विरोध भी बढ़ता जा रहा था, यहां तक कि इस्लाम का फैलना 
और बढ़ना, उनकी आंखों में बुरी तरह खटकने लगा। 

इसका कारण यह न था कि इससे उनकी किसी पद-प्रतिष्ठा 
पर आंच आ रही, थी, उनका इस्लाम से वैर केवल इस कारण हो 
गया था कि ' वे 'क्रैश को एक और केवल एक शक्तिशाली कबीला 
बनाए रखना चाहते थे। हज़रत उमर (र्राज०) का वैमनस्य हजरत 
मुहम्मद (सलल०) से निरुद्देश्य भी न था, उन्हें खूब मालूम था कि 
मक्का में आप से अधिक ज्ञान रखने वाला सच्चा और ईमानदार 
व्यक्त कोई नहीं, फिर भी उनका विचार था कि अगर हजरत 
मुहम्मद (सलल०) की बातें मानी जाती रहीं और इस्लाम फैलता 
चला गया तो मक्का की व्यवस्था और शान्ति छिन्‍न्न-भिन्‍न हो 
जाएगी। वह मकके में शांति देखना चाहते थे, क्रैश को एक लड़ी में 
पिरोया हुआ देखना चाहते थे। उनके नजदीक इस्लाम के फैलने का 
अर्थ था, क्रैश की एकता का नष्ट होना, मक्का की 'मान-मयांदा' 
का दो कौड़ी का हो जाना और क्रैश कबीले का बेजान होकर अरब 
के दसरे कबीले का ग्रास बन जाना, मानो आज की परिभाषा में 
हजरत उमर (र्राजु०) को राष्ट्रीयता प्रिय थी और वह राष्ट्र पंर धर्म 
और सिद्धांत को बलि दे देना ही पसन्द करते थे। 


[2 


जब आदमी. कढ़ता है 

यही कढ़न थी, जिसने उनके स्वभाव में उग्रता पैदा कर दी 
थी। इस्लाम को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए वे रोज नई-नई चालें 
सोचने लगे- 

कभी वे" कमजोर मुसलमानों को मारते-मारते बेहाल कर 
देते, उन पर जुल्म का पहाड़ तोड़ देते और कभी इस प्रकार सोचते - 

'आखिर इन बेचारों का अपराध क्या है कि इन्हें सताया जाए, 
मारा और पीटा जाए। अपंराध तो जो कछ है, वह मुहम्मद 
(सल्ल०) और उनके आह्वान का है,ये उसी की जादू भरी बातें तो. 
हैं, जिन्होंने ग़रीबों को उसी का बनाकर रख दिया है। अगर 
मुहम्मद (सल्‍ल०) को खत्म कर दिया जाए तो झगड़ा ही साफ़ हो 
जाए, अशांति की जड़ ही कट जाएं और मक्का फिर से शांति का 
घर बन जाए और एक व्यक्ति का कत्ल, किसी कबीले, बल्कि 
मक्का के तमाम कबीलों की निजात के मुकाबले में महत्व ही क्या 
रखता है, अगर इससे क्रैश की सामाजिक स्थिति और मक्का की 
राष्ट्रीय व्यवस्था को ठीक रखने का मौका मिल जाएं।' 

और कभी सोचते- 

'मुहम्मद (सल्ल०) की बातें बड़ी मनमोहक होती हैं। वे 
लोगों को बड़े सुन्दर ढंग से अपनी बातें समझाते हैं। फिर वह एक 
ऐसा व्यक्त है, जिसे कुरैश ने आज तक झूठ बोलते नहीं देखा, तो ' 
क्या उसे केवल इर्सालए कत्ल कर दिया जाए कि वंह कहता है- 

अल्लाह मेरा पालनहार है' और इर्सालए कहता हैं कि उस पर 
इमान रखता ह! 

कभी सोचने का यह अन्दाज होता- 

उसे कत्ल करने या उससे छटकारा पाने का तरीका क्‍या हो? 
वह तो बनूहाशिम में से है और बनूहाशिम उसके मददगार हैं। फिर 


॥3 


जो लोग उस पर ईमान लाए हैं, जिन्होंने उसकी बातें मान ली हैं 
और उसके साथी बन गए हैं, उनमें ऐसे लोग भी हैं, जिनका 
सम्बन्ध प्रतिष्ठित घरानों से है और बनूहाशिम की तरह उनके 
कुबीले भी उनकी रक्षा व प्रतिरक्षा पर उतारू हैं। देखो ना, अबू बक्र 
और तलहा इब्न उबैदुल्लाह बनू तीममुर्रा से, अब्दुरहमान इब्न 
औफ़ और साद इब्न अबी वकक्‍्कास बनू जुहरा से, उस्मान इब्न 
अफ्फ़ान बनू अब्दशम्स से, अबूउबैदा इब्न जर्राह बनू फहर 
मालिक॑ से और जुबैर इब्न अव्वाम बनू असद से सम्बन्ध रखते हैं 
और इन सबको अपने-अपने क॒बीले में वह स्थान प्राप्त है कि अगर 
इन पर किसी ने हाथ उठाया तो ये क़बीले उनकी मदद जरूर करेंगे। 
अब अगर उमर इनसे, इनके साथ मुहम्मद (सल्ल०) से लड़े और 
क्रैश को इनके खिलाफ भड़काए, तो मक्का में ऐसा गृह-युद्ध छिड़ 
जाएगा, जिसे देखते हुए इस खतरे की कोई अहमियत नहीं रह जाती 
कि मक्का की प्रतिष्ठा को मुहम्मद और मुहम्मद के आहवान से 
आघात पहुंच सकता है। 

ये और ऐसे ही विचार हजरत उमर (रजि०) के मन में जन्म 
लेते रहे और उनके भीतर की शांति को जड़ से उखाड़ फेंकते रहे 
यहां तक कि यह विचार मन में बैठने लगा कि मुहम्मद (सलल०) को 
कत्ल कर दिया जाए और फिर क्रैश की एकता और मक्का की 
प्रतिष्ठा के लिए जो विपदाएं भी झेलनी पड़ें, झेली जाएं। 
विचित्र निर्णय 

ज्यों-ज्यों हज़रत मुहम्मद (सलल०) का सन्देश फैलता जा रहा 
था, हजरत उमर की परेशानी भी बढ़ती जा रही थी, उनका 
मानसिक सन्तुलन बिगड़ता जा रहा था। उन्हें मक्का से प्रेम था. 
मक्का के लोगों से हमदर्दी थी, इसीलिए वे यह देख-देखकर दखी 
होते कि इस्लाम का दामन पकड़ने के बाद मक्कावासी मसलमान 


॥4 


इस्लाम से ऐसा चिमट जाते हैं कि लाख मारो-पीटो, लाख "धमकी 
दो, लेकिन वे इससे विंचलित होने वाले नहीं। उनकी नजर में 
इस्लाम मक्का की शांति भंग करने का कारण बन रहा है और' 
कुबीलागत और जातियत पक्ष लेने के बजाय थोथे 'सिद्धांतपरक' 
भेद-भाव उत्पन्न कर रहा है। 
इसी बीच मुसलमानों को पहुंचाए जा रहे कष्ट व पीड़ा को देख 
कर पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद (सलल०) ने अपने साथियों को 
इसकी इजाजत दे दी, बल्कि उन्हें मशाविरा भी दिया कि वे कहीं और 
चले जाएं, ताकि अपने धर्म पर आसानी से जमे रह सकें। आप के 
कहने पर मुसलमान हब्श की ओर जाने लगे तो हजरत उमर 
' (रजि०) की परेशानी और बढ़ गई। उन्हें मक्का के एक-एक 
व्यक्ति से हमदर्दी थी, उन्हें मुसलमानों का मक्का छोड़ना खलने 
लगा। . वे" भी जुदाई की घबराहट महसूस करने लगे। उम्मे 
अब्दुल्लाह बिन्त अबी हसमा कहती हैं कि- 
खुदा की कसम! जब हम हब्श की ओर हिजरत कर रहे थे, 
उमर आए और मेरे पास खड़े हो गए। वे अभी तक अपने पुराने 
धर्म पर जमे हुए थे और हमें उनकी ओर से बड़े-बड़े कष्ट सहन 
करने पड़ रहे थे। उन्हीं उमर ने मुझ से कहा- उम्मे अब्दुल्लाह! 
क्या (हब्श) जाना तय है?' मैंने कहा- हां, खुदा की कुसम, हम 
जुरूर अल्लाह की फैली जमीन में निकल जाएंगे। तुम लोगों ने हमें 
बहुत सताया, हम पर अन्याय व अत्याचार की अति कर दी, यहां 
तक कि अल्लाह ने हमारे निजात की राह पैदा कर दी।' बोले, 
'अल्लाह तुम्हारे साथ हो।' जैसी विनम्नता मैंने उनमें उस समय 
देखी, वैसी कभी न देखी थी। इसके बाद वे चले गए। 
अपने देश और जाति वालों की इस करुण और दयनीय दशा 
को देखकर उमर का मन पसीज गया और आंखों के सामने अशांति 


॥5 


का एक चित्र.खिच गया। उन्होंने अपने भीतर एक टीस-सी महसूस 
की और उंसी समय तय कर लिया कि किसी निर्णायक कोशिश के 
बिना इस दुखद स्थिति से/छुटकारा सम्भव नहीं। उन्होंने तत्काल ही : 
'राह के कांटे' हजरत मुहम्मद (सलल०) को कृत्ल करने की ठान 
ली। ॥ की 


ए 


इस्लाम की गोद में 


एक दिन सुबह वह कृत्ल ,करने के इरादे से निकल पड़े। 
उन्होंने पहले ही मालूम कर लिया था कि अल्लाह के रसल अपने 
कुछ साथियों के साथ अरकम के मकान में ठहरे हुए हैं। साथियों की 
संख्या लगभग पैंतालीस है। वह निडरु और बहादर तो थे ही आपके 
साथियों की कछ परवाह न कर॑ नंगी तलवार हाथ में लिए चल पड़े ।-. 
उसी ओरे रास्ते में नईम इब्न अब्दुल्लाह मिल गए। उन्होंने पछा- 

कहां को चले?' 

मुहम्मद का किस्सा पाक करने जा रहा हूँ।' उमर बोले 
इसलिए कि यही वह 'विधर्मी' है, जिसने करैशियों में फट डाल दी 
है, उनका धर्म खतरे में पड़ गया है, उनके देवताओं को. ब्रा-भला 
कहा है, मैं आज उसे कत्ल करके ही चैन लंगा। 


खुदा की कृुसम उमर! तुम अपने आपको धोखा दे रहे हो। 
नम ने बताया, क्या तुम यह समझते हो कि अगर तमने महम्मद 
(सलल०) को कत्ल कर दिया तो अब्दे मुनाफ़ के वंश वाले तम्हें 
अकड़ता फिरने के लिए जमीन पर छोड़ देंगे?-- और यह कि अपने 
घर वालों की खबर लो, फिर उनेसे निबटना। 

उमर ने पूछा- 

"मेरे घरवाले कौन?' 

नईम ने जवाब दिया- 
'तुम्हारे बहनोई और.चचेरे भाई सईद इब्ने जैद और तुम्हारी 


+ 


है 


बहन फातिमा बिन्‍्त ख॒त्ताब, अल्लाह की कुसम! वे दोनों मसलमान 
हो चुके हैं और मुहम्मद के धर्म का पालन करते हैं। जाओ, पहले 
उन्हें समझाओ। 
ऐसा सुनते ही उमर का गुस्सा भड़क उठा। वे फौरन अपनी 
बहन के घर पहुंचे। उस समय खब्बाब!इब्न अरत हाथ में पवित्र 
कुरआन लिए सईद और फ़ातिमा को सूरः ताहा पढ़ा रहे थे। 
*उमर की पहुंचाई हुई यातनाओं को कौन नहीं जानता, आहट 
पाते ही ख़ब्बाब एक किनारे हो गए और कुरआन के हिस्सों को 
फातिमा ने छिपा लिया। हजरत उमर ने खृब्बाब की आवाज सन ली 
थी। घर में घसते ही कहने लगे- 
यह 'क्या हो रहा था?' 
कुछ भी तो नहीं।” फ़ातिमा बोलीं। है ह॒ 
नहीं, खुदा की कृसम!' उमर चिघाड़े, 'मुझे मालम हो चका है. 
कि तुम दोनों ने मुहम्मद(सलल०) का धर्म अपना लिया है।' इतना 
कहकर - वे ' बहनोई सईद इब्न जैद पर झपट पड़े। बहन फ़ातिमा 
अपने पति को बचाने दौड़ीं तो उन्हें इतना मारा कि लहूलुहान कर 
दिया। पर धन्य हैं वे दोनों कि इतनीसार पड़ने पर भी उन्होंने अपने... 
धर्म को छिपाया नहीं, साफ़-साफ़ कह दिया- 
हां, हम मूसलमान हो:गए हैं और,अंललांह और उसके रसूल... 
पर ईमान ले आए हैं, कर लो, जो०तुम्हाररा जी-चाहे। 
उमर जैसा बहादर उनकी दृढ़ता/पर चकित रह गया और एक: 
बार फिर सोचने लगा- 


आखिर मुहम्मद(सल्ल०) अपने अनुयायियों में क्या जादू भर - 

. देते हैं और इस्लाम' में वह क्या आकर्षण है कि सहज हीं लोग इंस 
ओर खिंचे चले आते हैं। देखना चाहिए मुहम्मद क्या कहते हैं?' 

वे बहन से बोले 


है. 


देखूँ तो तुम लोग क्‍या पढ़ रहे थें?-तनिक मालूम तो हो कि 
- मुहम्मद क्‍या कहता है? 
हमें तो तुमंसे डर लगता है।"बहन बोलीं।._ * 
डरो नहीं। और <उन्होंने देवताओं की कुसम खाई कि देखकर | 
बापस कर दंगा। फ़ातिमा ने क्ुरआनदे दिया।'पढ़ा.तो मौन,स्तब्ध! 
. हैं, कितनी-महांन व दिव्य वाणी है, निश्चय ही यह महा सत्य 
है!' सोचने लगे, “मुहम्मद सच्चे हैं। आज तक उन्होंने अपने लिए 
भी: एक 'शब्द झूठ नहीं कहां, तो वह झूठ' ही इस दिव्य वाणी वे 
संबंध जग. के पालनहार से कैसे जोड़ देंगे? मुहम्मद सच्चे हैं, वंह 
कभी झूठ नहीं बोल सकते। यहं किताब (कुरआन) भी सच्ची है और 
इसकी बातें भी सच्ची हैं। 
ऐसा सोचते-सोचते हजरत उमर (रजि०) का अन्तर जाग 
उठा। उनका मन उसी वक्‍त हजरत मुहम्मद (सलल०) से मिलने. 
और उनसे मिलकर उनकी बातं सुनने और समझने के लिए बेचैन 
हो उठा। ः 
“। फिर थे; हुजूर (सलल०) से मिलने के लिए!चल पड़े। कैसी 
, विडम्बना है यह! कहां उमर चले थे मुहम्मद. (संल्लं०) को कृत्ल 
'करने और कहाँ अब मुहम्मद (सलल०) हीं की शरण में जाने को 
- तैयार हो गए॥ तलवार हाथ की हाथ में रह गंई, हां! अब उसकी 
धार कुंद हो चुकी .थीं। 
अरंकुम .के द्वार प्रेर पहुंचकर दरवाजा खटखटाया। आवाजे 
सनंकर एक साहंब उठे और किवाड़ से झांककर देखा, हजुरत उमर 
हांथ में तलवार लिए:खड़े-हैं। हजरत उमर (रजि०) जैसे व्यक्ति को | 
इस हालत में देखकंर उनका घबराना स्वाभाविक था। हुजूर सलल० : 
. के पास लौट आए:और आपको पूरी बात बता दी। लोग समझे 
अनहोनी होने वाली है। किसी को क्या पता था कि हजरत उमर 


॥9 

रजि०) के अन्तर में किस प्रकार की भावनाएं हिलोरें ले रही हैं। . 
कौन जानता था, इस्लाम का यह कट्टर विरोधी, इस्लाम की गोद में 
गिरने के लिये बेचैन है। कौन समझ सकता था कि खुली हुई यह 
तलवार .मुहम्मद (सल्लं०) और आपके अनुयायियों पर अब नहीं. 
उठेगी, बल्कि इसकी धार तो अब इंस्लाम-विरोधियों के लिए मुड़ 
चुकी है। यहां तो भय की लहर दौड़ गई, पर अंललाह के अलावा 
और किसी से न डरने वाले अल्लाह के रसूल (सल्लं०) के चेहरे पर 

* कोई प्रतिक्रिया न हुई, उसी शांत-भाव से बोले- ' 

आने दो। 

उन्हें आता देख हजरत मुहम्मद (सल्ल०) उठे, उनकी चादर 
का कोना पकड़ कर ज़ोर से झटका दिया और कहा- 

.._: 'हे खत्ताब के बेटे! तुम किस इरादे से आए हो? अल्लाह की: 
कसम! अगर तुमने अपनी मनमानी की तो अल्लाह का गजब तम- 
पर आ जाएगा। 

हजरत उमर (रजि०) प्रभावित-हुए बिना न रहे। 

'हे' अल्लाह के रसूल!' हज़रत उमर (रजि०) का उत्तर था 
यह, मैं सिर्फ़ इसलिए 'हांजिर हुआ हूं कि अल्लाह, उसके रसल, 
उसकी वह्य (प्रकाशना) पर ईमान ले आऊं। 

. _ अल्लाह के रसूल (सल्ल०) का चेहरा खूशी से खिल उठा।... / 
बेइख्तियार पुकारा उठे-... :- ) 

अल्लाह अक़बर' (अल्लाह ही बड़ा है) ' 

मानो हजरत उमर (रजि०) के मुसलमान होने का ऐलान कर : 
दिया गया। । 


20 


मक्का में 


हजरत उमर (राज्‌०) मुसलमान क्या. हुए; इस्लाम खुलकर 
मैदान में आ गया। निर्भय होकर इस्लाम का प्रचार करना उन्होंने 
अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। हजरत उमर (रजि०) ही के 
कथनानुसार- 


'पंजस रात मैंने इस्लाम कूबूल किया, सोचा कि क्रैश में 
अल्लाह के रसूल (सलल०) का सबसे बड़ा शत्रु कौन है कि मैं उसके 
पास जाऊँ और उसे अपने मुसलमान होने की खुबर सुनाऊँ। दूसरे 
दिन सबह- सवेरे मैंने अबू जहल का दरवाज़ा जाकर खटखटाया। 
वह बाहर आया और मझे देखकर बोला, 'आओ भतीजे! कहो, कैसे 
आना हआ?' मैंने जवाब दिया, 'मैं तुम्हें यह बताने आया हूँ कि मैं. 
अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान ले आया हूँ और गवाही देता हूँ 
कि वे जो कछ कहते हैं, सच कहते हैं।' अब्‌ जहल ने दरवाजा बन्द 
करते हए कहा, 'अल्लाह तुम्हें और तुम्हारी ख़बर को रुसवा करे। 

जब हजरत उमर ने इस्लाम की शरण ली थी, उनके बेटे 
हजरत अब्दल्लाह भी अच्छे-भले बड़े और समझदार हो चले थे। 
उन्हीं अब्दुल्लाह का कथन है कि 'हजुरत उमर (रजि०) को अपना 
इस्लाम प्रकट करने का बड़ा शौक था, साथ ही 'जो अपने लिए 

* पसन्द करो, वही दसरों के लिए भी पसन्द करो” सरीखे भाव के 
अनसार उन्होंने इस्लाम के शुभ सन्देश को दूसरों तंके पहुंचाने में 
भी कोई कसर न. छोड़ी। इसके लिए)वे क्रैश से बराबर लड़ते 
रहते। हजरत अब्दल्लाह कहते हैं, 'जब मेरे पिता ईमान लाए।तो 


4 
पूछा, क्रैश में.सबसे बड़ा बातूनी और ढिढोरची कौन है? कहा 
गया, जमील इब्न आमरुलजमई। उसके पास पहुंचे और कहा, 
'जमील! तुम्हें मालूम है, मैंने इस्लामं कुबूल कर लिया है और मैं 
मुहम्मद (सलल०) के धर्म में दाखिल हो गया हूँ।' खुदा की कृसम! 
उसने एक शब्द न कहा और अपनी चादर घसीटता हुआ चला 
गया। हजरत उमर (रज़ि०) भी उसके पीछे-पीछे हो: लिए। जमील 

. मस्जिद के दरवाजे पर खड़ा हो गया और चिल्ला-चिल्लाकर कहने...” 
लगा, हे क्रैशियो!' क्रैशी उस समय चारों ओर टोलियां बनाए बैठे .. 
थे- तुम्हें मालूम है, उमर विधर्मी हो गया है?” तुरन्त ही हजरत 
उमर (रजि०) ने कहा, 'यह बकता है, मैं तो इस्लाम लाया हूं और 
गवाह बनाता हूं कि अल्लाह के अलावा कोई उपास्य नहीं और 
मुहम्मद (सलल०) उसके बन्दे और उसके रसूल हैं। ' इतना सनते ही. 
क्रैश के लोग उत्तेजित हो उठे और हज़रत उमर (रजि०) से लड़ने लगे, . 
यहां तक कि सूर्य सिर-पर आ गया तो हजरत उमर (रजि०) थक. 
कर बैठ गए, क्रैश उन पर टूटे पड़ रहे थे। हज़रत उमरं-(राजि०), 

* ने उनसे कहा, 'कर लो, जो तुम्हारा जी चाहे, मैं कसम खाकर 
कहता हूं कि अगर हम तीन सौ की तायदाद में होते तो या सब क॒छ 
तुम से ले लेते या सब क॒छ तुम्हारे/लिए/|छोड़ देते।' बाद में एक 
व्यक्ति के बीच-बचाव से उनकी जान बची। 

कहा जाता है कि हजरत उमर (रजि०) ने कई बार अल्लाह के 
रसूल (सलल०) से निवेदन किया कि हे अल्लाह के रसूल (सल्ल०)! 
क्या हम सत्य पर नहीं हैं?'' 

आपने फ़रमाया, हां कुसम है उस सत्ता की, जिसके हाथ में 
मेरी जान है, तुम लोक-परलोक में सत्य पर हो।' 

'फिर यह चोरी क्‍यों?” हजरत उमर (रजि०) ने कहा, 'कृसम 


है उस सत्ता की, जिसने आपको नबी बनाया, हम जरूर ही खुलकर... 


सामने आएंगे। 


22 


हजरत उमर (रजि०) इस्लाम ले आए थे, इर्सालए जरूरी था 
कि.सबको उनके इस्लाम की सूचना मिल जाए; ताकि जो बिग़ड़ना 
चाहे बिगड़ लें और जो लड़ना चाहे लड़ ले। इस पर उपर्यक्त 
.घटनाएं भी गवाह हैं। वे ' शक्तिशाली थे और उन्हें अपनी शक्ति 
पंर भरोसा था, वे .जवान थे और उन्हें अपनी जवानी का मान था। 
वे हिम्मत वाले थे और जानते थे कि उन्हें कोई वश में नहीं कर 
सकता, उन्हें कोई नहीं डरा सकता। यही कारण था कि उन्होंने 
दूसरे मुसलमानों की तरह .छिपकर कोई काम नहीं कियां, बल्कि 
मुसलमानों के साथं काबा में नमाज पढ़ने की कृसम खाई और उस. 
समय जब मुसलमान मक्का के आस-पास की पहाड़ियों में 
छिप-छिपकर नमाज़ें पढ़ते थे। 

हजरत उमर की कुसम पूरी हुई। 

हजरत अब्दुल्लाह इब्न मसऊद कहा करते थे, 'उमर का- 
इस्लाम हमारी विजय, उनकी हिजरत हमारी सफलता और उनका : 
खलीफ़ा होना अल्लाह की कृपा थी। जब तक उमर-इस्लाम नहीं' 
लाए' थे, हम काबा में नमाज नहीं पढ़ सकते थे, पर जब वे 
मुसलमान हुए तो क्रैश को लड़-झगंड़ कर मजबर कर दिया कि 
मुसलमानों को काबे में नमाज पढ़ने सें न रोकें।' वे यह भी कहा 
करते थे कि जब से उमर मुसलमान हुए, हमारा मान बढ़ गया। 


हजरत सुहैब इब्न सिनान्न से. रिवायत है कि जब उमर: 
मुसलमान हुए, इस्लाम खुलकर सोमने आ गया' औंर उसके. 
आह्वान का खुलकर प्रचार किया जाने लगा। हम काबे के चारों 
ओर घेरे बना कर बैठते और अल्लाह के घर का तवाफ करते, वे 
ज़्यादती करने वालों से बदला लेते और क्रूरता दिखाने वाले को मंह- 
तोड़ जवाब देते। 
_* यह सच है कि हज़रत उमर (रजि०) उस समय तक चैन से न. 
' बैठे, जब तक अपने और अपने मुसलमान भाइयों के लिए काबे और 


23 


उसके आस-पास में नमाज पढ़ने के वे तमाम अधिकार न प्राप्त कर 
लिए, जी अंल्लाह के शत्रुओं को अल्लाह के घर में प्राप्त थे। इस ' 
बात ने क्रैश के तमाम कबीलों पर असर डाला। इनमें से बहुतों के 
दिल इस्लाम के लिए-बेचैन थे, पर क्रैश के अत्याचारों और 
शरारतों को देखकर उन्हें भय होता थौं। उन्होंने जब देखा कि. 
हजरत उमर इस्लाम ले आए हैं और उन्होंने अपनी:ताकृत और 
हिम्मत के बल पर क्रैश को इतना आतंकित कर दिया: है कि बिना 
क्िसी बाधा के मुसलमानों के साथ काबे में नमाज पढ़ी जाने लगी है 
' तो उनकी भी हिम्मतें बढ़ीं और वे मुसलमान हो गए, यहां तक कि 
क्रैश ने कहना शुरू कर दिया कि 'उमर और हमजा के इस्लाम ने 
. मुहम्मद के संन्देश को क्रैश के तमाम कबीलों में फैला दिया है। 
क्रैशियों ने इतना प्रचार किया कि मक्का से निकलकर यह खूबर 
हब्श तक पहुँच गई। मक्का के विरोधियों के अत्याचारों से तंग 
आकर जो लोग हब्श. चलेःगए थे, उन्होंने अपने देश को वापस हो 
जाने का इरादा कर लिया, पर अभी वे मक्का के करीब पहंचे ही थे 
कि मालूम हुआ, यह खबर झूठी है और वे वापस चले गएं। केवल 
वही लोग मक्का आए, जिन्हें किसी ने पनाह दी या जो क्रैश से 
आंख बचाकर चुपके से दाखिल हो गएं ः 


सामाजिक बहिष्कार 
क्रैश इस्लाम की इस प्रकांर बढ़ती हुई ताकत से बड़े चिंतित: 
थे। उनके तमाम कबीलों ने मिलकर एक प्रतिज्ञा-पत्र तैयार किया 
'कि बन्‌ हाशिम और बन अब्दुल मुत्तलिब से सामाजिक सम्बन्ध 
काट लिए जाएँ, न उन्हें बेंटी दी जाए, न उनकी बेटी .ली जाए;न. 
उनसे कोई चीज़ खरीदी जाए, न उनके हाथ कोई चीज बेची जाए 
और इस प्रतिज्ञा-पत्र के पालन में दृढ़ रहने के लिए:उसे काबा के 
आंगन में लटका दिया गया। ' * 


24 
इस प्रतिज्ञा-पत्र ने क्रैश और मुसलमानों.-के संघर्ष को चरम 
सीमा पर पहुंचा दिया। यही वह समय था, जो इस्लाम और 
मुसलमानों के लिए बड़ा ही कठोर और कठिन था। इस बहिष्कार के _ 
बाद बनूहाशिम और बनू अब्दुल मृत्तलिब-परिवारों के साथ-साथ 
दूसरे मुसलमान भी 'घाटी अबूतालिब' में चले गये। 3 वर्ष तक इन 
लोगों का जीवन बड़े कंष्ट में बीता, यहां तक कि पत्ते खा-खा कर 
भूख मिटानी पड़ी और वे सूखा हुआ चमड़ा उबाल कर खाने पर 
मजबूर हुए। अन्त में जबं लगातार 3 साल तक बनूहाशिम अपनी 
सहनशीलता, का परिचय कराते रहे तो इन्हीं दुष्टों में से कुछ। को! 
दया" आईं और इस अमानवीय निश्चय को भंग कर दिया गया। 


लेकिन फिर भी शत्रुओं की दमन-नीति में तनिक भी लचक 
'पैदा न हुई। उनके अत्याचार मुसलमानों पर और बढ़ गए और वे 
बह कछ करने लगे, जिसकी आशा भी नहीं की जा सकती थी, यहां 
तक कि पैग॒म्बरे इस्लाम और दूसरे मुसलमानों की जानें भी खतरे में 
रहने लगीं। अन्य मुसलमानों की तरह हजरत उमर (रजि०) को भी 
करैश के हाथों कड़ी: यातनाएँ सहन करनी पड़ीं, पर उन्होंने जिस 
निर्भीकता और बहादुरी के साथ. इन तकलीफों को बर्दाश्त किया, 
बह अपना उदाहरण आप है।.आजमाइश के इस दौर ने हजरत 
उमर (रजि०) कें ईमान को दृढ़ (मजबूत) बना दिया, उनकी 
योग्यताओं को उभार दिया और वह पैग्रम्बरे इस्लाम की नजरों में 
क्रीब से करीबतर होते चले गए। . 
एक ओर क्रैश का विरोध चरम सीमा पर था और दूसरी, 
ओर इस्लाम का प्रचार भी पूरे वेग से हो रहा था, यहां तक कि. 
इस्लाम मक्का से बाहर मदीना पहुंच गया और वहां दो-तीन साल 
के भीतर ही.ऐसा वातावरण बन गया कि हजरत मुहम्मद सल्‍ल० ने 
मक्का के मुसलमानों को वहां चले जाने और मक्का छोड़ देने की 
आम इजाजत दे दी। इस इजाजंत पर हजरत उमर (रजि०) भी 


25 
मदीना को हिजरत कर गए। 
हजरत उमर (रजि०) मदीना के बाहर बसे एक गांव कुबा में 
पहुंचे और बनू अम्न इब्न औफ कबीले में रिफ़ाआ इब्न अब्दुल . 
मुन्जिर के यहाँ ठहरे रहे। बाद में इनके बाल-बच्चे भी यहां आ 
गए। फिर जब अल्लाह के रसूल (सलल०) हजरत अबूबक़ (रज़ि०) 
के साथ हिजरत करके मदीना जाते हुए सबंसें पहले कृबा में पहुंचे 
तो हंज़रत उसर (रजि०) उन लोगों में से थे, जिन्होंने आपका 
स्वागत किया, फ़िर साथ ही मदीना भी गए. 


26 


मंदीना में 


इतिहास में वह दिन अमर हो गया है, जब.मकक्‍का के क्रैशियों 
के अत्याचारों और दमन-चक्र से तंग आकर वहाँ के मुसलमान 
मदीना के शरणार्थी बने। ये शरणार्थी बेघर बार थे, बेधन-दौलत 
थे, अपना सब कछ छोड़कर, त्याग कर जो आए थें, मगर वाह रे! 
इस्लाम का रिश्ता-नाता, मदीनावासी मुसलमानों ने दिल खोलकर 
उनका स्वागत किया, उन्हें किसी भी प्रकार के परायेपन का एहसास 
न होने दिया, न मन में किसी प्रकार के भेद-भाव और पक्षपात को 
जगह बनाने दिया। 

फिर इतिहास का वह दिन कितना शुभ था जब पैग्रम्बरे 
इस्लाम हजरत मुहम्मद (सल्ल०) ने मक्का-परित्याग करने वाले 
मुहाजिरों और मदीनावासी मुसलमानों को बुलाया, उन पर इस्लाम 
की श्रेष्ठता व महानता स्पष्ट की और इस्लाम के सैद्धान्तिक रिश्ते 
को खूनी रिश्ते से भी श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया और उनमें से हरेक को 
अलग-अलग एक-दूसरे का भाई बना दिया। इस तरह जो मुहाजिर 
(मक्का-परित्याग कर आने वाले मुसलमान) जिस अन्सारी (मदीना 
बासी मुसलमान) का भाई बन गया, उसका प्रभाव यह हुआ कि 
अन्सारी ने उसको अपनी .जायदाद, माल-असबाब, नक॒दी आदि 
तमाम चीजों में से आधा-आधा बांट कर दे दिया। इस प्रकार हजरत 
उमर (र्राज०) के इस्लामी भाई उत्बान इब्न मालिक बनाएं गए, जो 
बनी सालिस कबीले के सरदार थे। 


के 


मकक्‍का-परित्याग के बाद मदीना ही में मुसलमानों को कुछ 
सुख-चैन नसीब हुआ था। वहाँ तों जान-माल, इज़्जत आबरू सभी 
खतरे में थी। मदीना में उनकी शॉकत एक जगह जमा हो गई और 
मर्दाना के दो बड़े कृबीले औस व खजरज के इस्लाम कूबूल कर लेने 
के कारण मुसलमानों का मदीना पर आधिपत्य भी हो गया, मानो 
एक छोटे-से राज्य की नींव पड़ गई। वहाँ अब न मक्का जैसा 
आतंक था, न किसी प्रकार का डर-भय। 
इस्लाम में नमाज की हैसियत स्तम्भ की-सी है, लेकिन मक्का 
में एक-एक व्यक्ति का अलग-अलग नमाज पढ़ना भी जोखिम का 
काम था, प्राणों से हाथ धोना था, पर मदीना में जब अपनी ही सत्ता 
थी, समूह व जत्था बन कर नमाज पढ़ने का महत्व तेजी से महसूस 
किया जाने लगा। समस्या थी लोगों को सामूहिक नमाज के लिए 
जमा करने की। लोगों को जमा करने और ऐलान करने का अब तक 
: ज्ञात तरीका पसन्द नहीं आ रहा था। यहूदियों और ईसाइयों के यहाँ 
इबादत के लिए बिगुल और घण्टा बजाने की रस्म थी, इसलिए जब 
“यह समस्या सामने आई तो कुछ लोगों ने यही राय दी, पर प्यारे नबी 
(सलल०) कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे। इतने में हजरत उमर 
(रज०) आ निकले, सूझ-बूझ के व्यक्त थे ही, तुरन्त एक तरीका 
समझ में आया, झट बोल पड़े :- 
"एक आदमी ऐलान करने के लिए क्‍यों न नियुक्त कर दिया 
“जाए? हे 
बुलाने औरःऐलान करने का यह नया तरीका लोगों की समझ 
में फ़ौरन आ गया। बोल नियत कर दिए गए और प्यारे नबी 
(सलल०) ने उसी समय हजरत बिलाल से कहा कि 'अजान' दें-- 
अज़ान के सुगठित और अर्थपूर्ण बोल उसी समय से चल पड़े और 
. 400 वर्ष से ज़्यादा बीत रहे हैं कि ये बोल बराबर उसी ढंग से दिन 


38 
में पाँच बार हर मस्जिद से दुहराए जाते हैं और पास-पड़ोस और 
मुहल्ले के लोग उसी से यह जान जाते हैं कि फ़्लाँ नमाज का वक्त हो 
गया। 


पैगम्बर-काल में हजरत उमर (रजि०) 

मदीनां पहुंचने से लेकर पैगम्बरे इस्लाम की मौत तक शायद 
- ही कोई घटना ऐसी हो, चाहे शासन-व्यवस्था की बात हो या 
राजनीतिक समस्या, समाज-सुधार की बात हो या आर्थिक समस्या, 
धर्म-प्रचार की बात हो या धर्म-विरोधियों से निबटने की समस्या, 
लड़ाई की बात हो या समझौता वार्ता, इनमें से शायद ही कोई मौका 
हो जिसमें हजरत उमर (राजि०) की राय न माँगी गई हो और उनसे 
परामर्श न लिया गया हो। इसलिए कि हजरत उमर (ररजु०) अपनी 
विशेषताओं, अपने गुणों. और अपने कारनामों के कारण पूरे 
मुसलमानों में एक विर्शिष्ट स्थान रखते थे, स्पष्ट ही इस महान 
व्यक्तित्व से आँखें नहीं चुराई जा सकती थीं। 

. बद्र की लड़ाई का मौका था। मुसलमानों की सेना में 399 
सेनानी और शत्रुओं की सेना में नौ सौ पचास व्यक्ति थे। यह 
इस्लाम और कफ्र की पहली लड़ाई थी। मुहाजिरों को अपना 
घर-बार छटने का गम अभी ताजा था.। उनके इस्लाम-विरोधी 
नातेदार व रिश्तेदार ही विरोधी कैम्प की ओर से मुसलमानों से 
लड़ने आए थे। उनके प्रति मोह और रहम का पैदा हो जाना 
स्वाभाविक था, पर हजरत उमर (र्जु०) जैंसा कट्टर सिद्धान्तवादी 
और निर्भीक व्यक्त इसे कैसे सहन. कर सकता था। उन्होंने लड़ाई 
में-बढ़कर सबसे पहले मामा आसी इब्न हिशाम ही का सिर काट 
लिया। स्पष्ट है औरों में भी साहस बढ़ा और फिर मोह और रहम 
को किसी ने राह नहीं दी। धर्म और कर्त्तव्य से नातेदारी हुई और 
पारिवारिक प्रेम को परास्त होना पड़ा। 


29 . 


इस लड़ाई में शत्रु सेना के बहुतं-से लोग गिरफ़्तार.कर लिए 
गए थे। इनकी संख्या लगभग 90 थी और इनमें से अधिकतर तो 
क्रैश के बड़े-बड़े सरदार ही थे। इन सरदारों का इस अपमान व 
'रुसवाई के साथ, पराजय की कालिख लगाए, पकड़ लिया जाना 
अपनी जगह पर बड़ी शिक्षाएँ रखता है। पर सच तो यह है कि 
अपने लोगों का इस अवस्था में पहुंच जाना मुहाजिरों के लिए 
रोमांचकारी भी था और हृदयविदारक भी। पर सिद्धान्तवादी हजरत 
उमर (रजि०) कभी कर्तव्य पर प्रेम की विजय पसन्द नहीं करते थे। 
उन्होंने बड़े निर्भीक भाव से परामर्श दिया कि इनमें से सबको कत्ल 
कर दिया जाना चाहिए और बात तो उस समय बने जब हम में का 
हर व्यक्ति अपने नातेदार को कृत्ल करे। अली, अकील (भाई) की 
गरदन मार दें, हमजा, अब्बास (भाई) का सिर उड़ा दें, और अमक' 
व्यक्ति मेरा-नातेदार है, उसका काम मैं तमाम कर दँ। 

यद्यपि हजरत उमर (राजि०) का यह सुझाव प्यारे नबी को 
जंचा नहीं, मगर इससे उनके स्वाभाविक व सहज गुणों को अवश्य 
देखा जा सकता है। 

* मकका में क्रैश के लोग इस्लाम के श॒त्र थे ही, पर मदीना में 
यहूदियों के जो कुबीले आबाद थे, वे भी सब किसी आंस्तीन के सांप 
से कम नहीं थे, वे युद्ध कला में भी पारंगत थे। अतएव बद्र की 
लड़ाई में जब क्रैश बुरी तरह पराजित हुए तो यही यहूदी उन्हें 
ताना देते हुए कहा करते कि क्रैश लड़ना क्या जानें, हम से मामला 
पड़े तो इनके दाँत खट्टे हों। 

यद्यपि मदीना पहुंचने के ब्राद प्यारे नबीः (सलल०) ने 
राजनीतिक स्तर पर सबसे पहले ग्रहूदियों से समझौता किया कि 
मुसलमानों के विरोधियों की मदद न करेंगे और अगर कोई शत्रु 
मदीना पर हमलाबर हुआ तो मुसलमानों की सहायता करेंगे। मगर 


30 


'बद्र की लड़ाई में मुसलमानों की विजय से उन्हें भय हुआ कि अगर 
मुसलमान जोर पकड़ गए तो हमारी भी खैरियत नहीं, इसलिए 
उन्होंने समझौते का विचार किए बिना ऐसी चालें चलने लगे और 
साज़िश करनी शुरू कर दी, जो खली ब्रगावत्त और इस्लामी राज्य 
के प्रति शत्रुता का प्रदर्शन था। 

उधर बद्र की लड़ाई में क्रैश परास्त हुए थे, वे भी बौखलाए - 
हुए थे और बदला लेने की तैयारी में लगे हुए थे। यहूदियों से 
सांठ-गांठ करके उन्होंने एक बार और मदीना पंर धावा बोल दिया। 
उहुद के मैदान में दोनों ओर सेनाएं इकट्ठी हुईं॥ घमासान लड़ाई 
'शुरू हो गई। पहले मुसलमान जीत रहे थे, फिर पांसा पलट गया 
अफवाह फैल गई, प्यारे नबी (सलल०) शहीद कर दिए गए। इसे 
अफवाह ने मुसलमानों में कई प्रतिक्रयाएं पैदा कीं। एक ख़ेमा सोचने 
लगा, जब रसूल (सलल०) ही न रहे, तो सब बेकार। हजरत उमर 
(रजि०) भी उन्हीं लोगों में से थे। रसूल (सलल०) से अति. प्रेम का ही 
यह नतीजाः था। भावुक थे ही, प्रेम के साथ भावुकता इकट्ठी हो जाए 
तो उसका यही अंजाम होना भी चाहिए। यही कारण है कि जैसे ही 
उन्हें यह सूचना मिली कि प्यारे रसूल (सलल०) जीवित हैं, वे तुरन्त 
आपके पास दौड़े आए। फिर आपके?दर्शन करने के बाद ही उन्हें 
चैन आया। 
यहूदियों की साजिश का जिक्र किया जा चुका है।' यहूदियों के 
एक कूबीले बन्‌ क़ैनकाअ ने बद्र की लड़ाई के बाद ही से हाथ-पांव 
फैलाने शुरू कर दिए थे। स्पष्ट है समझौते का भंग किया जाना. 
किसी भी राज्य के लिए असह्च होता है। उन्हें इस जुर्म में मदीना-से 
निकाल दिया ग्या। 
यहूदियों का दूसरा कृबीला बनू नजीर का था। इनकी भी वही 
रीति-नीति थी। इस्लाम और मुसलमानों के विरोध में उन्होंने कोई 


डा हु 

कसर नहीं उठा रखी थी। साजिश करने में वे बड़ी सरंगर्मी दिखा 
रहे थे। स्पष्ट है उनकी ये गतिविधियाँ भी नहीं सहन की जा सकती 
थीं। इन यहूदियों की साज़िश का हांल यह था कि एक बार प्यारे: 
नबी (सलल०), हज़रत उमर (रजि०) और हजरत अबूबक़ क़े साथ . 
क॒छ बातचीत करने के लिए मुहंल्ले में गए।.-इन लोगों ने अग्र इब्न 

हिजाश नामी एक व्यक्ति को इस पर तैयार किया कि वह छत-पर 

. चढ़कर आपके सिर पर पत्थर की सिल.गिरा दे। वह छत पर चढ़ 

चुका था कि आपको खबर हो गई। आप (सल्ल०) उठकर चलें 

आएं. 

' जब इनकी गतिविधियाँ इस हद को पहुंच गईं! तो आपको 
कहलाना ही पड़ा कि अब समझौता खत्म हो गया है, इसलिए तुम- 
लोग मदीना से निकल जाओ। यह आदेश यहूदियों की उत्तेजना के 
लिए काफ़ी था। उन्होंने निकलने से इन्कार कर दिया और मुकाबले 
की तैयारियां शुरू कर दीं, लेकिन यह मुकाबला उनके कोई काम न 
आ सका। मुसलमानों ने जल्द ही उन पर काबू पा लिया और उन्हें 
मदीना से निकाल दिया गया। इनमें से कुछ तो सीरिया की ओर चले 
गए और कछ खेबर में आबादे हो गए और वहां जाकर अपना 

_आधिपत्य जमा लिया। | 
..._ खैबर पहुंच कर उन्होंने इत्मीनान की सांस ली। वहाँ जब 
उनके पैर जम गएं, तो प्यारे नबी (सल्ल०) और मुसलमानों से 
बदला लेने के बारे में सोचना शुरू कर दिया। सबसे पहले मक्का 
पहुंचे। वहां इस्लाम विरोधी क्रैशं को उत्तेजना दिलाई, 
मुसलमानों के खिलाफ भड़काया, मिलकर इस्लाम के नए राज्य की. 
जड़ काटने की बात कही। इसके बाद अरब के अन्य कुबीलों को 
दौरा किया और उन्हें भी उकसाया। इस प्रकार दौड़-धूप करके पूरे 
अरब में एक ऐसा माहौल पैदा कर दिया जो मुसलमानों को तबाह 
करने पर तल गया। फिर अरब प्रायद्वीप के कुबीलों की एक संयुक्त , , 


32 


सेना तैयार हो गई।- इस सेना में लगभग दस हज़ार सैनिक थे जो सन्‌6 
हिजरी के ईद के महीने में मदीना की तरफ आंधी-त्‌फान की तरह 
बढ़ने शुरू हुए 

प्यारे नबी (सल्ल०) को इस पूरी स्थिति की सूचना बराबर 
मिलती रही। जब सेना को आगे बढ़ने और मदीना पर हमला करने 
की सूचंना मिली तो आपने अपने साथियों से मशविरा किया। यह 
निश्चय किया गया कि आगे बढ़ने के बजाय मदीने के चारों ओर 
खाई खोदकर शत्रुओं का डटं कर.मुकाबला किया जाए। यह वह 
सामरिक चाल थी, जिससे उस समय तक के अरब अनभिज्ञ थे। 
फिर क्या था, खुदाई शुरू हो गई। एक-एक करके तमाम मुसलमान 
खाई खोदने में जुट गए, यहां तक कि मुसलमानों के सरदार मुहम्मद 
(सल्ल०) भी इस मुहिम में उंस समय तक लगे रहे जब तक कि काम- 
ख़त्म न हो गया। अरब कबीलों की सेनाओं ने मदीना को घेर 
लिया। यह घेरा लगभग एक़ माह तक चलता रहा। शत्रु 
कभी-कभी खाई के पार उतरने की कोशिश करते और उतर कर 
हमले पर हमला करते, पर उनका यह हमला बराबर असफल 
किया जाता रहा, इसलिए कि नबी (सल्ल०) ने अपने श्रेष्ठतम 
साथियों को खाई के इधर क॒छ दूरी पर नियक्त कर दिया था कि 
कोई इधर न आने पाए। ये साथी बड़ी म॒ुस्तैदी से मुआइना करते : 
रहते और शत्रु पर नजर पड़ते ही बड़ी बहादरी से उसका सफाया 
कर देते। 

हज़रत उमर (राजि०) भी इसी तरह एक हिस्से पर तैनात थे। 
एक दिन शत्रुओं ने हमले का इरादा किया तो हजरत उमर ने हजरत 


““ 'आबैर के साथ आगे बढ़कर उन्हें रोका और उन्हें तितर-बितर 


किया, एक और दिन शत्रुओं के मुकाबले में उन्हें इतना व्यस्त रहना 
पड़ा कि अस्र की नमाज का वक्‍त ही खत्म होने को आ गया। आपने 


33 


प्योरे नबी (सलल०) के पास आकर निवेदन कियों कि आज शत्रुओं 
ने नमाज तक पढ़ने का मौका नहीं दियां। आपने कंहा: मैंने भी अभी 
तक नमाज नहीं पढ़ी) इन घंटनांओं से हजरत उमर (रंजि०) 
वीरता, शौर्य और इस्लाम के प्रति अथाह निष्ठां का अंदाज़ा लगाया. 
जा सकता है और यहां यह बात भी याद रखने की- है कि वे ये सब 
कछ सिर्फ इस्लाम (सैद्धांतिक जीवंन-व्यवस्था) के लिए कर रहे थे 
न कि किसी कुबीले, गोत्र, नस्ल आदि के हिंत व स्वार्थ की सुरक्षों के 
लिए टी 
ह॒ृदेबिया का समझौता है 

हिजरत के छठे वर्ष प्यारे नबी (सल्ल०) ने अपने सार्थियों के 
साथ काबा की तीर्थ-यात्रा का निश्चय किया। काबा मक्का में है, 
जिसे सैकड़ों वर्ष पहले हजरत इब्राहीमं (औअल०) औरं उनके बेटे 
हजरत इस्माईल (अलै०) ने तौहीदपरस्तों (ऐकेश्वरवादियों) के | 
लिए तैयार किया था, ताकि वे अल्लाह की इबादत व बन्दंगी कर 
सकें। काबा की परिक्रमां के निश्चय से मक्‍्कावासी इस्लाम. 
विरोधियों को भ्रम हो सकता था कि यह नि३चय मक्का पर चढ़ाई 
का बहाना तो नहीं: है। इस भ्रम से बचाने के लिए आपने यह भी | 
हकक्‍म दियां कि कोई व्यक्ति हथियार बाँध कर न चले। 

मदीना से 6 मील॑ की दूरी पर जुलहुलैफ़ा एक जगह है। यहाँ 
'पहुंचने पर हजरत उमर (र्राज०) के दिल में विचार पैदा हुआ कि इस 
तरह चलना उचित नहीं। अतएव वे अल्लाह के रसूल की सेवा में 
उपस्थित हुए, अपना सुझाव रखा। प्यारे रसूल (सल्ल०) ने उनके | 
सुझाव के अनुसार हथियार मंगवा लिए। 

जब मक्का क॒छ ही दूर रह गया, तो मक्का से बशीर इब्न 
सुफ़ियान ने आकर- यह सूचना दी कि क्रैंश के तमाम लांगों ने 


34 


निश्चय किया हैं कि मुसलमानों को मक्का में कृदम न रखने देंगे। 
प्यारे नबी (सल्ल०) ने चाहा कि अपने वरिष्ठ सहयोगियों को दूत 
बनाकर मक्का भेजें, ताक वे जाकर यह बता दें कि मुसलमान 
“केवल तीर्थ-यात्रा के लिए आए हैं, लड़ने के लिए नहीं आए६हैं।. 
इसके लिए हजरत उमर (रज़ि०) याद किए गए, पर हजरत उमर 
(ररज०) ने क्षमा मांग ली। उनका कहना था, क्रैश मेरी जान के 
प्यासे हैं और मेरे वंश में वहाँ मेरा कोई समर्थक मौजूद नहीं है, फिर 
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि हजरत उस्मान (राजि०) को भेजना 
उचित होगा, इसलिए कि उनके नातेदार-रिश्तेदार वहां मौजद हैं। 
प्यारे नबी (सलल०) ने इस सुझाव को बहुत पसन्द किया। 
हजरत उस्मान (राज०) को मक्का भेज दिया गया। क्रैश ने 
हजरत उस्मान -(रराजु०) को रोक लिया और कई दिन तक रोके 
रखा। ऐसी स्थिति में मुसलमानों के दूत का रोक लिया जाना चिन्ता 
का एक विषय बन गया। अफवाह फैल गई कि हज़रत उस्मान 
(ररज०) शहीद कर दिए,गएं। इस अफ़वाह का 'फैलना था कि 
मुसलमानों में उत्तेजना फैल गई। खून का बदला खून से लेंगे 
सरीखी भावनाएँ तेजी से जन्मी। उस समय वहां मौजूद मसलमानों 
की संख्या चौदह सौ थी। तुरन्त ही उन सबसे यह बैअत (प्रतिज्ञा) 
ली गईं और लड़ाई की तैयारी शुरू हो गई। 
किन्तु प्यारे नबी (सलल०) उस समय लड़ाई के लिए तो वहाँ 
गए नहीं थे, इसलिए बेंहत्र यही समझा गया कि समझौते की कोई 
“राह निकाल ली जाए, हजरत उस्मान (रज०) भी उस समय तकं' 
वापस आ चुके थे। 
समझौते में क्रैश का आग्रह था कि प्यारे नबी (सलल०) 
मक्का में हरागज़ दाखिल नहीं हों सकते। बहरहाल बड़ी वार्ताओं के 
बाद इन शतों पर समझौता हुआ कि इस बार मुसलमान उल्टे वापस. 


35 


जाए और अगले साल आएँ, मगर तीन दिन से अधिक न दठढ्रें। 
समझौते में यह शर्त भी थी कि दस वर्ष तक लड़ाई न हो और इसमें 
अगर क्रैश का कोई आदमी अल्लाह के रसूल के यहाँ चला जाए तो 
अल्लाह के रसूल उसे वापस क्रैश के पास भेज दें, पर मुसलमानों 
में से अगर कोई व्यक्ति क्रैश के हाथ लग जाए तो, उनको 
'.अधिकार होगा कि उसे अपने पास रोक लें। 
अन्तिम शर्त प्रत्यक्षतः कुछ अटपटी-सी थी और मसंलमानों 
के हित में नहीं थी, हज़रत उमर (राजि०) विकल हो उठे। अभी. 
समझौता लिखा नहीं गया था कि: वे ' हज़रत अबूबक्र (रजि०) 
“पास पहुंचे और कहा: 
'इस प्रकार दब कर .क्यों समझौता किया जाए?' 
उन्होंने समझाया कि अल्लाह के रसूल (सलल०) जो कछ 
करते हैं, उसी में हित होगा, पर उन्हें सन्‍्तोष न हुआ, स्वयं प्यारे 
नबी (सल्ल०) के- पास: आए और इस तरह बोले- 
है अल्लाह के रसूल (सलल०)! क्या आप अल्लाह के रसूल 
नहीं हैं?' 
यकीनन हूँ। 
क्या हमारे दुश्मन मुश्रिक, नहीं हैं?' 
'अवश्य ही हैं। .,. 2 
. फिर हमं अपने धर्म को क्‍यों अपमानित करें?' , 
"मैं अल्लाह का रसूल हूँ और उसके हक्‍्म-के खिलाफ नहीं 
करता। । 
यद्याप भावावेश के कारण हज़रत उमर (रॉज०) का स्वर 
'तीखा था और बाद में इसपर,बहुत लज्जित भी हुए, मगर इससे उनके 
भीतर की भावनाओं को पढ़ा जा सकता है। 


36 

खली विजय 
.  हुंदैबियों में मुंसलमानों और क्रैश में जो समझौता हुंआ था 
और जिसके बारे में हजरत उमर (रजि०) तक का यह विचार था 
कि यह मुसलमानों के हक्‌ में बुरा हुआ, उसी समझौते के बारे में 
करआन में यह आयत आई':- 

'हमने तम को खुली विजय प्रदान की है। 

बाद के हालात ने सही साबित कर दिया कि अल्लाह की यंह- 
वाणी शत-प्रतिशत सही थी। यह विजय-जिन-जिनं शक्लों में प्राप्त 
हुई, उसे निम्न पंक्तियों से समझा जा सकता है:- ; 

. मुसलमानों और मुशरिकों में संघर्ष. व लड़ाई छिड़ी रहने के 
कारण स्थिति ऐसी पैदा हो गई थी कि दोनों तरफ़ वालों को एक 
दसरे से मिलने का कोई मौका न मिलंता था। इस समझौते ने इस' 
स्थिति को खृत्म कर दिया और मुस्लिम और गैर-मुस्लिम एक दूसरे 
से मिलने लगे। गैर-मुस्लिम बिना किसी झिझक के मदीना आते 
और महीनों वहां रहते। वे देखते कि जिन लोगों के विरुद्ध उनंके मन 
में द्ेष व वैमनस्य समाया हुआ है, वें चरित्र के श्रेष्ठ, आचरण. के 
अनकरणीय, व्यवहार के खरे और विचार के शुद्ध हैं। वे देखंतें कि 
जिससे हमने लड़ाई मोल ले रखी है, उनके मदन में गैर-मुस्लिमों के 
प्रति कोई कपट व घृणा नहीं है, बल्कि उन्हें जिससे घुणा है, वह 
उनके अशद्ध विचार और गलत रस्म व रिवाज हैं।वे देखते, हम तो 
इनके खिलाफ़ इतना प्रोपगन्डा करते हैं, पर ये हमारे साथ अच्छा 
व्यवहार करते हैं- भाई-चारे का व्यवहार,सहानुभूति का व्यवहार 
मानवता का व्यवहार- तो वे प्रभावित हुए बिना न रहते और 
सोचते, ये कैसे लोग हैं और ऐसा इन्हें किस चीज ने बना दिया है? 

2. फिर इस तरह मिलने-जलने से गैर-मुस्लिम के जेहन में 
इस्लाम के प्रात जो गुलतफ़हमियाँ थीं, और उनको जो आपत्तियां थीं . 


37 


उनके बारे में भी आपस में खूब बातचीत का मौका मिलने लगा 
जिंससे इस्लाम का विशुद्ध रूप जब उनके सामने आया, तो उनकी 
आँखें खुल 'गई और वे सोचने लगे कि हम इस्लाम के बारे में कितने . 
धोखे में. डाल दिए गेंए थे, हम अधेरे में थे और हमें रोशनी से 
महरूम कर दिया गया था। इसका नतीजा यह हआ कि उनका मन 
इस्लाम की ओर खिच उठा और वे मसलमान होने लगे। यही कारण 
है कि इस समझौते के बाद केवल डेढ़-दो साल में इतने लोगों ने 
इस्लाम कूबूल किया कि इससे पहले इतनी बड़ी तायदाद में इस्लाम 
कबूल नहीं किया गया था। 

3. ह॒दैबिया के समझौते के बाद जब असल शत्रु ठंडे पड़ गए | 
तो प्यारे नबी (सलल०) को इसका अवसर मिला कि वे इस्लाम का 
प्रचार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कर सकें। इसी भावना के तहत आपने 
बड़े-बड़े राजाओं, महाराजाओं, बादशाहों, जागीरदारों और 
धनी-मानी व्यक्तियों को इस्लाम का परिचय कराने के लिए अनेक 
पत्र लिखे, प्रतिनिधि मंडल भेजीं। इस प्रकार इस्लाम का प्रचार 
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हो गया। 


इन बातों को सामने रख कर यह कहा जा सकता है कि 
ह॒दैबिया का समझौता 'इस्लाम की खुली विजय' था, पर यह बात 
शुरू में हजरत उमर (रजि०) न समझ सके और भावुकता में पड़ 
गए हू 
. _ यहूदियों और खाई की लड़ाई की ख़बर आप॑ पढ़ ही चुके हैं कि. 
यहूदी कृबीला बनू नज़ीर अपनी शरारतों, साजिशों और 
बदगुमानियों के कारण मदीना से निकाल दिया गया था और ये 
यहूदी ख़ैबर में जाकर आबाद हो गए थे। वहीं से इन लोगों ने 
साज़िश रच कर अरब के बहुतं-से कुबीलों को लड़ाई पर तैयार' 
करा लिया था, इन कुबीलों की सेनाओं ने मदीना पर धावा बोल 


38 


दिया था, मगर उन्हें पंराजय का मुंह देखना पड़ा था। इसके बाद भी 
वे अपनी साज़िशों से बाज नहीं आए। बदला लेने के उपाय ढूंढते 
रहे। ः १6 

छठे साल बनू सअद कबीले ने यहूदियों से सहायता की हामी 
भर ली। प्यारे ज़बीं (सलल०) को जब मालूम हुआ तो उसकी 
सरकोबी के लिए हजरत अली (र्राज़ु०) को भेजा। मुस्लिम योद्धाओं 
को देखकर बनू सअद भाग गए। वे अपने पांच सौ ऊंट भी छोड़ 
गए। है 

यहूदियों की साज़िश जारी रही। यहूदियों से निपटने के लिए 
जरूरी था कि उन्हें इसका मजा चखाया जाए। आप अपनी सेनाओं 
को लेकर खैबर की ओर बढ़े। आपके साथ [400 पैदल और 200 
सवार थे। जब आप खैबर की ओर बढ़े तो सबसे पहले गतफ़ान 
कबीले ने अवरोध पैदा करना चाहा। उनसे निबट लिया गया। 

खैबर में यहूदियों ने बड़े-बड़े किले बना लिए थे। इन सब पर 
जल्द-से-जल्द विजय पा ली गई। पर अरब के महान्‌ योद्धा मरहब 
वाले किले पर विजय पाना कठिन हो रहा था। आपने हज़रत 
अबूबक्र (राजि०) को सेनापति बना कर भेजा, पर वे असंफल रहे। 
आपने यह देखकर फरमाया, 'कल मैं ऐसे व्यक्ति को झंडा दूंगा, जो 
हमलावर होग्ा।' अगले दिन तमाम वरिष्ठ साथी झंडा पाने की 
उम्मीद में अस्त्रों से सुसज्जित होकर आएं। इनमें हज़रत उमर 
(ररजु०) भी थे और उनका खुद का बयान है कि मैंने कभी इस मौके 
के अलावा सेनापतित्व की कामना नहीं की थी। यह प्यारे नबी 
(सल्ल०) से अगाध प्रेम व श्रद्धा कां एक अपूर्व उदाहरण है कि नबी 
का झंडा पाने के लिए अपनी जान भी हथेली पर रखना कोई कठिन 
काम न समझते। 


बहरहाल सेनापतित्व॒ का पद हजरत अली (रज़ि०) को मिला 


; 39 
और मरहब हजरत अली (रजि०) ही के हाथों मारा गया और इसी 
के साथ यह लड़ाई खत्म हो गई। खैबर की जमीन सेनानियों में बांट 
दी गई। एक टुकड़ा हजरत उमर (राजि०) के हिस्से में भी आया। . 
हजरत उमर (ररजि०) ने उसे अल्लाह की राह में वकफ़ कर दिया। 
त्याग का यह उदाहरण पहली बार सामने आया और इसकां श्रेय 
हजरत उमर (राज०) ही को मिला। 


मकक्‍का-विजय 

ह॒दैबिया के समझौते के अनुसार कछ कबीलों ने मक्का वालों 
का साथ दिया था और क॒छ मसलमानों के साथ थे। इसमें खजाआ 
कबीला मुसलमानों के साथ हो गया था और कबीला बनी बिक्र वाले 
क्रैश से मिल गए। खुजाआ और बनी बिक्र में वर्षों से लड़ाइयाँ ठनी 
हुई थीं। बीच में कछ वर्षों तक दोनों कुबीले कछ शान्त रहे। पर 
इधर फिर बनूबिक्र ने, खुज़ाआ पर धावा बोल दिया और फिर यह 
कि खूजाआ के खिलाफ बनूबिक्र की क्रैश ने मदद भी की, क्योंकि 
वे पहले ही इस बात पर खूजाआ- से नाराज थे कि उन्होंने करैश की 
इच्छा के विरुद्ध मुसलमानों से क्यों समझौता कर लिया है। अत: यह 
कि दोनों ने मिल कर खूजाआ के कुबीले के लोगों को कत्ल करना 
शुरू कर दिया, यहाँ तक कि जब उन्होंने काबा में शरण लिया, तो . 
वहाँ भी उनको न छोड़ा और उनका खन बहाया। 

क्रेंश का इस तरह मुसलमानों के साथी व मित्र कबीले के 
खिलाफ़ तलवार उठाने का अर्थ ही यह था कि इन लोगों ने ह॒दैबिया 
समझौते की शर्तों पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया है। हुजूर (सलल०) 
को जब यह सूचना मिली तो तुरन्त आपने एक दूत भेजा कि वे ऐसा 
करने से रुकें और इन तीनों शर्तों में से किसी एक को स्वीकार 
करें :- 

[. खुज़ाआ के जो लोग मारे गए हैं, उनका खून बहा दिया 


40 

जाए, या 

2. बनू्‌ बिक्र की सहायता न की जाए, या 

3. इसका ऐलान किया जाए कि ह्॒दैबिया का समझौता भंग 
कर दिया गया। 

क्रैश के सरदारों ने कुरुश की ओर से तीसरी बात स्वीकार 
कर ली। मगर दूत के वापस हो जाने के बाद वे बहुत पछताए और 
अबूसफ़ियान को अपना दूत बनाकर मदीना भेजा कि ह॒र्देविया के 
समझौते को. बहाल किया जाएं, लेकिन हजरत मुहम्मद (सल्ल०) 
'को जो सूचनाएँ मिली थीं और क्रैश के अब तक के रवैये को सामने 
रखते हुए आप (सल्ल०) को इत्मीनान न हुआ और आपने 
अबूसूफ़ियान की बात मातने से साफ़ इन्कार कर दिया। वह उठकर 
हजरत अबृबक़ और हजरत उमर (र्रजु०) के पास गया कि आप 
इस मामले को तय करा दें। हज़रत उमर (र्राज०८) ने इस सख्ती से 
जवाब दिया कि वह बिल्क॒ल निराश हो गया। 

फिर आपने मक्का पर हमला करने की तैयारी शुरू कर दी. 
और इस बात का ध्यान रखा कि मक्का वालों को पता न लगे। ]0 
रमजान को दस हजार की सेनां मक्का की ओर बढ़ी और मक्का 
नगर से कछ दूरी पर रात को पड़ाव डालदिया। करैश को इसकी 
ख़बर न थी। 

* इस्लामी सेना जब मक्का के पास पहँची तो अब सफ़ियान- जो 

छिप कर सेना का अन्दाजा लगा रहे थे, गिरफ्तार करके आप की 
- सेवा में लाए गए। यह वही अबू स॒फ़ियान थे जो अब तक इस्लाम के 
बिरोध में सबसे आगे थे, उन्होंने ही मदीना पर बार-बार हमले की 
योजनाएं बनाई! थीं, यहां तक कि आप को कत्ल करने की खुफिया 
चाल भी चल बैठे थे। ये तमाम बातें ऐसी थीं कि अबू सुफ़ियान को 
तुरन्त कत्ल करा देंना चाहिए था, लेकिन आपने नग्नता का ही 


4] 

व्यवहार किया और कहा :- 

जाओ, आज तुम से कोई पूछ-ताछ न होगी। ईश्वर तम्हें 
क्षमा करे और वह तमाम वयालुओं से बढ़कर दयाल है।' ' 

अबू सुफ़ियान के साथ यह मामला बिल्कल ही अनठा मामला 
था, एक ऐसा मामला जिसे न, आसमान ने देखा,.न जमीन ने। 
पत्थर-से-पत्थर दिल भी इस व्यवहार से न पसीजेगा तो क्‍या 
होगा? अबू सुफियान का मन भी फट पड़ा सत्य की इस करारी 
विजय पर और -वेः मक्का वापस जाने के बजाय वहीं मुसलमान हो 
गए। क्या' इस्लाम की सत्यंता पर अब भी कोई आशंका कर सकता 
है? कैसा सत्य-धर्म है, यह इंस्लाम? 

फिर हजरत अब्बास (र्राजु०) को आज्ञा हुई कि अब सफियान 
- को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर जरा इस्लामी सेना क्रा दश्य 
दिखाएँ। थोड़ी देर बाद इस्लामी सेना जोश भरती हुई आगे बढ़ी। 
सबसे पहली टुकड़ी गिफ़ार कबीले की थी, फिर जहैनिया हजैम और 
सुलैम कबीले हथियारों से लैस, 'क्षल्लाहु अकबर' का नारा लगाते 
हुए आगे निकल गए।- अबू सुफ़ियान हर बार डर जाते। फिर 
अन्सार की टुकड़ी पूरे सज-धज से गुजरी कि पहाड़ी गंज गई उनके 
नारों से! सबसे अन्त में हज़रत मुहम्मद (सलल०) दिखाई दिए 

मक्‍का में बिना किसी बाधा के आपकी पूरी सेना दाखिल हो 
गईं। उसी समय आपने ऐलान कर दिया कि :- 

. जो कोई अपने मकान के भीतर किवाड़ बन्द करके बैठे 
रहे, उसे छोड़ दिया जाए। 

2. जो कोई अबू सुफ़ियान के मकान में चला जाए, उसे भी 
छोड़ दिया जाए। 

« 3. जो कोई काबा में छिपना चाहे, उसे भी छोड़ दिया जाए। 
मगर इस शरण के ऐलान में ऐसे छ: सात व्यक्त अपवाद थे 


42 
जो इस्लाम के विरोध में आगे-आगे थे और जिनका क॒त्ल कर देना 
ही जरूरी था। े 

हुजूर (सलल०) ने जब काबा में प्रवेश किया तो सबसे पहले 
आपका यही हुक्म था कि तमाम मूर्तियां निकाल कर फेंक दी जाएँ, 
वे मूर्तियां जो अनेकेश्वरवाद का परिचय करा रही थीं, वे मूर्तियां 
जिनकी मौजूदगी एक ईश्वर के वजूद को चैलेंज कर रही थीं- हां, 
इन्हीं मूर्तियों, बेजान मूर्तियों, पत्थर की निष्प्राण मूर्तियों को फेंक- 
कर काबा को पवित्र करने का हकक्‍म दिया गया, इर्सालए कि काबा 
की बुनियाद एकेश्वरवादियों ने रखी थी और इर्सालए भी कि वह: 
एक 'ईश्वर' का 'घर' था। इसके बाद नारे लगे, काबा की परिक्रमा 
की गई और वहीं नमाज. पढ़ी जे र्ड। 

यह थी मकक्‍्का-विजय और उँसका उत्सव, न बाजा-गाजा है 
न हुल्लड़वाज़ी, न रंग रलियाँ हैं, न लूटमार, न कत्ल व गारत है, न 
'शान-शौकत, न ही दम्भ व अभिमान की बातें हैं, हां, उनके सामने 
हर समय उनका अपना ध्येय है, अपने अल्लाह के प्रात 
कृतज्ञता-प्रकाशन है, विनग्रता है, सहृदयता है और है एक-दूसरे के 
प्रति सहानुभूति। 

मक्का में दाखिले होने के वाद आप (सलल०) वैअत (इस्लाम की 
राह पर चलने की प्रतिज्ञा) के लिए, हजरत उमर (र्रज़०) को साथ 
लेकर सुनआ नामक स्थान पर गए। वहां भारी संख्या में लोगों ने 
बैअत ली। हजरत उमर (र्राज०) को औरतों की बैअत पर नियुक्त 
कर दिया गया और वे औरतों की वैअत लेने लगे। 

स्वाभाविक था कि इस मक्का-विजाय पर मुसलमान प्रसन्न 
होते, खुशियां मनाते। अभी ये खुशियां मनाई जा रही थीं कि 
हवाजिन।की लड़ाई की घटना घटित हुईं। हवाजिन अरब का प्रसिद्ध 
और प्रतिष्ठित कृबीला था। ये लोग शुरू ही से इस्लाम को 


43 

फलता-फूलता नहीं देखना चाहते थे। 

प्यारे नबी (सल्ल०) जब मक्‍का-विजय के इरादे से मदीना से 
अपनी सेना लेकर चले थे, तभी इन लोगों ने संमझा था कि शायद 
हम पर ये हमला करना चाहते हैं बस फिर क्या था, लड़ाइयों की 
तैयारियां शुरू हो गईं और जब यह मालूम हुआ कि प्यारे नबी 
सलल्‍ल० विजयी होकर मक्का में दाखिल हो गए हैं, तो मक्का ही पर 
धावा बोल देने के लिए पूरे अस्त्र-शस्त्र के साथ हनैन तक आए और 
वहीं डेरे डाल दिए। हुनैन मक्का से लगभग मिली हुई घाटी का नाम 
है। 

आपको जब मालूम हुआ तो बारह सौ की सेना के साथ मक्का 
से चले। हनैन में दोनों सेनाएं भिड़ गईं, लड़ाई शुरू हो गई। शुरू में 
मुसलमानों ही का पलड़ा भारी था, हवाजिन ने हिम्मत हार दी थी, 
पर धन-दौलत के लोभ और लालच ने मुसलमानों को गुनीमत का 
माल बटोरने में व्यस्त कर दिया, इतने में हवाजिन संभल चुके थे। 

उन्होंने तीरों की बारिश शुरू कर दी। मुसलमानों में भगदड़ मच 

गईं। कुछ ही मुसलमान थे जो इस आजमाइश में खरे उतरे, इनमें 
हजरत उमर (र्राज़०) भी एक थे, जिन्होंने अपने धैर्य और पराक्रम 
का श्रेष्ठ प्रमाण जुटा दिया। 

लड़ाई में उतार-चढ़ाव होता ही हैं। घैयंवान मुस्लिम योद्धाओं 
को मुकाबले पर जमा देख कर शेष मुसलमानों का धैर्य बंधा। 
मुसलमान संभल गए। फिर क्‍या था, जम कर लड़ाई हुईं। इस बार 
फिर पासा पलटा और अब मुसलमान विजयी हो गए। .* 

इस लड़ाई में हवाजिन के 600 लोग गिरफ्तार हुए।. 

हिजरत के नवें साल यह खबर मशहूर हुई कि रूमी साम्राज्य 
अरब पर हमले की तैयारियां कर॑ रहा हैं। ऐसी सूचना मिलते ही 
प्यारे नबी सल्‍ल० ने भी मुसलमानों को तैयारी का हक्‍म दे दिया। 


44 
और चूंक यह काफ़ी तंगी का जमाना था, इसलिए लोगों की 
धन-दौलत, अस्त्रो-शंस्त्रों द्वारा सहायता करने पर उभारा गया। 
ज़्यादातर साथिग्रों ने इस सहायता में दिल खोलकर हिस्सा लिया। 
उनमें से हजरत उमर (रराजि०) भी एक थे, जिन्होंने अपने तमाम 
सामानों में से आधा लाकर प्यारे नबी (सल्ल०) के क॒दमों में डाल 
दिया। यह था उनका त्याग और इस्लाम को-आगे बढ़ाने की अमूल्य . 
भावना। हे 

यही साल था जब प्यारे नबी (सलल०) अपनी पत्नियों से रुष्ट 
हो कुर अलग हो गए थे और चूंकि लोगों को इस कार्य से यह गुमान . 
हो गया था कि आपने अपनी तमाम पत्नियों को तलाक दे दी है, 
इसलिए तमाम साथियों को इसका बड़ा दुख था। फिर भी किसी 
व्यक्ति को यह साहस नहीं हो पा रहा था कि आप की सेवा में कुछ 
कहने-सुनने का साहस बटोर पाता। े 

हजरत उमर (र्राज०) ने सेवा में उपस्थित होने की बार-बार 
इजाजत चाही, पर मिल न सकी। अन्त में हज़रत उमर (रजि०) ने 
पुकार कर कहा :- ेृ 

"शायद अल्लाह के रसूल (सल्ल०) का यह विचार है कि मैं 
हफ़्सा (हजरत उमर की बेटी और प्यारे नबी की धर्म-पत्नी) की 
सिफारिश के लिए आया हूं। खुदा की कसम! अगर आप इजाजत दें 
तो मैं जाकर हफ़्सा की गर्दन मार दूं।' 

ऐसा सुनते ही प्यारे नबी (सल्ल०) ने तुरन्त भीतर बुला 
लिया। हज़रत उमर (रजि०) ने पूछा- 

'क्या आपने पत्नियों को: तलाके दे दी?! , 

“नहीं,' आपने फ़र्माया। 

“तमाम मुसलमान मस्जिद में शोकाकल बैठे हैं।! हज़रत 
उमर ने कहा, कहिए तो उन्हें जाकर यह खुशखबरी सुना दूं?” 


45 * 

इस घटना से हजरत उमर (रजि०) के प्यारे नबी (सल्ल०) से: 
करीब होने का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है और इसी से उनके पद 
व स्थान का अनुमान भी लगाया जा सकता है। 

दसवें वर्ष प्यारे नबी (सलल०) ने अन्तिम हज किया। इसमें 
हजरत उमर (रजि०) भी शरीक थे। यह वही हज था जिसमें आपने 
ऐतिहासिक वक्तव्य दिया था और फरमाया था- 

'अरब को गैर-अरब पर और गैर-अरब को अरब पर कोई 
श्रेष्ठता प्राप्त नहीं। तुम सब आदम की औलाद हो और आंदम मिंद्टी 
से पैदा हुए थे। 

'औरतों के मामले में अल्लांह से डरो। तुम्हारा औरतों पर 
और औरतों का तुम पर अधिकार है।' 

'मैं तुममें एक चीज छोड़ जाता हूं। अगंर तुमने उसे मजबती 
से पकड़ लिया तो गुमराह नं होगे और वह है-- अल्लाह की किताब 
यानी कुरंआन। 

इसके बाद प्यारे नबी (सलल०) बीमार हुए और इसी बीमारी 
में आपकी मौत हो . गई। 


46 


हजरत अबूबक्र खलीफा बने 


कैसी थी वह नाजुक घड़ी, अल्लाह के रसूल (सलल०) की 
मृत्यु हो गई है, -पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई है। रसूल की 
एक-एक अदा पर कुर्बान हो जाने वाले परवाने रसूल (सलल०) की 
मृत्यु पर चकित होकर रह गए हैं। कुछ तो यह कहने लगे हैं कि. 
रसूल (सल्ल०) मरे भी या नहीं, यहां तक कि हजरत उमर (रजि०) 
जैसे योद्धा व नेता नंगी तलवार लेकर दरवाजे पर खड़े हो गए हैं. 
और चुनौती दे रहे हैं कि जिस किसी ने कहा कि अल्लाह के रसूल 
(सलल०) की मृत्यु हो गई, उसका सिर धड़ से अलग कर दिया 
जाएगा। यह हजरत उमर (रजि०) की प्यारे नबी (सल्ल०) से 
अपार श्रद्धा व प्रेम का ही परिचायक है। इसी कारण उन्हें यकीन 
नहीं हो पा रहा है कि रसूल (सल्ल०) की भी मृत्यु हो सकती है। 

पर इस नाजुक घड़ी में, अपना संतुलन खोए बिना जब हजुरत 
अबूबक्र (रजि०) ने अपने विशेष स्वर में पुकार-पुकार कर कहना 
शुरू किया- 

'अगर लोग मुहम्मद (सल्ल०) की पूजा करते थे तो इसमें 

शक नहीं कि वह मर गए और अगर खूदा को पूजते थे तो इसमें 

शक नहीं कि वह जिंदा है और कभी. भी न मरेगा। अल्लाह का 
कथन है कि, 'मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। इनसे पहले (ऐसे ही) 
बहुत से रसूल गुजर चुके हैं। 

हजरत अबूबक्र (रजि०) ने अपनी यह बात कुछ इस प्रकार 
रखी कि लोग प्रभावित हुए बिना न रहे, खासतौर पर उन्होंने जो 


था 


आयत. पढ़ी बह कुछ ऐसी जगह पर फिट कर दी थी कि हजरत 
उमर (राजि०) के बेटे हजरत अब्दुल्लाह (रजि०) के कहने के 
मुताबिक हमें तो ऐसा जान पड़ा मानो यह आयत कंभी उतरी ही न 
थी और आज ही उतरी है। 

अभी हजरत मुहम्मद (सलल०) का कफ़न-दफ़न भी न हो 
सका था, हर ओर शोक की लहर दौड़ रही थी, मुहाजिर और दूसरे 
मुसलमान मस्जिदे नबवी में जमा थे कि एक व्यक्ति ने आकर 
बताया कि अन्सार (मदीनावासी) बनू साइदा पंरिवार के मकान में 
खिलाफ़त (राज्य-संचालन) की समस्याओं पर बातचीत करने और 
अपने में से ही किसी को खलीफा (राज्य-संचालक) बनाने के लिए 
इकट्ठा हो रहे हैं। 

सच पूछिए तो यह मुनाफ़िकों (कपटाचारियों) की ऐसी 
जोरदार साज़िश थी कि इस्लाम की साख खत्म हो जाती, इस्लामी 
राज्य की नींब खुद जाती, इस्लामी जीवन-व्यवस्था तहस-नहस हो 
जाती और सबसे बड़ी बात यह कि पैगम्बरे इस्लाम के पैदा होने 
और उनके इस्लामी आंदोलन का वह उद्देश्य ही विफल हो जाता, 
जिसके लिए जान व माल .की क्र्बानियां तक दे दी गई थीं। कैसी 
घातक थी यह साजिश। 

बात यहां तक बढ़ गई थी कि मुहाजिर और अंसार एक-दूसरे 
का खून-खूराब़ा कर बैठते और इस्लाम के उस आदर्श की जड़ कट 
गई होती, जिसने मुसलमानों को एक-दूसरे का भाई बना दिया था 
और उनमें ऐसा प्रेम भर. दिया था कि आज तक वह प्रेम देखने को 
नहीं मिला। वह तो अल्लाह की कृपा थी और इस्लाम के दीप को 
जलता रहना था कि ठीक समय॑ पर हजरत अबूबक़ और हज़रत 
उमर (रजि०) जैसे नेताओं को इस साज़िश का पता चल गया और 
इस साज़िश को खत्म करने के लिए दौड़ पड़े। 


48 

हजरत अबूबक्र (रजि०) के ऊंच-नीच समझाने के बाद भी - 
अन्सांर जो झुंके तो इतना भर कि एक अमीर (प्रधान) हमारा हो 
और ं एक तुम्हांरा। जाहिर है यह सुझाव कंभी भी स्वीकार्य न था 
और मौका भी ऐसा न था कि उसकी कटु आलोचना की जांती और 
भरी सभा में दोषयुक्त वॉतावरणं पैदा कर दिया जाता; जोड़-तोड़ 
की रीति डाल दी जाती; उखाड़-पछाड़ की कोशिशें की जाने लगतीं 
कि मन एक-दूसरे से जुटंने के बजांय/कंटने लगते, प्रेम-भांव पैदा 
होने के बजाय घृणा की भावना-उग्र हो उठती और वही क॒छ होता, 
जिसे मिंटाने के लिए इस्लाम आया. था। परं हजरत अबूबक़ ने ऐसे 
समय में भी दूरदर्शिता दिखाई और ऐसां वक्तव्य दिया कि जिसंने 
इस्लाम की डूबती नैया को उबार लिया। जब कुछ माहौल शांत॑ 
हुआ तो उन्होंने हज़रत उमर और हंजरत अबू उंबैदा (रजि०) जैसे 
बरिष्ठ नेताओं की ओर संकेत करते हुए कहा कि ये लोगं इंस योग्य हैं 
कि इन्हें आप अंपना नेता चुन सकते हैं। इससे इस्लामी राज्य की 
बुनियादें भी मज़बूत होंगी और अरबों को भी इनके नेतृत्व में चलने 
में कोई आपत्ति न होगी। 


इस पर जब सभी राजी हो ग़ए कि वंक्तं की मंसेलहतों के 
तहत मुसलमानों का प्रधान कोई क्रैश ही हो, तो इसंसे पहले ही कि 
लोग हजरत अबूबक़र (रजि०) के बताए नामों पर विचार <ेरें, 
हजरत उमर (रजि०) ने आगे बढ़कंर हजरत अंबूबक्र (रजि०) के 
हाथ में हाथ दे दिया, मानो उन्होंने यह ऐलान करें दिया कि हम में 
सबसे बेहतर हजरत अबूबक्र (रजि०) हैं। फिर कया था, ऐसे. 
व्यक्तित्व के बारे में प्रस्ताव आते ही सर्व संम्मति से उनकां नेतृत्व 
मान लिया गेया। 

फिर हजरत अबूबक़ (रजि०) के साथ हजुरत उमंर (रंजि०) 
का पूरां सहयोग आखिर दम तक॑ चलता रंहा। अपने मुंल्यवांन. 
सुझाव भी देते रहे, अपने परामर्श भी सामने लाते रहे। अगर उनका. 


49 


परामर्श नहीं माना जाता तो उसे वे बड़ी उदारता से सहन कर लेते। 
हजरत अबूबक़ (र्राज०) के समय ही की घटना है कि एक गिरोह ने 
जकात देने से इंकार कर दिया, मानो राज्य के प्रात असहयोग 
आंदोलन छेड़ दिया गया। प्रश्न था क्या किया जाए? बहत से वरिष्ठ 
नेताओं का मत था कि यह मौका पुलिस कार्रवाई का नहीं है, मगर 
हजरत अबूबक़ (रजि०) की राय यह नहीं थी। हज़रत उमर 
(र्राज०) पहले लोगों के साथ थे और इस मामले में हजरत अबूबक्र 
(राजि०) का विरोध करने में सबसे आगे थे, पर हज़रत अबूबक्र 
(रजि०) ने साफ़ जवाब दिया- 


ख़ुदा की कसम! अगर बकरी का एक बच्चा भी, जो अल्लांह 


के रसूल को दिया जाता था, कोई देने से इन्कार करेगा तो उसके 
ख़िलाफ़ जिहाद करूँगा।' 

यद्यपि हजरत अबूबक्र रजि० की इस कठोर नीति का नतीजा 
यह निकला कि थोड़ी-सी चेतावनी के बाद ज॒कात के इन्कारी खुद 
ही जकात लेकर आपके पास हाजिर हो गंए और हजरत उमर 
(राजि०) को हजरत अबूबक्र (राजि०) की दूरद्शिता माननी पड़ी, 
* फिर भी मतभेद होते हुए भी अपनी बात पर आग्रह न करना यह 
स्वयं हजरत उमर (रजि०) की वरिष्ठतां और सहनशीलता ही का 
परिचायक है। 

हजरत, अबूबक्र (रजि०) की खिलाफ़त की मुहृत सवा दो साल 
रही। इसे मुद्दत में जितने भी अहम काम हुए, सब में हज़रत उमर 
(राजि०) की राय जरूर हासिल की जाती, इसलिए हजरत अबबक्र 
(रजि०) का अगर दाढ़िना हाथ कोई था, तो वह हज़रत उमर 
(रजि०) ही थे। यही कारण था कि अपने अन्तिम दिनों में हजरत 
अबूबक्र (राजि०) ने खिलाफ़त का उत्तराधिकारी अगर किसी को 
समझा था तो वह हजरत उमर रजि० थे। 


50 

फिर भी देहांत के समय-उन्होंने जनमत जानने के लिए वरिष्ठ 
साथियों से मशावरा किया। सबसे पहले हजरत अब्दुर्रहमान इब्न 
औफ को बुलाकर पूछा। उन्होंने कहा, 'उमर की योग्यता में दो राय 
नहीं, पर तनिक स्वभाव में उग्रता है।' 

'उनमें उग्रता इंसलिए थी कि मैं-नम्न थाँ, जब जिम्मेदारी आ 
पड़ेगी तो 'वेः स्वतः नम्न हो जाएँंगे। -हजरत अबबक्र ने स्पष्ट 

किया। री 

फिर हजरत उस्मान (रॉज०) को बुलाकर पूछा, 

उन्होंने कहा, 'मैं इतना कह सकता हूं कि उमर (रजि०) का 
अन्तर वाह्थ से अच्छा है और हम लोगों में उनकी बर[बरी का कोई ' 
नहीं। 

जब यह चर्चा आगे बढ़ी कि हज़रत अबूबक्र (राजि०) हजरत 
उमर (र्राजु०) को खलीफ़ा बनाना चाहते हैं, तो कुछ लोगों को 
आर्पत्ति हुईं। हज़रत तलहा (रजि०) ने हजरत अबूबक़र (रजि०) से 
जाकर पूछा- 

आपके मौजद रहते हजरत उमर (राजि०) का हम लोगों के 
साथ क्या बर्ताव था। जब वह स्वयं खलीफ़ा होंगे तो जाने क्या 
करेंगे? अब आप अल्लाह के यहां जा रहें हैं, यह सोच लीजिए, उसे 
आप क्‍या जवाब देंगे?” 

'मैं अल्लाह से कहूंगा कि मैंने तेरे बन्दों पर उस व्यक्ति को 
सरदार नियुक्त किया, जो तेरे बन्दों में, सबसे बेहतरं था।'अबूर 
बक्र ने कहा। ' ह 

फिर हजरत उमर (रज०) को खलीफ़ा नियुक्त कर दिया | 
गया। 


5 


इराक की विजय 


हज़रत अबूबक़ (राजि०) की मृत्यु ऐसे समय में हुई थी कि. 
अरब के विर्धर्मियों और नबूवत के झूठे दावेदारों का खात्मा हो चका 
था, मगर सीमावर्ती झड़पों और बाहरी ताकतों के आक्रमणों का मंह 
तोड़ जवाब देने के लिए सैनिक कार्रवाइयों का क्रम अभी शरू ही 
हुआ था, इसलिए हजरत उमर (राजि०) को सबसे पहले इन अधरे 
कामों को पूरा करने में जुटना पड़ा। 

फ़ारस-राज्य का चौथा युग, जो सासानी-युग कहलाता है 
न्यायप्रिय बादशाह नौशेरबां की वजह से अधिक प्रसिद्ध था। प्यारे 
नबी (सलल०) के समय में उसी का पोता परवेज राज-गही पर बैठा. 
था। उसके मरते ही राज्य में अशान्ति, अव्यवस्था फैल गई। कई 
बादशाह एक-एक करके गद्ठी पर बैठते-उतरते रहे, यहाँ तक कि 
आखिरी बादशाह उर्द शेर दरबार ही के एक बड़े अधिकारी के 
हाथों कृत्ल कर दिया गया। इस अधिकारी की बादशाहत भी कछ 
अधिक समय तक न चली, उसे भी कत्ल कर दिया गया। 

गद्दी की छीना-झपटी ने पूरे राज्य में एक उहापोह जैसी (स्थिति 
पैदा कर दी थी। 

हजरत अबूबक्र (राज०) के खिलाफ़त-काल में हज़रत 
मुसन्‍ना ने एक सेना लेकर इराक्‌ पर आक्रमण किया था। फिर 
हजरत अबूबक़र .(राजि०) ने हजरत खालिद (राज०) को उनकी 
सहायता के लिए भेजों। खालिद ने इराक के तमाम सीमावर्ती क्षेत्रों 


52 

पर विजय प्राप्त कर ली और हियरा पर विजय-पताका फहरा दी। 
यह स्थान कुफा से तीन मील दूर है। 

हजरत खालिद (राजि०) ने पूरे इराक पर विजय प्राप्त कर ली 
होती, लेकिन चूंकि इधर शाम (सीरिया) की मुहिम चल रही थी 
और जिस जोर-शोर से वहां ईसाइयों ने लड़ने की तैयारियां.की थीं, 
उसके मुकाबले का वहां पूरा सामान न था। 

ऐसी स्थिति में हज़रत अबूबक़ (रॉज०) ने हजरत खालिद 
(रजि०) को आदेश भेज दिया था कि वह तुरन्त शाम (सीरिया) को 
रवाना हो जाएँ और मुसन्‍ना को इराक के लिए अपना उत्तराधिकारी 
बनाते जाएँ।. खालिद उंधर गए और इधर इराक में सैनिक 
कार्रवाइयां रुक गँयीं। 

हजुरत उमर (रजि०) खलीफा हुए तो उन्होंने सबसे पहले 
इराक की मुहिम पर हीं ध्यान दिया और मुसन्‍ना की सहायता के 
लिए सेना में भर्ती पर जोर देना शुरू कर दिया। मस्जिद के आंगन में 
एक झंडा गाड़ा गया, ताकि लोग इसके तले जमा हों, लोग 
गिरोह-दर-गिरोह जमा तो हुए, हज़रत उमर (राज०) ने नसीहत 
भी की। पर लोगों में कुछ तो ईरानियों का आतंक ऐसा छाया हुआ . 
था कि उसका प्रभाव शून्य के वराबर ही रहा, कुछ लोगों के मन में ; 
ऐसा विचार जम गया था कि इराक. पर विजय हजरत. खालिद 
(राजि०) ही के द्वारा सम्भव है, मुसन्‍्ना द्वारा नहीं। _ 

ऐसे मौके पर हजरत मुसन्‍्ना (राजि०) भी मौजूद थे। उन्होंने 
' बड़े दर्द भरे स्वर में बोलना शुरू किया 

मेरे मुसलमान भाइयों !-मैंने मजूसियों को आजमा लिया है, वे ' 
मैदान के आदमी नहीं हैं। इराक के बड़े-बड़े जिलों को हमने जीत 
लिया है और अजमी (ग़ैर-अरबी) हमारा लोहा मान गए हैं। 

इस भाषण का लोगों? पर बड़ा असर पड़ा। फिर हजरत उमर , 


53 
(रजि०) ने बड़ा ही उत्साहवर्द्धक संभाषण किया, जिसने लोगों में 
एक उमंग भर दी। लोग भर्ती होने पर तैयार हो गए। उपस्थित 
जनों में अबू उबैद सकृफी भी थे, जो कुबीला सकीफ़ के मशहूर 
सरदार थे। वे जोश में आकर उठ खड़े हुए और कहा कि 'इस काम 
के लिए मैं हाजिर हूँ।' 

उनकी देखा-देखी एक भीड़ लग गई और सेनानियों की संख्या 
एक हजार तक पहुंच गई। हजरत उमर (राजि०) ने अबू उबैद को 
उनका सेनापति नियुक्त कर दिया। लोगों ने कहा कि उनका सरदार 
या तो क्रैश में से नियक्त किया जाए या मदीनावासियों में से किसी 
व्यक्ति को यह सेवा सौंपी जाए, मगर हजरत उमर (रजि०) ने साफ़ 
इन्कार कर दिया और कहा कि:-- 

अबू उबैद सबसे पहले व्यक्ति हैं, जो इस झंडे तले आ मौजूद 

हुए, इसलिए इस मुहिम की सरदारी के वही हकदार हैं, फिर अबू: 
उबैद को ताकीद की कि उन लोगों से जिन्हें प्यारे रसूल (सलल०) 
का साथी होने का सौभाग्य प्राप्त है, हर मामले में मर्शावरा कुर 
लिया करना।' 


रुस्तम की तैयारियां 

. हजरत अबूबक्र (रजि०) के समय में इराक्‌ पर जो हमला 
हुआ था, उसने ईरानियों को चौंका दिया था। अतएव ईरान के 
बादशाह पूरान दखुत ने प्रसिद्ध योद्धा रुस्तम को इस ध्येय के लिए 
और उसे युद्ध-मंत्री नियुक्त करके. कहा कि अब तू ही हार-जीत का 
मालिक है। यह कह कर उसके सिर पर ताज रखा और दरबारियों 
को ताकीद की कि रुस्तम का हर हक्‍म माना जाए। चूंकि फ़ारस के 
लोग अपनी फूट और आपसी उखाड़-पछाड़ का फल भोग चुके थे, 
उन्होंने दिल- से उसके आदेशों का पालन किया। परिणाम यह 
निकला कि थोड़े ही दिनों में प्रशासन की बहुत-सी खारमियां दूर हो 


54 


गईं:और राजा ने फिर वही शक्ति प्राप्त कर ली, जो परवेज के 
समय में उसे प्राप्त थी। 


रुस्तम ने युद्ध-मंत्री होते ही सबसे पहला काम यह किया कि 
इराक के जिलों में हरकारों को दौड़ा कर मुसलमानों के खिलाफ़ खूब 
प्रोपेगणडा किया। अपनी जनता में उत्तेजनां भरने के लिए 
तरह-तरह की मन गढ़न्त कहानियां सुनाईं कि मुसलमान इतने 
जालिम, इतने लुटेरे, इतने बदमाश हैं, फिर उसने धर्म-भावना 
जगा कर उसे मुसलमानों का दुश्मन बना दिया। इसका नतीजा यह 
निकला कि अबू उबैद के वहाँ पहुंचने से पहले ही उन स्थानों पर भी 
वहां की जनता मुसलमानों के खिलाफ़ हो गईं, जो पहली मुहिमों में 
मुसलमानों के हाथ लग चुके थे यहाँ तक कि वे जगहें उनके कब्जे से 
निकल गईं 

इधर रुस्तम बड़े जोर-शोर से मुसलमानों के मुकाबले की 
तैयारियां कर रहा था, उधर पूरान दख़्त ने उसकी सहायता के लिए 
भारी सेना भी तैयार कर ली। नरसा और जापान की सेनार्पाति और 
कमांडिग अफसर नियुक्त किया। जापान इराक का एक मशहूर 
रईस था और अरबों से उसे विशेष बैर था। नरसी किसरा (ईरानी 
बादशाह) का मौसेरा भाई था। ये दोनों सरदार विभिन्‍न रास्तों से 
इराक की तरफ बढ़े। 

मुसन्‍ना हियरा तक पहुंच चुके थे कि शत्रु की तैयारियों का 
हाल मालूम हुआ। मसलहत जान कर खिफ़ान की ओर हट आए 
और वहीं डेरे डाल कर अबू उबैंद की सेनाओं का इन्तिज़ार करने 
लगे। अबू उबैद एक महीने के बाद हियरा पहुंचे। थकन दूर होने के 
बाद अबू उबैद ने दोनों टुकड़ी की सरदारी अपने हाथ में ले ली। 

जापान उस समय नमारक में पड़ाव डाले हुए था। अबू उबैद 


55 


ने अपनी सेनाओं के साथ इस जोर से जापान पर आक्रमण किया कि 
अथक प्रयत्नों के बावजूद उसकी सेना के पैर उखड़ गए। जापान 
पकड़ा गया, पर इसके पकड़ने वालों के न पहचानने के कारण 
चालाकी से उन्हें दो जवान सेवक देकर अपने को छुड़ा लिया। बाद 
में लोगों ने जापान को पहचाना तो शोर मचाया कि हम ऐसे शत्रु को 
छोड़ना नहीं चाहते। मामला अबू उबैद के सामने पेश हुआ, आपने 
उदारता दिखाते हुए उसे छोड़ दिया और कहा, इस्लाम में वचन का 
भंग कर देना जायज नहीं। 

इसके बाद अबू उबैद ने फ़रात नदी को फ़ौरन पार कर 
जोरदार धावा बोल दिया, जहाँ नरसी. सेना लिए पड़ा था। घमासान 
की लड़ाई हुई, नरसी हार गया और अपने दूसरे साथियों संहित - 
गिरफ्तार कर लिया गया। इस विजय से लूट का बहुत-सा माल 
'हाथ लगा। इन वस्तुओं में एक प्रकार की खजूर भी थी, जो केवल 
. सम्राट किसरा के लिए. जुटाई गई थी। ये खजूरें बिना किसी 
भेद-भाव के सेना में बांट दी गईं और पांचवां भाग (खुम्स) हज़रत 
उमर (रजि०) की सेवा में भेज दिया गया। 

अबू उबैद ने हजरत उमर (रजि०) को एक पत्र भी लिखा कि . 
यह फल जो अल्लाह ने अपनी कृपा से हमें भेजा है, कंवल ईरानी 
बादशाहों के लिए मुख्य है। मैं सिर्फ़ इस मकसद से के फल को : : 
आपकी खिदमत में भेज रहा हूं कि आप इसे देखें, इसे खाएँ-और 
अल्लाह का शुक्र .अदा करें, जिसने हम बंदुदुओं को"यह फल, जिसे 
बादशाह खाते हैं, दिखा दिया है। 

नरसी के-गिरफ़्तार हो जाने के बाद आस-पास के सरदारों ने 
भी अपनी हार स्वयं ही मान ली और इस्लामी राज्य के अधीन रहना 
स्वीकार कर. लिय्ां। उन्होंने अबू उबैद के सम्मान में भोज देना 
चाहा, पर अबू उबैद ने यह कहकर इन्कार कर दिया कि हम लोग 


56 हे 

वही खाते हैं, जो हमारे सिपाही खाते हैं। इस जवाब पर अन्ततः उन 
लोगों ने पूरी सेना के खाने का इन्तजाम किया। 

रुस्तम के लिए यह स्थिति असह्य थी। उससे ईरानियों की 
हार देखी न गई। वह और भी उत्तेजित हो उठा और उसने एक 
भारी सेना मुसलमानों से लड़ने के लिए भेज दी। इस सेना में चार 
हजार सैनिक थे और मर्दानशाह को सेनापति नियुक्त किया गया 
था। उस समय कियानी परिवार का साया शुभ मुहूर्त समझा जाता 


. था।-दरफ्श कियानी, इस परिवार की यादगार था। वह उसके सिर 


पर साया किए हुए था, ताकि उसे निश्चित रूप से विजय मिल सके।. 
पर अन्ध-विश्वास से कहीं समस्याएं हल हुआ करती हैं? 

मुरौहा नामक स्थान पर दोनों सेनाओं ने पड़ाव डाल दिए। 
फरात नदी बीच में थी। बहमन मर्दानंशाह की उपाधि थी। उसने - 
अबू उबैद को सन्देश भिजवाया कि 'हम उतर कर उस पार आएँ 
या आप आएँगे?' ह 

अबू उबैद के तमाम सरदारों का मशावरा था कि सामरिक. 
दृष्टि से यहां से हटना भूल होगी, पर योद्धा अबू उबैद को यह राय 
साहस और बहादुरी के खिलाफ लगी। सरदारों से कहा, यह नहीं हो 
सकता कि मजूसी (अग्नि पूजक ईरानी) हमसे वीरता में आगे निकल 
जाएँ। सन्देशवाहक ने मौका ग़नीमत समझा और अरबों को 
लज्जित करने के लिए कह सुनाया अरब कायर हैं, वे लड़ना क्या: 
जानें। फिर क्या था। अबू उबैद उत्तेजित हो उठे और तमाम अरब 
सरदारों की राय के खिलाफ़ नदी को पार करने का फैसला सुना 
दिया। मुसन्‍ना और सलीत बड़े नामी जनरल थे, उन्होंने इस प्रस्ताव 


का कड़ा विरोध किया और खुल कर कह दिया कि इस पर अमल 


करने से प्री सेना श हो जाएगी, पर उनकी सुनी -अनसनी कर दी 
गईं। आखिर किरश्तियों का पुल बांधा गया और पूरी सेना पार उतर 


कर शत्रु सेना से भिड़ गई। उस ओर का मैदान बड़ा तंग और 


57 


असमतल था, इर्सालए मुसलमानों को मौका नहीं मिल सका कि 
- ग्ेना को तरतीब दे सकें। 

इंरनी सेना का दृश्य दिल दहला देने वाला था। भयानक 
हाथियों की पंकक्‍्तयां बड़ा ही भयावह दृश्य पेश कर रही थीं। हौदों 
में बड़े-बड़े घंटे रखे हाए.थे, जो बड़े जोर से बज रहे थे। अरब के 
घोड़ों ने यह भयानक दृश्य कभी देखा ही न था। बिदक कर पीछे हो 
रहे।. अबू उर्वद ने देखा, हाथियों के सामने कुछ जोर नहीं चलता। 
घोड़े से कूद पड़े और साथियों को ललकारा कि वीरो! हाथियों को 
बीच में लो और हौदों को सवारों सहित उलट दो। 

जब मुसलमानों ने, जो सिर से कफ़न बांध कर घर से निकले 
थे, अपने सरदार का आदेश सुना, त्रन्त घोड़ों से कद पड़े और हौदों 
की रस्सियां काट-काट कर हाथी वालों को जमीन पर गिरा. दिया 
मगर हाथी जिस ओर झुकते थे, पंकक्‍्त की पंक्ति पीस डालते थे। 
उनमें एक सफ़ेद हाथी भी था, जो सबका सरदार था, हजुरत उबैद 
उस पर आक्रमण कर बैठे। सूंड पर ऐसी ज़ोरदार तलवार मारी कि 
मस्तक से अलग हो गई। हाथी उत्तेजित हो उठा। वह झपटा और 
बढ़ कर उनको जमीन पर गिरा दिया और छाती पर पाँव रखकर 
उनकी हड्डियां चूर-चूर कर दीं। 

अबू उदैद की मृत्यु के बाद उनके भाई हकम ने सेनापतित्व 
सम्भाला और उसी हाथी पर हमलावर हुए, जिस पर अबू उबैद ने 
हमला' किया था। अबू उबैद की तरह उनको भी पांव में लपेट कर 
उसने मसल डाला। इस तरह सात आद॑मियों ने सेनापतित्व संभाला, 
झंडे हाथ में लिए और लड़ते-लड़ते मारे गए। अन्त में मसन्‍्ना ने 
झंडा हाथ में लिया, किन्तु उस समय लड़ाई का नक्शा बदल चका 
था और सेना में भगदड़ मच चुकी थी। मुख्य बात यह थी कि एक 
व्यक्ति ने दौड़ कर पुल के तख््ते तोड़ दिए कि कोई व्यक्त भाग कर 


58 

जाने न पाएं। पर लोग इतने बदहवास होकर भागे थे कि पुल की 
ओर रास्ता न मिला तो नदी में कृद 'पड़े। मुसन्‍ना ने दोबारा पुल- 
बंधवाया और सवारों का एक दस्ता भेजा कि भागने वालों को- 
इत्मीनान से पार उतार दे। स्वयं बची-खुची-सेना के साथ शत्रु का 
आगा रोक कर खड़े हो गए और इस जमाव के साथ लैड़े कि ईरानी : 
जो मसलमानों को दबाते आ रहे थे, रुक गए और आगे न बढ़ सके। 
फिर भी हिसाब किया गया तो मालूम हुआ कि नौ हजार सेना में से 
केवल तीन हज़ार सैनिक बाकी रह गए हैं। े 

इस्लामी इतिहास में युद्ध-सथल से पलायन की घटना बहुत 
कम घटित हई है और अगर कभी घटना घटित हुई भी तो इसका 
बड़ा ही दखद प्रभाव पड़ा है। इस लड़ाई में जिन लोगों को यह 
रुसवाई नसीब हुई थी। वे मुह्त तक बद्दुओं की तरह मारे-मारे 
फिरते रहे और.मारे शर्म के अपने घरों को नहीं गए। प्रायः रोया 
करते और लोगों से मुँह छिपाते थे। 


'बवैब की घटना. 

हजरत उमर (रजि०) ने पूरे शान्त-भाव से इस खबर को 
सना। किसी भी वीर-साहसी व्यक्ति के लिए पराजय की खबर 
उसकी वीरता और साहस में वृद्धि का कारण ही बनती है। खलीफा 
उमर (रजि०) के साथ भी यही हुआ। वातावरण में उत्तेजना थी ही. 
उन्होंने जोरदार तरीके से हमले की तैयारी का आदेश दे दिया। 
उन्होंने सैनिकों की भर्ती के लिए, हर-हर कबीले में उत्तेजना फैलाने 
और उत्साह जगाने वाले अपने वक्ता भेज दिए। उनके जोशीले 
भाषणों से परे अरब में आग-सी लग गई। सेना में भर्ती होने के लिए 
तमाम कृबीलों के नौजवान पूरे जोश और उत्साह के साथ मद्गीना - 
सौ सवारों को लेकर आया। प्रसिद्ध हातिम ताई के बेटे अदी एक 
भारी सेना लेकर पहुँचे। इसी तरह बहुत से कुबीलों के सरदार अपने 


59 
साथ हजारों आदमी लेकर आए। 

पूरे देश में उत्साह इतना जगा हुआ था कि नग्न लगलब 
कबीले के सरदारों ने हज़रत उमर (रजि०) के पास पहुँचकर 
निवेदन किया, हमें इस राष्ट्रीय युद्ध में विदेशियों के खिलाफ लड़ने 
की इजाजत दी जाए। स्पष्ट रहे कि इस कबीले का धर्म ईसाई था। 
उसकी बात मान ली गई और वे अस्त्रो-शस्त्रों से सुसज्जित एक 
हजार सेनानियों को अपने साथ लाए। 

वे लोग भी सेना में भर्ती हो गए, जो पिछली लड़ाई में पराजित, 
होकर भाग आए थे। उन्होंने अपना कलंक धोने और अपनी शर्म 
मिटाने के लिए ऐसा किया था। 

यद्यपि ईरानियों ने शहर पर दोबारा कब्जा कर लिया था. 
फिर भी मुसन्‍्ना के कुछ जासूस वहां मौजूद थे, जो कभी-कभी उन्हें 
हालात बताते रहते थे। अब मुसन्‍्ना की एक बड़ी सेना बन गई थी। 
क्‌फ़ा के करीब बुवैब नामक एक स्थान था, इस्लामी सेनाओं ने यहाँ 
पहुंचकर डेरा डाला। बुवव फ़रात नदी के पश्चिमी किनारे पर 
स्थित था। हजरत उमर (रजि०) ने मुसन्‍ना को ताकीद कर दी थी 
कि वह किसी हालत में भी नदी न पार करें कि सेना खतरे में पड़ 
जाए। 

दूसरे किनारे पर ईरानी सेना ने पड़ाव डाल रखा था। इस 
समय ईरानी सेना का नेतृत्व मेहरान कर रहा था। ईरानियों की सेना 
तीन हिस्सों में बटी हुई थी। हर हिस्से के शुरू में हाथियों की कृतार 
थी और उनके आगे एक पैदल सेना थी, जो विचित्र प्रकार के बाजे 
बजा रही थी। 

रमजान का महीना, उसकी पहली तारीख थी। मुसन्‍्ना अपने 
मशहूर घोड़े पर सवार थे और अपनी सेना में चक्कर लगाकर 
सैनिकों के दिल-बढ़ा रहे थे। वे कहते जाते थे- वीरो! देखना, 
तुम्हारे कारण इस्लाम के नाम पर बदनामीं न आए।' 


60 
उस समय मसलमानों की सेनाओं का नियम यह था कि 
अल्लाह अकबर' के नारों से बिगुल और कॉशन का काम लिया * 
जाता था। पहली तकबीर (अल्लाहु अकबर कहने ) पर सेना 
हथियारों से लैस होकर तैयार हो जाती, दूसरी तकबीर पर सैनिक 
हथियार संभाल लेते और तीसरी पर धावा बोल देते थे, लेकिन 
मसनन्‍ना ने अभी मश्क़िल ही से पहली तकबीर कही होगी कि 
ईरानियों ने उन पर हमला बोल दिया। मुसलमानों ने जोश में 
आकर हमले को रोकने के लिए अपनी पंक्तियां तितर-बितर कर दी 
और आगे बढ़ने की कोशिश की। सामरिक दृष्टि से यह बहुत बड़ी 
गलती थी। मसन्‍ना इसे सहन न कर सके। गुस्से में आकर अपनी 
दाढ़ी तक नोच ली। चिल्लाकर बोले, 'खुदा के लिए इस्लाम को 
रुसवा न करो.! ' बात समझ में आ गई और पूरी सेना फिर निर्यामत 
रूप से नया हमला करने के लिए तैयार होने लगी। 
इस बार इतनी शक्ति संजोकर हमला किया गया कि ईरानी 
पंक्तियां टट 'गईं। 'घबराकर वे पुल की ओर भागे, मुसलमानों ने 
पल का रास्ता बन्द कर रखा था। जब ईरानियों को अपने बचाव के 
लिए कोई शक्ल नजर न आई तो उन्होंने फिर से अपनी सेनाओं को 
दरुस्त किया और मुसलमानों पर जोरदार हमला किया। घमासान 
लड़ाई हई, दोनों तरफ के बड़े-बड़े सरदार मारे गए। मुसलमानों का 
पलड़ा भारी रहा, ईरानियों की पराजय हुई। तगूलब कृबीला के एक . 
सवार ने सेनार्पाति मेहरान का काम तमाम कर दिया। मेहरान के 
मरते ही लड़ाई खत्म हो गई। लगभग सभी ईरानी सैनिक मारे गए। 
जो भागना चाहते थे, वे' भी दूसरी ओर नदी के कारण इस प्रकार 
घिर गए!'थे कि भाग न सके और मारे गए। 
: काफी समय के बाद जब यात्रियों का इधर गुजर हुआ तो. 
उन्होंने जगह -जगह हड्डियों के ढेर पाए। स्वयं मुसन्‍ना का बयान है,, 
यद्यपि मैं अनेक बार ईरानियों से लड़ा, मगर इससे पहले मैंने ऐसा' 


रु 


3 
घमासान युद्ध नहीं देखा था। 

इस विजय से मुसलमानों की धाक ईरानियों पर जम गई' और 
मुसलमान इराकी इलाके में खूब फैल गए 

जब यह खबर ईरान की राजधानी पहुंची तो खलबली मच 
गईं। एक-दूसरे की नुक्ताचीनी शुरू हो गई । फल यह निकला कि 
. पोरान दख़्त को राज्य-गद्दी से उतरना पड़ा और उसकी जगह सोलह 
वर्षीय यज़्द गुर्द को सत्तारूढ़ कर दिया गया। उस समय यज़्द गुर्द ही 
. किसरा-वंश की एकमात्र यादगार था। यज़्द गुर्द ने कुछ ऐसी नीति 

अपनाई कि सरदारों और मन्त्रियों के आपसी मतभेद भी कम हो 

गए, यहाँ तक कि फ़ीरोज और रुस्तम जैसे सरदारों में मेल हो गया। 
ये दोनों सरदार राज्य में पूरे प्रभाव रखते थे और आपस में 
एक-दूसरे के दुश्मन थे। नए'बादशाह ने कुछ सुधार-कार्रवाइयां 
भी की, सेनाओं और प्रतिरक्षा-विभाग का नए सिरे से गठन किया। 
राष्ट्रीयता की भावना को पूरे देश में पैदा करने की कोशिशें शुरू हो 
गईं। किले और नई फौजी छावानियां तैयार कराई गईं। इंरॉर्क की 
उन आबादियों में, जिन पर मुसलमानों ने अपनी विजय-पताका 
फहरा दी थी, विद्रोह-भावना भड़का कर उन्हें अपने पक्ष में कर 
लिग्ना गंया। इस तरह अब मुसलमानों के लिए' इन आबादियों का 
कोई भरोसा नहीं रह गया। 

हजरत उमर (रजि०) को.ये खबरें पहुंचीं तो तत्काल मुसन्‍्ना 
को आदेश दिया कि सेनाओं को हंर ओर से -संमेटकर अरब-सीमा 
की ओर हट जाओ और उन तमाम कबीलों को, जो इराक्‌ में फैले 
हुए हैं, हुक्म भेज दो कि निश्चित समय पर इकट्ठा हो जाएँ। साथ ही. 
बड़े-जोर-शोर से फौजी तैयारियां शुरू कर दीं। हर ओर-ऐलान करा 
दिया गया कि अरब के जिलों में जहाँ-ज़ंहाँ भी वीर, योद्धा, कवि, 
वक्ता और परामर्शादाता हों, तुरन्त खिज्ाफ़॒त-दरबार में आःजाएँ। 
चूंकि हज का जमाना आ चुका था, हजरत उमर (रजि०) स्वयं 


62 
मक्का आए और हज से छूटे नहीं कि हर ओर से कबीलों का तूफान 
उमड़ आयां। 
हजरत उमर (रजि०) हजकरके वापस हुए तो जहां तक 
निगाह जाती थी, सिर ही सिर नजर आते थे। ये सभी सैनिक थे। 
: आदेश दिया कि सेना को नियमित रूप दें दिया जाए और मैं स्वयं 
सेनापति बनकरं चलूंगा। सेंनो.जब तैयार हो गई तो हजरत अली 
(राजि०) को बुंलाया, शासन-कार्य उनके सुपुर्द किया और स्वयं' 
मदीना से निकलकर इराक की ओर चल पंड़े। सरार, जो मदीना से 
3 मील पर है, वहाँ पहुंच कर पहली मंजिल की। लोगों के आग्रह पर 
रात में मन्त्रणा-परिषद्‌ का अयोजन किया गया, बुजुर्ग और. 
अनभवी साथियों का आग्रह था कि खलीफ़ा का सेनापति के रूप में 
इस महिम के साथ जाना उचित नहीं है। अगर पराजय हुई और 
खलीफ़ा को कोई क्षति पहुंची तो.इस्लाम का अन्तः ही समझा 
जाएगा। हज़रत उमर (राज़०) जब न जाने पर सहमत हो गए तो 
समस्या खड़ी हो गई कि किसे सेनापति बनाया जाए। प्रसिद्ध 
सेनापति व योद्धा खालिद व अबू उबैदा उस समय सीरिया के मोचों 
- पर डठे हुए थे। आखिर सोच विचार के बाद हज़रत अली (रजि०) 
- को सेनापतित्व के लिए चुना गया। तुरंत दूत मदीना भेज दिया गया, 
लेकिन हजरत अली (रजि०) ने विवशता जताई और इन्कार कर 
दिया।. लोग अभी विचार ही कर रहे थे कि अब्दुररहमान इब्न औफ 
ने साद इब्न अबी वक्कास का नाम पेश कर दिया। 
साद उच्च श्रेणी के सहाबी (प्यारे रसूल के साथी) और प्यारे 
रसूल (सल्ल०) के मामूं (मामा) थे। उनकी वीरता और उनका 
साहस सभी को मान्य था, लेकिन वह सेनापतित्व-कर्त्तव्य भी निभा 
सकेंगे, इस ओर से हजरत उमर-(रजि०) को सन्‍्तोष न था, मगर 
जब सभी ने उनके सेनापंतित्व पर हामी भर ली तो उन्होंने भी 
मंजरी दे दी, साथ ही यह ताकीद भी कर दी कि हर मामले में 


63 
-खुलीफ़ा से मशविरा कंर लिया करें। अत: हजरत उमर (रजि०) ने 
इस मुहिम के तमाम इन्तिजाम अपने हाथ में रखे-सेना का क्रम, 
आक्रमण की तैयारी, धावा, सेनाओं का विभाजन, तात्पर्य यह कि 
हर प्रकार के आदेश समय-समय पर हजरत साद (रजि०) को देते 
रहे। .. 
* साद (रजि०) की नियुक्ति से लोग सन्तुष्ट थे। झण्डा फहराया' 
गया और सेना आगे के लिए रवाना हो गई। सत्तरह या अठारह 
मंजिलें तय करने के बाद सेना सालबा पहुंच गई। सालबा क॒फा से 
तीन मंजिल दूर है। पानी की अधिकता और अच्छी जगह होने के 
कारण यहाँ हर महीने बाज़ार लगा करता था। हजरत साद (रजि०) 
को खलीफ़ा ने आदेश दे रखा था कि जिस स्थान पर सेना का पड़ाव 
हो, वहां का नक्शा, सेना. का फैलाव, जमाव का ढंग, रसद की 
स्थिति और दूसरी तमाम बातों की सूचना उन्हें नियमित रूप से दी 
जाती रहे। इसलिए पड़ाव डालते ही सेनापति ने खलीफ़ा हजरत 
उमर (रजि०) को एक-एक बात की विस्तृत सूचना दे दी। उस 
समय सेना में तीस हजार सैनिक थे। वहां से एक सविस्तार आदेश 
आया। सेनापति साद ने उसके अनुसार अपनी सेना को नियमित ढंग 
से गठित किया। अलग-अलग भागों की टुकड़ियों के अलग-अलग 
कमांडिंग अफसर नियत किए। एक महीने के पड़ाव के बाद सेना 
आगे बढ़ी। 

यहां से चलकर शिराफ में पड़ाव डाला गया। खलीफा का 
आदेश आया, शिराफ़ से आगे निकल कर कादसिया में पड़ाव डालो 
और पड़ाव इस तरह डाला जाए कि सामने इराक का क्षेत्र हो और 
पीछे की ओर अरब के पहाड़ हों, ताकि अगर नतीजा तुम्हारे हक्‌ में. 
हो, तो जितना बढ़ना चाहो, बढ़ते चले जाओ और अगर तुम्हारे 
खिलाफ हो तो तुम अरब के पहाड़ों में छिपकर अपनी रक्षा कर 
सको। 


हा 


कादसिया नगर काफ़ी उपजाऊ और हरे-भरे भूभाग परः 
स्थित था और नहरों और पुलों की वजह से सुरक्षित स्थान भी था। 
इस्लाम लाने से पहले हजरत उमर (रजिं०) इस क्षेत्र से कई बार 
गुजरे थे और यहां के कोने-कोने के जानकार थे, फिर भी वहां की 
नई स्थिति को मालूम करके सेनापति को और अधिक आदेश भेजे। 


कादसिया पहुंच कर सेनापति ने हर ओर जासूस दौड़ाए, ताकि 
शत्रु-सेना के बारे में और दूसरी ख़बरों के बारे में सूचनाएं प्राप्त कर 
सकें। इन जासूसों ने आकर बताया कि फ़र्रुखजाह का बेटा रुस्तम, 
जो अरमानिया का मशहूर रईस है, सेनापति नियुक्त किया गया है 
और मदायन से चलकर साबात में ठहरा हुआ है। साद ने हजरत 
उमर (रजि०) को खबर दी, वहां से जवाब आया कि लड़ाई से पहले 
कछ लोग दुश्मनों तक पहुंचें और उन्हें इस्लामी शिक्षाओं से 
परिचित कराएं। प्राचीनकाल में ईरानियों की राजधानी अस्तख़र 
थी, लेकिन नौशेरवाँ ने मदायन को अपनी राजधानी बनाया था। 
यह कादसिया से लगभग चालीस मील के फ़ासले पर स्थित था। 
मुसलमानों के चौदह दूत घोड़ों पर सवार होकर- मदायन को चले। 
राह में जिधर से गुजर होता था, तमाशाइयों की भीड़ लग॑ जाती थी, 
यहाँ तक कि वे राजधानी के कुरीब पहुंचकर ठहरे। यद्यपि उनका 
प्रत्यक्ष रूप यह था कि घोड़ों पर जीन और हाथों में हथियार तक न 
था, फिर भी निर्भीकता, साहस और वीरता उनके चेहरों से झलकती 
थी और तमाशाइयों पर उसका असर पड़ता था। 


- यज़्दगुर्द ने जब उनके आगमन की सूचना पाई तो उसने 
दरबार सजाने का.हुक्‍्म दे दिया, फिर दूतों को बुला भेजा। ये लोग 
अरबी जुब्बे (लम्बा पहनावा) पहने, कंधों पर यमनी चादरें डाले, 
हाथों में कोड़े लिए, मोजे चढ़ाए, दरबार में दाखिल हुए। पिछली 
लड़ाइयों की विजय से समूचे ईरान में अरब की धाक बैठ गई थी। 
यज़्दगुर्द ने मुस्लिम दूतों को इस शान से देखा तो उस पर रोब-साः 


65 

छा गया। फिर भी उसने पूछा- 

"तुम लोग यहां क्‍यों आए हो?! 

इस शिष्ट-मंडल के नेता नोमान इब्न म॒क्रिन थे, उन्होंने- 
सबसे पहले इस्लाम की विशेषताएं बताई , फिर कहा, 'इस सच्चे 
दीन (धर्म) से अगर आप सहमत हैं, तो उसे स्वीकार कर लें। अगर: 
आप इससे सहमत नहीं हैं, तो अल्लाह की जमीन पर अल्लाह के 
दीन ही का प्रभुत्व सर्वधा उचित है। और उस दीन पर आधारित 
इस्लामी हुकूमत के अधीन हो जाए। अगर यह भी मंजूर नहीं और 
लड़ने पर उतारू हैं तो फिर तलवार हमारे-आपके बीच फैसला कर 
देगी।' 

ऐसी बेधड़क बातें सुनकर यज़्दगुर्द गुस्से से कांप उठा'और 
कहा, हे भाग्यहीनो! तुम इतने दुस्साहसी बन बैठे हो कि हम से 
इतनी बढ़-चढ़ कर बातें करते हो? क्या तुम्हें अपने बारे में याद नहीं 
रहा कि तुम से ज़्यादा बदकिस्मत और नीच जाति और कोई न थी। 
हमारे सीमावर्ती जमींदार तुम्हारी थोड़ी-सी सरकशी पर तुम्हें नाकों | 
चने चबवा दिया करते थे। आज भी याद रखो कि हमारे सिपाही 
तुम्हें ऐसा पाठ पढ़ाएंगे कि तुम भूलकर भी इधंर का-रुख न करोगे। ' 

शिष्टमंडल चकित रह गया, लेकिन मुगगीरा इब्न ज़रारा इस 
कड़वी बात को सहन न कर सके, उठ कर बोले- "यह ठीक है कि 
हम बदक्स्मत थे, गुमराह थे, आपस में कट मरते थे, अपनी 
लड़कियों को जिन्दा गाड़ देते थे, लेकिन अल्लाह ने हमः पर कपा 
की, अपना पैग्रम्बर भेजा, जो वंश व परिवार की दृष्टि से हम सब में 
श्रेष्ठ था। हमने शुरू-शुरू में उसका बड़ा विरोध किया। हर प्रकार 
से उसे कष्ट पहुंचायू। वह सच कहता था, लेकिन हम उसे झुठलाते 
*थे। आखिर उसकी बातों ने धीरे-धीरे हमारे दिलों पर असर किया 
और हम उस पर ईमान लाए। वह जो कुछ कहता था, अल्लाह के . 


66 | 
हुक्म से कहता था और जो करता-थथा, खुदा के हुक्म से कंरता-था। 
उसने हमें कहां कि इस पाक दीन को संसार बालों के सामंने रखो। 
: जो लोग इस्लाम स्वीकार करें, वे तुम्हारे अध्विकारों में बराबर हैं, 
* लेकिन बलातूं धर्म परिवर्तन गुनाह है। जिनको इस्लाम से इन्कार 
हो, लेकिन टैक्स देना स्वीकार कर लें, उनंको इस्लाम की हिमायत 
में ले लो और उनकी जान व माल की हिफ़ाज़त करो. और जो 
. दोनों बातों से इनंकार करें और लड़ने पर-हीं तंले रहें, उनको 
मुकाबले के लिए बुलांओं और तलवार के जुरिएं. फैसला करो 
यज़्दगुर्द शिष्टमंडल के संदर्स्य का यह बयान सुन कर काफी 
नाराज हुआ। कहने लगा, अगंर दूतों का कत्ल जायज होतीं, तो 
आज तुम्हारी बोटी-बोटी करके चीलों और गिद्धों के आगे डल॑बा देता। ' 
इसके बाद उंसको जुलील कंरने के उद्देश्य से मिट्ठी का एक 


टोकंरां. पेंश कियां अर्थातं यह कि 'तुम्हारे सिर पर खोक-धूंल। हम. 


तुम्हें जलील व॑ रुसवों करके अप्रैने देशं से निकाल देंगे।' बे 
खूशी-खूशी मिट्टी का टोकरा लिए सेनापंति के पास पहुंचे और जिस 
चीज को इंरानियों ने अपशकुन मान्‌ कर पेश कियां था, उसी को 
अच्छा संकुन समझ कर विजय की मुबारकबोंद पेश कर दी कि शत्रु 
ने स्वयं ही हमें अपनी जुमीन भेंट कर दी। 

.. इस घंटना के कई महीने तक दोनों ओर से कोई हलचल नं 
हुई। न हित 
यज़्द गुर्दे के आग्रह के बाद भी रुस्तम लड़ाई को टाल रहां 
था। वह कई महीने तक साबात में डेरा डाले पंड़ा-रहा।, 

इस मुद्दत-में मुसलमान सीमांवर्ती क्षेत्रों में इस्लाम का 
: आहवान करते; व्यावहारिक आदर्श प्रस्तुत करते, इससे ईरानी. 
सरदारों को चिन्ता होने लगी कि कहीं सींमाव॑र्ती क्षेत्रों में लोग: 
मुसलमान न॑ हो जाएं। यज़्दगुर्द के पास बात पहुँची, उसने रुस्तम 


6 

को हिदायत की कि वह मुसलमानों को इसंका अवसर न दे। विवश 
हो रुस्तम की साठ हज़ार सैंनिकों की सेना साबांत सें आगे बढ़ीं और 
कांदसिया पंहुंचकर उन्होंने भी पड़ाव डाल दिया। असत्य पर 
आधारित ये ईरानी सेनाएं जिन-जिन् स्थानों से गुजरीं, अपने 
दुरांचरण का प्रमाण जुटाती गईं, तमाम अफंसर शराब पीकर 
निर्लज्जता के क्र काम कर डालते थें, लोग मुसलमानों के श॒द्ध . 
आचरण को देख-समझ चुके थे, ईरानियों के दुराचरण का प्रभाव 
उन॑ पर उल्टा ही पड़ा और वे खल्‍लमं-खंल्ला कंहनें लगे-' "लगता 
है, ईरानी साम्राज्य का. अन्त करीब आ गया है। 

रुस्तम चूंकि लड़ेंने से जी चुराता था, इसलिए उसने सांद 
(ररज०) को कहलवा भेजा कि कोई विश्वसनीय दूत भेजो, जिससे 
समझौते के लिए वार्ता की जा सके। रुबई इब्न आमिर को यह काम 
सौंपा गया। उनका पहनावा बहुत ही सादा था। उनके हाथ में एक 
नेज़ा था, दूसरे में तलवार। इसी रूप में शान-शौकत भरे ईरानी 
दरबार में पहुंचे। नियमानुसार जब संतरियों ने नेज़ा और तलवार 
लेनी चाहीं तो उन्होंने इन्कार कर दिया और कहां कि मुझे तुमने खुद 
बुलाया है, तो मैं आया हूं। अंगर मेरी इच्छानुसार मुझे दरबार में 
जाने की इजोजत नहीं मिल संकती, तों मैं लौट जोऊँगा। जब - 
रुस्तम को इस बात की खबर दीं गई, तो उसने. कहा, “कोई हर्ज 
नहीं, आनें दो। '' चुनांचे रुबई को दरबार में लाया गंया, लेकिन उन 
पर ईरानी दरबार की शान व शौकंत का कोई प्रभाव न पड़ा। 
रुस्तम ने रुबई से पूछा, “इस देश में क्‍यों आए हो ?”' उन्होंने बिना 
किसी झिझक के जवाब दिया-. इसलिए कि रंचित वस्तुओं के . 
स्थान पर रचंयिता की भक्ति की जाए 

रुस्तम क॒छ क्षणों के लिए चुंप रहा, फिर बोला, हम सलाह व 
मशवबिरे के बाद जवाब तुम्हारे पास भिजवा देंगें। 


68 

दरबारियों ने जब रुबई का जूंग लगा म्यान देखा, तो चकित 
होकर पूछा, क्या इसी बलबूते पर हमसे लड़ने आए हो?' लेकिन 
जब रूबई नें तलवार म्यान से खींच कर दिखाई तो उनकी आंखें 
चकाचौंध हो गईं। कु 

रूुबई तो वापस आ गए, मगर सन्देश भेजने-भिजवाने का 
सिलसिला बराबर चलता रहा। 

रुस्तम ने एक और कोशिश की कि किसी तरह ये लोग बिना. 
लड़े ही वापस लौट जाएँ। अतएव उसके कहने पर मुग्रीरा.को दूत के 
रूप में उसके पास भेजा गया। रुस्तम के दरबार की शान व शौकत 
आंखों को चुंधिया रही थी। दीबाज व हरीर के परदे, रेशमी 
कालीन, सोने के जंड़ाऊ सिहासन, सन्तरी पहरेदार, रक्षक, सुनहरी 
रूपहली वर्दी वाले सिपाही, दोनों ओर खड़े अरब दूत को आतंकित 
ब प्रभावत करने के लिए काफी थे।रुस्तम का खयाल था कि अरब' 
दूत ईरानी दरबार की भव्यता को देखकर आतंकित हो जाएगा और 
अपने सेनापति को मशविरे देगा कि यहां से बिना लड़े वापस चले 
जाने में ही बुद्धिमानी है। पर मुगीरा भी प्रभावित न हुए। उन्होंने भी 
रुबई की तरह नेजा और तलवार को द्वार पर रख देने से इन्कार कर 
दिया। आखिर जब इसी हालत में अन्दर आने की अनुमति दी गई 
तो वे सीधे आसन पर जा चढ़े और रुस्तम के पास बैठ गए। रुस्तम 
का गुस्सा भड़क उठा कि अरब ऐसा दुस्साहस कर सकता है कि वह 
चीफ आव दी स्टाफ का यों अनादर करे। मगर मुगीरा तो सबके पैदा 
करने वाले की इबादत करते थे, उन्होंने निस्संकोच भाव से रुस्तम 
से कहा, “तुमने क्‍यों ढोंग रचा रखा है कि तुम खुद तो इतने ऊंचे बैठे - 
हो और दूसरे लोग नीचे। तुम्हें शर्म आनी चाहिए कि जो तुमने ' 
अल्लाह के बन्दों के बीच इतने दर्जे बना रखे हो। मन॒ष्य-मनष्य के 
रूप में समान है और तुम्हारा यह भेद-भाव तो मानवता के विपरीत 
है। 


69. 

रुस्तम ने उनकी बात को टाल दिया और इस सीधी-सच्ची 
बात को ऐसे पी गया मानो कोई बात ही नहीं हुई। रुख बदलते हुए 
उस ने कहा, हमारा साजों सामान तुमने देख लिया है। तुम्हारे लिए 
बेहतरी इसी में है कि तुम हमारे देश से अपनी जानें बचाकर वापस 
चले जाओ। हम तुम से किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न करेंगे, बल्कि 
तुम्हें बहुत कछ इनाम देंगे। 

मगर इन बातों को सुनकर मुगीरा के कानों पर जूं तक न 
रेंगी। इनका उत्तर यही था कि या तो हमारी शर्तें मान लो, वरन्‌ 
तलवार हमारे और तुम्हारे बीच फैसला कर देगी। ; 

रुस्तम का इतना कहना था कि क्रोध से उसकी रगें तन गईं 
और कहा, “सूर्य की कसम! मैं तुम सब को तबाह ही करके 
छोड़ूंगा। 


70 


क्ादसिया क़ी लड़ाई 


, अब तक रुस्तम लड़ाई को बराबर टाल रहा था, मगर अब 
मुगीरा से बातें होने के बाद वह इतना उत्तेजित हो उठा कि सच में 
लड़ाई की तैयारी शुरू कर दी और आदेश दिया कि नहर, जो बीच 
में रूकावट डाल रही थी, सुबह तक पाट दी जाए। फिर कया था, 
सुबह तक आदेश का पालन कर दिया गया और दोपहर से 
पहले-पहले सेना उस पार आ गईं। रुस्तम स्वयं शस्त्रों से लैस 
हुआ, दोहरे कवंच धारण किए और विशेष घोड़े पर सवार होकर, 
जोश में बोला, ''कुल अरब को चकनाचूर कर दूंगा।' किसी 
सिपाही ने कहा- 'हां, अगर खुदा ने चाहा।' बोला- खुदा ने न 
चाहा तब भी।' 

सेना को निर्यामत ढंग से सजाया, आगे-पीछे तेरह पंक्तियों में 
उसे विभाजित किया। मध्यम पंक्ति के पीछे हाथियों का किला 
बाँधा और सख्त मोचांबंदी कर सेना को इस तरह लड़ाई के मैदान में 
उतारा कि उसकी पंक्तियों को तोड़ना आसान न हो सके। साथ ही ' 
लड़ाई के मैदान से राजधानी तक हर-हर क्षण सूचना भेजने के लिए 
जगह-जगह आदमी बिठा दिए। . 

हजरत साद (रज०) बीमार थे, इसलिए सेना के साथ न जा' 
सके। खालिक्‌ इब्न अर्तफ़ा को अपनी जगह पर सेनार्पति नियुक्त 
कर दिया अरब के कवियों ने कविताओं से और वक्‍ताओं ने भाषणों 
से इस्लामी सेना में उत्साह और हौसला बढ़ा रखा था। कारियों 
(कुरआन पढ़ने वालों) ने जहाद की आयतों का पाठ कर-करके पूरी 


६१ 


सेना को जिहांद-भाव॑ से भर दिया। 

लड़ाई शुरू हो गई। बारी-बारी दोनों ओर के वीर-योद्धा 
निकल कर एक-दसरे से भिड़े, फिर आम जंग शुरू हो गई। अरब 
घोड़े हाथियों से डर कर भागे, मगर अरब योद्धाओं ने उन पर तरन्त 
क़ाबू पा लिया और इस तेजी से हमला किया कि हाथियों पर सवार 
सैनिकों को नीचे गिरां दिया और हाथियों को मैदान से भगा दिया। . 
अंधेरा छा जाने पर दोनों ओर की सेनाएँ मैदान से हट गईं। यह 
कादसिया की पहली लड़ाई थी। 

यद्यप्र साद बीमार थे, चलने-फिरने से मजबूर थे, इसके 
बावजूद नए सेनापति की कृदम-कृदम पर रहनुमाई कर रहे थे। 
अगली सुबह साद (रजि०) ने शहीदों को कफन-दफ़न कराया,' 
घायलों की जांच-पड़ताल की। अभी :वे इन कामों में ही व्यस्त थे 
कि जासूसों ने ख़बर दी कि हज़रत उमर (रजि०) के हुक्म के 
मुताबिक सीरिया से छः हजार की सेना सहायता के लिए आ रही है। 
इस खबर के मिलते ही मुसलमानों के दिल. को ढाढ़स बंध गई। 
लड़ाई शुरू हुईं। पहले तो परम्परानुसार दोनों ओर के योद्धा 
बारी-बारी अपनी शक्ति का परीक्षण करते रहे, फिर घमासान 
लड़ाईं शुरू हो गई। | 

सेना अधिक़ारी काअकाअ ने अरबी घोड़ों पर झोल और काले 
बुर्के डालकर उनको' इतना डरावना बनाया कि ईरानी घोड़े और 
हाथी उनसे डर गए। इस लड़ाई में दो हज़ार मुसलमान और दस 
हजार ईरानी मारे गए और घायल हुए। इस लड़ाई में बहमन मारा 
गया।और भी दूसरे कई योद्धा इस लड़ाई में काम आए। 

तीसरी लड़ाई घमासान की थी। सेना अधिकारी काअकांअ ने 
सबह से पहले कछ टर्काड़याँ भेज दीं और उनको हक्‍्म दिया कि जब 
लड़ाई शरू हो तो ठीक उसी समय घोड़े दौड़ाते हुए लड़ाई के मैदान 


# ४ 
में पहँचे और प्रचार करे कि नई कुमुक सीरिया की ओर से आई है। 
साथ ही यह भी कि ये टकड़ियाँ एक साथ नहीं, बारी-बारी आएँ। 
इस चाल से ईरानियों पर एक आतंक छा गया। 
लड़ाई शरू हई। नारों की गूंज से -धरती काँप उठी। 
अरबों ने एक.ईरानीं भयानक हाथी को इस तरह घायल किया कि 
बहं पागल होकर लड़ाई के मैदान की ओर भागा। उसकी देखा -देखी 
सब हाथी उसके पीछे भाग निकले। सारी रात लड़ाई जारी रही, 
लोग नींद और थकावट से चूर थे, मगर लड़ाई घमासान की चलती. 
_रही। सवार घोड़ों से कूद पड़े। मुसलमानों ने नेजे फेंक.कर तलवूरें 
उठा लीं। औरं ईरानी सेना को धकेलते हुए रुस्तम तक पहुंचे, वह 
सिंहासन पर विराजमान था।-यहं दृश्य. देख कर वह डर गया। 
लेकिन. बचने. की कोई शक्ल न देखकर तुरन्त तलवार लेकर 
मसलमानों के म॒काबले में डट गया। घावों से जब छलनी हों गया तो 
भाग कर सामने की नहर में कद पड़ा। मुसलमानों ने भी उसके पीछे 
छलांग लगा दी और उसे बाहर निकालकर उसका अन्त कर दियां 
. और नारों से आसमान सिर पर उठा लिया। 
जब ईरानी सेना ने रुस्तम के मारे जाने की खबर सुनी. 
बदहवास हो 'गई', उसको मनोबल टूट गया, उत्साह खो बैठी और 
भगदड़ मच गई। मुसलमानों ने भागती हुई सेना का पीछां किया 
और उनमें से बहतों को मौत के घाट उतार दिया। 
जिंस समय कादसिया की लड़ाई चल रही थी, मुसलमानों के 
खलीफा हंजरत उमर (राजि०) ने जैसे मानो आदत बना ली थी कि 
हर दिन मदीना से बाहर निकल जाते और इन्तिज़ार में रहते कि 
अगर कोई दत लड़ाई के मैदान से किसी तरह की खबर लाए, तो 
रास्ते ही में उससे सन लें। अतएव जिस दिन साद.का दूत विजय -पत्र 
लेकर मदीना के करीब पहुंचा तो हज़रत उमर (राजि०) रास्ते ही में 
मौजद मिले। आपने दत से पूछा कि तुम कहां से आए हो? उंसने 


7उ 


बताया कि वह अमीरुल-मोमिनीन (खलीफ़ा) को विजय की सचना 
देने आया है। आप हालात पूछने के लिए दूत के ऊँट के साथ-साथ 
भागे जा रहे थे। जब शहर में दाखिल हुए और हरेक ने आपको 
अमीरुलमोमिनीन कह कर सम्बोधित किया तो दूत बड़ा घबड़ाया। 
उसने खलीफा के साथ अपनी गुस्ताखी की माफ़ी चाही, मगर आप 
तो ऐसी बातों को कोई महत्व ही न देते थे। कहा: ''नहीं, कोई बात 
नहीं, तुम तो अपनी वात कहे जाओ।'' और इसी तरह वह बात 
करते-करते घर तक आए, मदीना पहुंचकर खुली सभा में विजय की 
'शुभ-सूचना दी और एक अति प्रभावपूर्ण. वक्तव्य दिया, जिसका 
कुछ अंश इस प्रकार है:- 
मुसलमानो! मैं बादशाह नहीं हूँ कि तुम को गूलाम बनाना 

चाहूं, मैं खुद खुदा का. गुलाम हूं, हां, खुलाफ़त का बोझ मेरे सिर पर 
रखा गया हैं। अगर मैं इस तरह तुम्हारा काम करूँ कि तम चैन से 
घरों में सोओ, तो यह मेरा सौभाग्य है। मैं तुम्हें सिखाना चाहता हूँ, 
लेकिन कथन से नहीं, बल्कि कर्म से। 

कार्दासया की लड़ाई में जो ईरानी या अरब मुसलमानों से लड़े 
थे, उनमें ऐसे भी थे जो दिल से लड़ना नहीं चाहते थे, बल्कि 
जुबदं॑स्ती सेना में पकड़ कर लाए गए थे। बहत-से लोग घर 
छोड़कर निकल गए थे। विजय के बाद ये लोग साद के पास आए 
और अम्न की दरख्वास्त की। हजरत साद (र्राजु०) ने खलीफ़ा को 
इस स्थिति से अवगत कराया। हजरत उमर (र्राज०) ने सहाबियों 
को बुलाकर राय ली और सबने एक राय होकर इसे स्वीकृति दे दी। 
सार यह कि समूचे देश को अम्न दे दिया गया। जो लोग घर छोड़ 
कर निकल गए थे, वापस आ-आकर आबाद होते गए। फिर जनता 
से मुसलमानों का यह सम्पर्क इतना बढ़ा कि अवसर बुजुर्गों ने उनसे 
रिश्तेदारियां भी कर लीं। 


74 - 
बाबिल की ओर 

ईरानी कादसिया से परास्त होकर भागे तो बाबिल में ही ठहर 
सके। बाबिल एक सुर्रक्षत और सदृढ़ सैनिक छावनी थी। बहां सेना 
का जमाव शरू हो गया। इस नई सेना का सेनार्पति फीरोजा नियक्त 
किया गया था। 

जब इसकी सूचना हजरत साद (र्राजु०) को पहुंची, तो उन्होंने 
इस सैनिक जमाव को नष्ट करने का निश्चय कर लिया और बाबिल 
की ओर पूरी सेना लेकर चल पड़े। कछ सेना आगे भेज दी, ताकि 
बट रास्ता साफ़ करती जाए। इस टकड़ी की शत्रुओं से जगह-जगह 
झड़पें हुईं और मार्ग में बाधाएँ भी पड़ीं। लेकिन वह हर जगह 
विजयी ही होती रही। वाविल पहुंचकर ईरानी और इस्लामी 
सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। नेजे से नेज़ा और तलवार से तलवार 
टकराईं। ईरानी सेना हार गई और वह भाग निकली। 

हजरत साद ने वाबिल में कुछ दिनों तक और रुकने का 
निश्चय किया और जुहारा के कमांड में एक टुकड़ी आगे रवाना कर 
दी। ईरानी सेनाएं बाविल से भागं कर कूसी में ठहरी थीं और 
'शहरयार के नेतृत्व में मुसलमानों का मुकावला करने की तैयारियाँ 
कर रही थीं। जुहारा कूसी से गुज़रे तो शहरयार मुकाबले पर आ 
गया और लड़ाई के मैदान से आकर पुकारा कि जो वीर पूरी सेना में 
चुना हुआ हो आकर मुझ से लेड़े ले। जुहारा ने कहा, 'मैंने स्वयं तेरे 
मुकावल में आने का निश्चय किया था, लेकिन तेरा यह दावा है तो 
कोई गुलाम ही तेरे मुकाबले को जाएगा।' यह कह कर नाबिल को, 
जो तीम कबीले का गूलाम था, इशारा किया। उसने घोड़ा आगे 
बढ़ाया। शहरयार भारी शरीर वाला नामी योद्धा था। नाबल को 
कमजोर देखकर नेजा हाथ से फेंक, गरदन में हाथ डाल कर जोर से 
खींचा और जमीन पर गिरा कर सीने पर चढ़ बैठा। संयोग की बात, 
'शहरयार का अंगूठा नाबिल के मुंह में आ गया। नाविल ने इस-जोर . 


75 


से काटा कि शहरयार तिलमिला उठा। नाबिल मौका पाकर उसके 
सीने पर चढ़ बैठा और तलवार से उसके पेट को फाड़ डाला। 
'शहरयार बड़े ही मूल्यवान वस्त्रों और हथियारों से सुसाज्जत था। 
नाबिल ने कृवच आदि उसके शरीर से उतारकर हज़रत साद 
(राज०) के आगे लाकर रख दिए। साद ने थे चीज़ें उसको पुरस्कार 
स्वरूप दे दीं। इस लड़ाई में भी ईरानियों के कृदम.उखड़ गए और वे 
बहूत बुरी तरह लड़ाई के मैदान से भाग निकले।. 

कसी एक ऐतिहासिक जगह थी। हजरत इब्राहीम (अलै०) को 
नमरूद ने यहीं कंद कर रखा था। हज़रत साद ने उस जेलखाने को 
जाकर देखा, जहां हजरत इब्राहीम (अलै०) कुद किए गए थे। वहां 
से वह बहराशेर पहुंचे। इस शहर के नाम के रखने का कारण यह 
बयान किया जाता है कि इंरान के किसरा (सम्राट) ने एक शेर पाल 
रखा था, इर्सालए शहर को बहरा शेर कहते थे। जब मुसलमानों 
की सेनाएँ इस शहर में पहुंची तो शत्रु ने इस शेर को सेना की ओर 
छोड़ दिया। शेर ने हाशिम पर, जो कमांडर थे, हमला किया। 
उन्होंने इस फर्ती से तलवार मारी कि एक ही वार में शेर का काम 
तमाम हो गया। मुसलमानों ने इसे विजय का शुभारम्भ समझा और 
आगे बढ़कर शहर को घेर लिया। आस-पास के लोगों नें समझौता 
करके जिजया देना स्वीकार कर लिया, लेकिन इस शहर का घेराव 
दो महीने तक रहा। आखिर नगरवासी तंग आ गए और एक दिन 
शहर से निकल कर मुसलमानों के मुकाबले में जा डटे। लड़ाई शुरू 
हो गई। प्रसिद्ध सरदार जुहारा ने ईरानियों के सरदार शहर बराज 
को मार डाला। ईरानियों के छक्के छूट गए, आखिर हार माननी 
पड़ी। 


मदाइन की विजय 
अब मदाइन और बहराशेर में केवल दजला नदी रुकावट 


76 


बनी हुई थी। ईरानियों ने पुल तोड़ डाला ताकि मुसलमान नदी पार 
न कर सकें, यपिद्य नदी में बाढ़ आई हुई थी, फिर भी साद ने यह 
कह कर नदी में घोड़ा डाल दिया कि हे ईमान वाले मुसलमानों! 
शत्रु ने हर ओर से विवश होकर नदी के दामन में पनाह ली है। यह 
मुहिम जीत लो तो फिर रास्ता साफ है।' यह कह कर घोड़ा नदी में 
डाल दिया। उनको देख कर और यह सुनकर औरों ने हिम्मत की 
और तत्काल सबने घोड़े नदी में डाल दिए। नदी का बहाव जोरों पर 
था, मौजें मुसलमानों को इधर-उधर धकेल रही थीं। मगर वे थे कि 
पूरे शान्त मन से अल्लाह पर भरोसा किए आगे बढ़े जा रहे थे। नदी 
के दूसरे तट से ईरानी सेनाएं तीरों की बारिश कर रहीथीं, लेकिन यह 
बारिश मुसलमानों के बढ़ते प्रवाह को न रोक सकी। जब ईरानियों 
ने देखा कि मुसलमान बाढ़ की तरह बढ़े चले आ रहे हैं तो उनकी 
सेना की टुकड़ी नदी में कूद पड़ी, लेकिन मुसलमानों ने उसे बुरी 
तरह पार्रजत कर दी। ; 

शाही परिवार को यज़्दगुर्द हंलवान भेज चुका था। जब इस 
जबर्दस्त फौज को देखा तो स्वयं वहां से चल दिया। अब मुसलमान 
बिना किसी अवरोध के शहर में दाखिल हुए और अल्लाह का शुक्र 


अदा किया, शाही महल में राज-सिहासन के बजाय मेम्बर (जिस 
पर खड़े जुमे की होकर नमाज से पहले खुत्बा दिया जाता है) खड़ा 
कर दिया और पहली जुमा नमाज-की बड़ी शान.व शौकत के साथ 


इराक में अदा की गईं। 


यह एक प्रार्माणक ऐतिहासिक घटना है कि हजरत साद 
(रराज०) ने राजमहल की मूर्तियों को न तोड़ा, बल्कि सबको पड़ा 
रहने दिया और उसी महल में जुमा की नमाज अदा की। शाही 
महलों का खजाना और दूसरी ईरानी कीमती चीजें साद के सामने 
पेश की गईं। इनमें कुछ ऐसी अनोखी-अनोखी वस्तुएं भी थीं कि 
जिन्हें देखकर मानव-बुद्धि चकित रह जाती है। क़्यानी सिलसिले से 


है 2 


लेकर नौशेरवां के समय तक की असंख्य यादगारें थीं। नौशेरवां का 
मणिजड़ित मुकट, किसरा, हरमुज़ और किबाद के खंजर, राजा 
वांहर, खाकानेचीन और बहराम की तलवारें, ये सब वस्तुएं बड़ी 
अदभृत थीं। सोने के घोड़े और ऊँटनियां. भी थीं जिन पर कसी 
सजाऊ जीनें और पालान दर्शकों को स्तंब्ध कर देती थीं। इन चीजों 
के साथ-साथ एक सोने का फर्श था, जिस पर बैठ कर ईरानी सम्राट 
महफ़िले शराब गर्म किया करता था। उसमें जवाहरात, नीलम 
जुमर्रर और पुखराज के 'बेल-बूंटे' बने हुए थे। ये और इसी प्रकार 
के विचित्र से विचित्र सामान उन लोगों के हाथ लगे जो बदद थे। 
मगर उनकी ईमानदारी, सच्चाई. का हाल यह था कि सब चीजें 
लाकर अपने सेनापति के आगे रख दीं। सेनापति साद भी उनकी 
ईमानदारी और सच्चाई से प्रभावित हुए बिना न रहे। तीस मिलियन 
दिरहम का लूट का माल सेना में बांट दिया गया। फर्श और परानी 
यादगारें, पूरी की पूरी मदीना भेज दी गईं। हजरत उमर (राजि०) 
का विचार था कि इन सबको सुरक्षित रख लिया जाए, मगर हजरत 
अली (रजि०) और दूसरे लोगों के सलाह व मर्शावरे से ये चीजें भी 
सेना में बंटवा दी गईं। 

जब लूट का माल लोगों में बांटा जा रहा था तो हजरत उमर 
(रजि०) फूट-फूटकर रो रहे थे। किसी ने कहा, यह तो प्रसन्‍न होने की 
बात है और आप रो रहे हैं। आपने उत्तर दिया कि यह धनदौलत 
प्रायः किसी-भी कौम में फूट और द्वेष-भाव डाल देता है। मैं इस भय 
से प्रकम्पित हूं कि कहीं यह धन-सर्म्पत्ति हमारे लोगों को 
लोभ-लालच का शिकार न बना दे। 


इराके की अन्तिम लड़ाई 


इराक की अन्तिम लड़ाई जलूला.पर सन्‌ ]6 हि० में हईं। यह. 
बगदाद शहर से खूरासां जाते हुए रास्ते में पड़ता था। मदाइन की 


78 
हांर के बाद ईरानियों ने जललां में बंड़ी जोरदार तैयारियों शुरू कर 
दीं। सेना के कमांडर यजांद ने, जो रुस्तम का छोटा भाई था, शहर 
के चारों ओर खाई खुदवाई और हर संम्भंव उपाय से युद्ध जीतने का 
कार्म लिया। साद ने इनं तमाम हालात से अमीरूल मोमिनीन 
(मुसलमानों के अध्यक्ष) को सूंचितं कर दिया, वहां से आदेश मिला 
कि हाशिम इब्न उत्बा को बारह हजार सेना के साथ इंसं मुहिम पर 
भेजा.जाए। -सेना ने आगे बढ़केर शंहर को-घेर लिया। कभी-कभी 
- ईरानी शहर से निकल कर मसलंमानों' का मुकुंबंला करते, मंगर 
अधिकतर किले में बन्द रहते। अस्सी दिन तक़ घेराव हुआ यर्चाप्‌ 
इस अवधि में कई छोटी-छोटी लड़ाइयां हुईं, लेकिन दोनों पक्ष 
अपनी हठ पर अड़े-रहे। एक दिन ईरानियों ने अंचानक इस जोर से 
हमला किया कि मसलमानों के छक्के छूट गंए। मगर संयोग काहिए 
या अल्लाह की मदद, ठीक उंसी वक्‍त जोर की आंधी चली कि 
- ईरानियों को पीछे हटना पड़ा। वे घेबराहट और परेशानी में उलटे * 
पाँव भागें, लेकिन आंधी ऐसी तेज़ थी कि हाथ को हांथ॑ सुझाई न 
देता था, अतः हजारों भांगते हुए खाई में गिरकर कांल॑ के गाल में 
समा गए। इसे खबर से मुसलमानों में साहस पैदा हुआ और उन्होंनें 
नारा लगाते हुए पूरे जोर-शोर से हमला कर दियां। घंमासान येद्ध 
हआ, मसलमान लड़ते-भिड़ते किले के दरवाजे तक पहुंच गए और . 
शहर में दाखिल होकर उस पर कब्जा कर लिया। ; 
* जबं यज़्दगुर्द को जेंलूला की हांर की ख़बर मिली तो वह रैय॑ 
(ईरांन) को भाग गया। मुसलमांनों ने हर तरफ़ इसकी मुनादी करा 
दी। चंकि यहां इराक की सींमा-संमांप्त हो जाती थी, इसलिए इरॉंक 
की विजय अन्त को पहुँच गई। हर तंरफ शान्ति की घोष॑णा कर॑ दी 
गई जियाद ने हज़रत उमर (रजि०) सें निवेदन किया कि वह एक, 
भारी सेना के साथ ईरानियों का पीछा करें, मगर इसे उमर ने स्वीकार नहीं 
किया और कहा, मैं चाहता हूं कि हमारे और ईरानियों के बीच पहोड़ सीमा 


79 

बनाए रखें। मुझे अपने भाइयों की सुरक्षा का ख्याल है और सुरक्षा 
इसी प्रकार सम्भव है कि अभी ईरानियों को उनके हाल पर छोड़ 
दिया जाए और जो क्षेत्र जीते जा चुके हैं, उनमें पूर्ण शान्ति स्थापित 
की जाए और लोगों की जान-माल की पूरी रक्षा की जाए, राज्य को 
सुदृढ़ बनाया जाए। इस प्रकार ईरानी हम -पर हमलावर होने का 
विचार भी न लाएँगे। 


दमिश्क्‌ की लड़ाई 


सन्‌ [3 हिं० के आरम्भ में हज़रत अबूबक्र (राज ०) ने सीरिया 
(शाम) पर कई दिशाओं से चढ़ाई की थी। आपने अबू उबैदा को 
हम्स पर, यजीद इब्न अबू सुफ़ियान को दामिश्क्‌ पर, शुरहबील को 
जार्डन पर और अग्र इब्नुल आस को फिलस्तीन पर नियुक्त किया 
था। जब ये लोग अरब सीमा से बाहर निकले, तो उन्हें हर कृदम 
पर रूमियों के जत्थे मिले, जिन्होंने उनसे निर्यामत लड़ाइयां लड़ीं। 
ऐसी स्थिति में इन सब लोगों ने सलाह-मर्शावरे के बाद यह तय 
किया.कि बहुत-से मोचों का खोलना सही नहीं है, बेहतर यही है कि 
शत्रु का मुकाबला मिल कर किया जाए, लेकिन इसके लिए खलीफा 
की इजाजत जरूरी थी। अतएवं एक दूत आपकी सेना में इजाजत 
लेने और अधिक सेनाओं के भेजने की मांग करने के लिए भेजा 
गया। प्रसिद्ध योद्धा व सेनार्पात हजरत खालिद उन दिनों इराक की 
मुहिम में लगे हुए थे। वे खलीफ़ा का आदेश पा कर वहां से 
दमिश्क रवाना हुए और रास्ते में छोटी-बड़ी लड़ाइयां लड़ते 
अजनादैन पर आ पहुँचे। कैसर (रूम का सम्राट) ने मुकाबले की ठान 
कर बहुत बड़े पैमाने पर जंगी तैयारियां कर रखी थीं। अजनादैन पर 
दोनों सेनाओं की भिड़न्त हुई। शुरहबील, यजीद और अम्न इब्नुल्‌ 
आस भी वहाँ आ पहुँचे। घमासान लड़ाई हुई। मुसलमानों के तीन 
हजार सैनिक लड़ाई में शहीद हए। र्ूममयों को परास्त होना पड़ा। 
यहाँ से छूटते ही खालिद ने फिर दमिश्क्‌ का रुख किया और 
दमिश्क पहुँच कर हर ओर से नगर को घेर लिया। यर्याप यह घेरा 
हजरत अबूबक़ (र्राजु०) के खिलाफ़त-काल में शुरू हुआ था, मगर 


हा 
विजय तक पहुँचते-पहँँचते हजरत उमर खलीफा हो चुके थे। 
दमिश्क जिसे एशिया का वीनस कहा जाता है, सीरिया राज्य 
का प्रसिद्धतम नगर था। चारों ओर फसील. (सीमावर्ती ऊँची दीवारें) 
थीं। खालिद (राजि०) ने तमाम द्वारों पर सेनाओं को तैनात कर दिया 
और पूरी तरह नगर का घेराव कर लिया। मुसलमानों का टिट्ठी दल 
देखकर ईसाई बहुत हैरान और परेशान हुए, मुख्य रूप से इस 
कारण कि उनके जासूस, जो स्थिति समझने के लिए मुसलमानों की. 
सेना में आते थे, देखते कि पूरी सेना में जोश है, हौसला है, उत्साह 
हैं। हर-हर व्यक्त में वीरता, दृढ़ता, जमाव और निश्चय पाया 
जाता है। फिर भी उन्हें इस विचार से थोड़ी-सी तसल्ली होती थी 
. कि अरब गर्म देश के रहने वाले हैं, इर्सालए वे यहाँ की सर्दी सहन न 
कर पाएँगे, मगर जब जाड़ों में भी .मुसलमानों के साहस और ' 
निश्चय में कोई अन्तर न पैदा हुआ और वे यथावत्‌ घेरा डाले रहे 
तो ईंसाइयों के छक्के छूट गए। खालिद (राज्‌०) ने जो एक अनुभवी 
सेनापति थे, भांप लिया कि दमिश्कृवासी सहायक कमुक के 
इन्तिज़ार में हैं, इसलिए उन्होंने जुल कलाअ को क॒छ सेना लेकर 
हम्स की ओर रवाना कर दिया कि अगर उस ओर से कोई कमुक 
आए तो उसे रोके रखें। उनका अन्दाज़ा सही निकला और जुलू 
क्लाअ ने उस कुमुक को, जो हम्स की ओर से आई थी, रोके रखा। 
दामिश्क वालों को निराशा ही हाथ लगी। 
हजरत खालिद (रजि०) ने जासूसी की व्यवस्था बड़ी अच्छी 

कर रखी थी। उनके जासूस खबर पहुंचाने में बड़े दक्ष थे। एक दिन 
उन्होंने सूचना दी कि दमिश्कु के उच्च प्रशासक के यहाँ लड़का पैदा 
होने की खुशी में तमाम लोग उत्सव मना रहे हैं। रात को दमिश्क 
के सैनिकों ने भी शराब पी है और सायं ही से मद-मत्त होकर पड़ 
गए हैं। खालिद ने अपने कुछ वीर साथियों के साथ मश्कों के सहारे 
खाई पार की और फर्सील पर चढ़ गए। द्वारपालों को कब्जे में किया 


82: 


और ताले तोड़ कर फाटक खोल दिए। इधर सेना पहले से तैयार 
. खड़ी थी, फाटकों के खुलते ही.बाढ़ की तरह भीतर घस आई और 
. देखते .ही देखते पूरे नगर -पर मुसलमानों का कब्जा हों गया। 
' अब फहल 'में 
दमिश्क्‌ की पसपाई. के बाद रूमी काफ़ी निराश हुए। मगर 
एक बार उन्होंने फिर हिम्मत जूटाईं, मसलमानों से मकाबले का 
निश्चय किया और प्रण किया कि या तो वे अरबों को नष्ट-विनष्ट 
करके पंराजयं के कलंक को मिटा देंगे या स्वत: ही अपना अस्तित्व 
खो बैठेंगे। इस संकल्प के बाद उनकी तैयारियां -जोर-शोर से शरू 
हो गईं। दमिश्क्‌ की विजय के बाद मुसलमानों ने जोर्डन का रुख 
किया। रूमियों ने इस प्रान्त के प्रसिद्ध नगर बेसान में सेनाएँ एकत्रित 
 'करनी शुरू कर दीं। रूमी सम्राट हिरक्ल की भेजी हुईं बह कमुक भी 
. यहां आ मिली, जिन्हें जुलू-क्लाअ ने रोक दिया था। इस प्रकार 30- 
40 हजार की एक भारी सेना सकलार नाम्रक योद्धा के सेनापतित्व_ 
में मुसलमानों से मुकाबले के लिए तैयार आ खड़ी हुई 
. . यहां यह बात याद रखने की है कि उस समय-स्रीरिया प्रान्त छ. 
जिलों पर सम्मिलित था, जिनमें से दमिश्कु, हम्स, जार्डन 
फिलस्तीन प्रसिद्ध जिले थे। जोर्डन का हेड क्वार्टर तबरिया था, यह 
दमिश्क्‌ से चार मील पर स्थित है। तबरिया के पूरब में एक प्रसिद्ध 
झील है, जो बारह मील लम्बी है। झील से कछ ही मील के फासले 
पर एक छोटा-सा कुस्बा है, जिसका नाम उस समय सला था और 
अब फहल है। तबरिया के दक्षिण में बेसान स्थित है। इनमें आपस 
की दरी अठारह मील है। 
रूमी सेनायें बेसान में एकत्रित हुईं, तो मुसलमानों ने उनके 
सामने फंहल में पड़ाव डालां। रूमी भयभीत थे कि मुसलमान 
एकाएक उनपर आ पड़ेंगे, इसलिए उन्होंने आस-पास की नहरों के 


83. 
बांध तोड़ दिए, जिससे फुहेल से बेसान तक पानी ही पानी हो गया। 
- तमाम रास्ते रुक गए, मगर.रूमियों की यह चाल भी मसलमानों को 
आगे बढ़ने से न रोक सकी। मुसलमानों के इस साहस और दढ़ता को 
: देख कर इंसाईं समझौता करने पर तैयार हो गए! अब उबेदों, जो 
, सेनार्पात थे, उन्होंने मुआज़ इब्न जबल को वातां के लिए रूमियों के 
पास भंजा। मुआज एक-घोड़ पर सवार होकर शत्र की सेना में जा 
पहुंच और घोड़े से उतर कर ज़मीन प्र बैठ गए। रूमियों को उनकी 
सादगी पर बड़ा आश्चयं हुआ। एक व्यक्ति ने उनका घोड़ा थाम 
लिया और कहां कि आप अन्दर जाकर दरबार में बैठिए। उन्होंने 
इससे इन्कार किया। रूमियों ने चकित होकर कहा कि हम एक दूत 
के रूप में तुम्हाराआदर कंरना चाहते हैं, मगर तम्हें इसंका कछ 
एहसास नहीं। हज़रत मुआज ने कहा कि मैं उस फर्श पर, जो 
गरीबों का हक॒ छीन॑ कर तैयार हुआ है, बैठना ही नहीं चाहता। 
इंसाइ दुख प्रकट करने लगे "और कहा कि हम लोग तो सच में 
तुम्हारा आदर करना-चाहते थे, लेकिन तुमको स्वयं अपने आदर का : 
ध्यान नहीं तो मजबूरी है। हज़रत मुआज क्रद्ध हो उठें। घटनों के 
बल खड़े हो गए और कहा कि जिसको तुम आदर समझते हो, मझे 
उसकी परवाह नहीं। अगर जमीन पर बैठना गुलामों का कार्य है, तो 
मुझसे बढ़कर कौन खुदा का गूलाम हो सकता हैं? द 
रूमी उनकी उदासीनता और निर्भीकता से चकित थे, यहां 
तक कि एक व्यक्ति ने पूछा कि मुसलमानों में तमसे भी कोई बढ़कर 
है? 
उन्होंने कहा, अल्लाह की पनाह! यही बहुत है कि मैं सबसे 
बुरा नहीं हूं। रूमी चुप हो गए 
मुआज ने कुछ देर तक इन्तिजार करने के बाद कहा, अगर 
तुमको मुझसे कुछ कहना नहीं है, तो मैं वापस जाता हूं। 


हव 


स्वमयों ने कहा, हम को यह पूछना-है कि इस ओर किस 
उद्देश्य से आए हो। अबी सीनिया का देश तुमसे करीब है, फ़ारस 
का बादशाह मर चुका है और राज्य-सत्ता एंक औरत के हाथ में है। 
उसको छोड़कर तुमने हमारी ओर क्‍यों रुख किया, हालांकि हमारा 
बादशाह सबसे बड़ा बादशाह है और तायदाद में हम आकाश के 
तारों और धरती के कणों के बराबर हैं? 

मुआज ने उत्तर में कहा, सबसे. पहले हमारा आहवान है कि 
' तुम अज्ञानता-व्यवस्था छोड़कर सत्य-धर्म और कल्याणकारी 
जीवन व्यवस्था इस्लाम को अपना लो, भले काम करो, बुरे काम 
छोड़ दों। अगर तुमने ऐसा किया तो हम तुम्हारे भाई हैं। अगर 
तुमने ऐसा न किया, तो इस्लाम की राजनीतिक सत्ता को स्वीकार 
कर ही लो। हमें टैक्स दो और हम तुम्हारी रक्षा करेंगे और अगर 
यह भी स्वीकार नहीं तो आगे तलवार है। अगर तुम आकाश के 
तारों के बराबर हो तो हमें संख्या की कमी और ज़्यादती की परवाह 
नहीं। तुम्हें अगर इस पर गर्ब है कि तुम्हारा बादशाह बहुत बड़ा है, 
तो याद रखो हमने जिसको अपना बादशाह बना रखा है, वह किसी 
बात में भी अपने को श्रेष्ठ नहीं समझता। अगर वह जिना करे तो 
उसके दुर्रे लगाए जाए, चोरी करे तो हाथ काट डाले जाएँ, वह पर्दे में 
नहीं बैठता, अपने आपको हमसे बड़ा नहीं समझता, माल और 
दौलंत में उसे हम पर कोई प्रमुखता नहीं। रूमियों ने कहा-- अच्छा 
हम तुमकों बलका का जिला और जार्डन का वह भाग, जो तुम्हारी 
जमीन से मिला हुआ है, दिए देते हैं, तुम यह देश छोड़ कर फ़ारस 
जाओ।' मुआज ने इन्कार किया और उठ कर चले आए। 

रूमियों ने स्वतः सेनार्पाति अबू उबैदा से बातचीत करनी 
चाही। अतएव इस उद्देश्य से एक विशेष दूत भेजा। जिस समय वह 
पहुंचा, अब उबैंदा जमीन पर बैठे हुए थे और हाथ में तीर थे. 


55 

जिसको उलट-पंलट कंर रहे थे। दूंत॑ का विचार थीं कि सेनार्पोति 
बड़े रोब-दाब से रहता होगा और इसी से बेह पहचाना जाएंगा 
लेकिन बह जिस ओर आँख उठाकर देखता था, सेब एके रंग में डेबे 
हुए नजर आते थे। आखिर घबरा कर पूछा कि त॒म्हारा सरदार कौन 
हैं? लोगों ने अबू उबैदा की ओर इशारा किया। वह निस्तब्ध रह 
गया और आंखें फाड़-फाड़ कर उनकी ओर देखता रह गंया, पूछा, 
क्या सचंमुच तुम्हीं सरदार हो? अबू उबैदा ने कहा, 'हां।” दत ने 
कहा, हम॑ तुम्हारे प्रति सैनिक दो-दो अंशर्फी देंगे। तुम यहां से चले 
जाओ। सेनापति अब उबैदा ने साफ़ इन्कार कर दिया और प्री 
घटना से खंलीफ़ो को सूचित कर दिया। 


हजरत उमर ने उचित उत्तर लिख दिया और-हौसला दिलाया 
कि दृढ़ेता से जमे रहो, अल्लाह तुम्हारा यार और मददगार है। 


अबू उंबैदां ने उसी दिन सेना को तैयार रहने का आदेश दे 
दिया था, लेकिन-मुकूंबंले-में न आए। दो दिन के बाद खालिद मैदान 
से निंकले। केछ सैनिक उनके साथ: थे। रूमियों ने तीन टर्काड़ियां 
उनके मुकाबले के लिए भेज दीं। यह देखकर मुसलमानों की भी - 
कछ टुकड़ियां मंदद' के लिए आ मौजद हुईं। यद्ध छिड़ गयां। 
. मुसलंमान जम कर लड़े और उनकी दढ़ता को देख रूमी घबड़ा 
गए। खालिंद की दूरगामी नियाहों ने भांप लिया कि रूमी मुसलमानों 
के मुकाबले का साहस नहीं रखते, अतः सेना में एलान करा दिया 
गया कि अगले दिन निर्णायक लड़ाई होगी। 

प्रात: ही अब उबैदा ने सेना को तैयार किया। रूमियों की 
संख्या पचास हजार थी। उन्होंने भी अपनी सेना को पंक्तियों में 
विभाजित कैरके दाहिने-बाएं सरदार और सैनिक जमा किए। लड़ाई 
शुरू हो गई। रूमी धनुर्धरों ने इतेनी अधिंकता से वाण-वर्षा की कि 
मसलमानों को पीछे हंटनां पड़ा। रूमी सेना मुसलमानों की मंध्यम 


दि 86 रे का 
पंक्ति को पीछे धकेलते हुए अपनी सेना से दूर निकल -आइ, तो . 
मौके को बेहतरःजान कर इस पंक्ति के कमांडर खालिद ते इंस तरह 
पासा-बदला कि रूमी.पंक्त की पंक्त साफ हो .गईं। रूँमियों के - 
ग्यारह सरदारूउनके हाथों मारे गए। धनुप-वाण के; वबाद,तलंवारों 
'की बारी आ गई। आखिर रूमियों के पैर उखेड़ गए;और व उलट 
पांव भागे। थोड़ी देर में मैदान साफ़ हों गया, फ़हल. पंर मूंसलमानों .. 
का अधिकार हो गया। ' 
हजरत अब उबैदा ने हजरत उमर (राज ०) के आदेशानुसार 
आम ऐलान कर दिया कि लोगों की जान-माल कीं रक्षा करना , 
सरकार कां प्रथम. कर्तव्य होगा और जमीन यथावत्‌ जमीदारों के 
कब्जे में रहेगी। 
इस विजय .के बाद जार्डन जिले की: दूसरी जगहें आसानी के . 
साथ जीत लीं गईं। विजित क्षेत्र के निवासियों की जान व माल 
| 'गिरजे, मकान; जमीनें सुरक्षित रखी गईं और किसी चीज को छेड़ा 
नहीं गया, केवल मस्जिदों के. लिए- कुछ ज़मीन ली गई, लेकिन 
उसका मल्य सरकोर की ओर से. निर्यामत रूप. से अदा-कर दिया 
गया। . ४ हे 
हम्स की विंजय | 
, हम्सःको अंग्रेजी में अमीसिया कहते हैं। यह वही नगर है, जहां 
हिरक्ल के भाई थ्यूडर नें अकेले शरण लिया था। सीरिया'के नगंरों 
में से दमिश्क और जोर्डेन पर विजय प्राप्त की जा'चुकी थी। बाकी 
बैतल्माक्दस, हेम्स .और अन्तांकिया बच रहे थे। अन्ताकिया में 
हिरक्‍लं स्वतः ठहरां हुआ थां। फ़ह्ल की विजय के बाद मुसलमानों 
ने हम्स की तंरफ़ रुख किया। रास्तेःमें बालबक को बड़ी आसानी से 
मसलमानों. नें जीत॑ लियो। (४ 57 
* जब इस्लामी सेनाएँ!हम्स. के पांस पहुंचीं तो रूमियों ने बाहर 


हा 


निकल कर मुसलमानों का मुकाबला जोसिया नामक स्थान पर 
किया। खालिद के पहले ही हमले ने रूममयों की हालत को नाजुक 
बना दिया और वे भाग निकले। मुसलमानों ने आगे बढ़ कर हम्स 
को घेर लिया।-रूमियों का विचारं था कि मुसलमान सर्दी के कारण 
'आधिक समय तक उनका मुकाबला न कर सकेंगे, इसके साथ -ही 
हिरकक्‍ल का दूत आ चुका था कि बहुत जल्द कुमुक भेजी जा रही है 
अतः इस हकक्‍म के मुर्ताबक एक बड़ी सेना भेजी भी गईं, लेकिन साद 
इब्न अबी वकक्‍षकास नें, जो इराक की मुहिम में लगे हुए थे, खबर 
सुनकर कुछ सेनाएँ भेज दीं, जिसने उनको वहीं रोक लिया और 
आगे न बढ़ने दिया, आखिर मुसलमानों के ज॒वर्दस्त घेगव और 
कुमुक न पहुंचने की निराशा ने हम्स वालों को विवश कर दिया कि 
वे समझौते की प्रार्थना करें, इसे स्वीकृति दे दी गई। 
हम्स का प्रवन्ध करके अबू उबैदा स्वयं हमात की ओर बढ़े। 

हुमात वालों ने हथियार डाल दिया और जिजिया देना मंजूर कर 
लिया। इसके बाद शीराज और मरंतुन्नोमान आए। यहां भी लोगों 
ने बिना लड़ाई के अधीनता स्वीकार कर ली। वहां से अमानसा 
पहंचे और किले को घेर लिया, लेकिन किला इतना मजबूत था कि 
उस पर विजय पाना सम्भव न हो रहा था। आखिर अबू उबैदा 
(राजि०) ने बड़ी सावधानी के साथ, कुछ दूरी पर गड्ढे खुदबाए और 
रात के समय अपनी सेना को इन गड्डों में छिपा दिया। सुबह के समय 
नगर वालों ने देखा कि मुसलमानों की सेना का दूर-दूर तक पता 
नहीं, तो बड़े प्रसन्‍न हुए और समझे कि दुश्मन अब घर चले गए 
हर्षित हो नगर के समस्त द्वार खोल डाले। मुसलमानों की सेनाएँ. 
इसी इन्तिज़ार में थीं ही, गड्ढों से निकल कर नगर पर पूरे जोर से 
हल्ला बोल दिया और 'अल्लाह अकबर' के नारे आसमान में गुँज़ 
उठे। 


हे 

जब हम्स के परे जिले पंर विजय पा ली गई तो अबू उबदा ने, 
हिरकल की राजधानी पर चढ़ाई करने का इरादा किया, मेगेर 
खलीफा ने आदेश दे दिया कि इस साल और आगे बढ़ने का इरादा न 
किया जाए। अतेः हजरत उमरे (रजिं०) के आदेशानुसार सेना का 
आगे बढ़ने से रोके दिया गया और बंड़े-बड़े नंगरों में अफ़संर और 
नायब भेज दिए गाए ताकि वहां किसी प्रेकार की कोई गड़वंडी न 
होने पाए। हजरते खालिद एक हजार की सेना लेकर दमिश्के की 
ओऑ* चले गए और अब उदबद हैँम्स ही में ठहरे रहें! 


89 


यरम्‌क की लड़ाई 


रूमी, जो परास्त होकर दमिश्क्‌ व हम्स आदि की ओर से 
भागे थे, अन्तोकिया पहुंचे और हिरक्ल से फरियाद की कि अरब ने 
समूचे सीरिया को जीत लिया है, इसलिए उसे चाहिए कि वह अपनी 
इन हारों का बदला ले, ताकि जनता को शर्मिन्दा होने और देश को 
नप्ट होने से बचाया जा सके। 

रूमी सम्राट कुंसर उन दिनों अन्ताकिया में ठहरा हुआ था। 
वह निराश होकर फँसला कर चुका था कि सीरिया को अरबों के 
हवाले करके स्वयं देश से त्तकल जाए। लेकिन जब जनता ने बहत 
जोर डाला तो उसने अपने सरदारों और परामशंदातांओं से परामर्श 
लिया और कहा कि अरब तुम से शक्त में, संख्या में, हथियारों और 
सामानों में कम हैं। फिर तुम उनके मुकाबले में क्यों नहीं ठहर 
संकेते। इस पंर सबने लज्जित हो सिर झुका लिया और किसी से 
कोई उत्तर न बन पड़ा। 

लेकिन एक अनुभवी बूढ़े जरनैल ने साहस के साथ कहना श॒रू 
किया, अरब का आचरण हमारे आचरण से अच्छा है, वे रात को 
इंबादत करते हैं, दिन को रोजे रखते हैं, किसी पर जुल्म नहीं करते. 
कोई भेद-भाव नहीं करते, बराबरी का बतांव करते हैं, जबकि - 
हमारा हाल यह है कि हम शराब पीते हैं, बरे काम करते हैं, वायंदों 
का ख्याल नहीं करते, औरों पर जुल्म करते हैं- यही कारण है कि 
उनके हर काम में साहस, जमाव और हौसला पायां जाता है और 


90: हे 
कुँसर यह भाषण सुनकर तड़प उठा और उसने बड़े जोश में 
आकर लड़ाई का आदेश दे दिया कि कुस्तुनतुनिया, रूस और 
“आरमीनिया से एक निश्चित तिथि तक भारी संख्या में सेना 
अन्ताकिया को पहंच जाएँ। तमाम जिलों के अफ़सरों को लिख भेजा 
कि जितने भी आदमी जहां से मिल सकें, सेना में भर्ती करके यहां 
भेज दिए जाएं। इन आदेशों का पहुंचना था कि सेनाओं का एक 
तफान उमड़ आया। अंन्ताकिया के चारों ओर जहां तक दरष्टि जाती 
थी, सेनाओं का टिट्ठी दल फैला हुआ था। 


हजरत अबू उबैदा ने जिन स्थानों पर विजय प्राप्त की थी, 
वहां कें सरदार और जिम्मेदार उनके न्याय और इन्साफ़ से इतने 
प्रभावित हुए थे कि धर्म की भिन्‍नता के बावजूद स्वयं अपनी ओर से 
दुश्मन की ख़बर लाने के लिए जासूस नियुक्त कर रखे थे। अतएव 
उनके जरिए हजरत अबू उबैदा को तमाम बातों की सूचना मिली। 
उन्होंने तमाम अफसरों और जनरलों को जमा किया और खड़े 
होकर जोरदार भाषण दिया, और कहा- मुसलमानों! खुदा ने 
तुमको बराबर जांचा और तुम उसकी जांच में पूरे उतरे। अतः खुदा 
ने हमेशा तुमको कामियाब व सुर्खरू किया। अब तुम्हारा दुश्मन 
इस तैयारी से तुम्हारे मुकाबले के लिए चला है कि धरती कांप उठी 

. है, अब बताओ क्या: मशविरा है? 

यजीद इब्न अबी सुफियान (हजरत मुआविया के भाई) खड़े 
हुए और कहा कि मेरी राय है कि औरतों और बच्चों को नगर में 
रहने दें और हम स्वयं नगर के बाहर युद्ध के लिए पंक्तबद्ध हो 
जाएँ। इसके साथ ही खालिद और अम्र इब्न आस को पत्र लिखा 
जाएः कि दमिश्क्‌ु और फिलस्तीन से चलकर सहायता को पहुंच. 
जाएँ। ॒ 

शुरहबील इब्न हसना ने इस प्रस्ताव का प्रबल विरोध किया 


9 


और कहा, निस्सन्देह मेरे भाई ने अच्छी नीयत और भले का विचार 

करके ही यह मत व्यक्त किया है, लेकिन मैं इसं मत से असहंमत हं। 

नगर वाले सबके सब ईसाई हैं, हो सकता है, वे साम्प्रदायिक भावना 

से प्रेरित हो हमारे बाल-बच्चों को पंकड़ कर कैंसर के हवाले करः-दें 
' या खुद मार डालें। 


हजरत अबू उबैदा ने कहा, इसका उपाय यह है कि हम 
ईसाइयों को ही नगर से निकाल दें। 
शुरहबील को सेनापति का यह प्रस्ताव भी उचित न जान 
पड़ा, उन्होंने तल्काल कहा, श्रीमान, हम मुसंलमान हैं, हमने इन्हें 
वचन दिया था कि वे नगर में शान्ति के साथ रहें। आखिर हम अब 
किस तरह वचन-भंग करेंगे? 
हज़रत अबू उबैदा ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। लेकिन 
यह बात तय न हो सकी कि क्या किया जाए। अधिकांश उर्पास्थित 
जनों की राय थी कि हम्स में ठहर कर कुमुक का इन्तिजार किया 
जाए। अबू उबैदा ने कहा; इतना समय कहाँ हैं? आखिर इस पर सब 
सहमत हो गए कि.हम्स छोड़कर दामश्क्‌ चला जाए। वहां खालिद 
मौजूद. हैं और वहाँ से अरब सीमाएँ भी करीब हैं। जब यह बात तय 
हो चुकी, तो हजरत अबू उबैदा ने हबीब इब्न मुस्लिमा को जो वित्त 
अधिकारी थे, बुलाकर कहा कि ईंसाइयों से जो जिजया या टैक्स 
लिया जाता है, इस बदले में लिया जाता है कि हम उनको उनके 
 दश्मनों से बचा सकें, लेकिंन इस समय हमारी स्तथात ऐसी नहीं है 
कि हम उनकी सुरक्षा कर सकें। इसलिए उन से जो कुछ वसूल हुआ 
है, सब उनको वापस दे दो और उनसे कह दो कि हमकीः तुम्हारे 
साथ जो लगाव था, अब भी है, लेकिन चूंकि हम इस समय तुम्हारी 
रक्षा की जिम्मेदारी लेने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए जिजुया, जो 
रक्षा का मुआवजा है, तुमको वापस किया जाता हैं। चुनांचे कई 


92 


लाख की जो रक॒म वसूल हुई थी, कल वापस क़र दी गई। ईसाइयों 
पर इस बात का इतना प्रभाव पड़ा कि वे रोते जाते थे और कहते थे 
कि खदा तमको-वांपस लाए। हमने तुम्हारे युग में बड़ा आराम 
उठाया है, हम कसम खाकर कहते हैं कि हम हर्रागज कैंसर की इस 
नगर पर कब्जा न करने देंगे। तम ऐसे शासकों का मिलना असम्भव 
- है। यहँदियों पर तो इससे अधिके-प्रभाव थां। उन्होंने तौरात की 
कंसम खा कर कंहा था कि 'जब तक हम जिन्दा हैं, कैसर हम्स पर 
. कब्जा नहीं केर सकता।' यह कह कर उन्होंने तमाम दरंबोजों को 
बन्द कर लिया और चौकी-पहरा बिठा दिया। 
अब उदबैदा ने सिर्फ हम्स वालों के साथ ही यहं बंतांव नहीं 
किया, बल्कि जितनें भी जिलों पर विजय प्राप्त की जा चुकी थी, हर 
जगह लिख भेजा कि जिज़या की जितनी भी रकम बसूल हुई है. 
वापस कर दी जाए। 
तात्पर्य यह है कि अबू उवैदा दमिश्क्‌ को रवाना हुए और इन 
तमाम हालात की हजरत उमर को सूचना दी। हज़रत उमर 
(रजि०) यह सुनकर कि मुसलमान रूमियों के डर से हम्स चले 
आए; बड़े दखी हुए। लेकिन जब उनको यह. मालूम हुआ कि कल 
सेना और सेना के अफसरों ने यही निर्णय किया तो कुछ तसलली हुई , 
और अब उबैदा को उत्तर लिखा कि 'ैं सहायता के लिए सईद इब्न 
आमिर को भेजता हैं, लेकिन याद रखो कि विजय व पराजय सेना की 
तायदाद की कंमी-बेशी पुर आश्रित नहीं हुआ करती) 
अब उबैदा ने दमिश्क्‌ पहुंचेंकर तमाम अफसरों क़ों जमा 
किया और उनेसे मशविरा कियां। अफसरों ने भरसक 
अपनी-अपनी राय पेश कंर दी। इसी बीचे हजरत अग्रं इब्न आस 
का दंत पत्र लेकर पहंच गया, जिसंमें लिखा हुआ था कि आपने हम्स 
छोड़कर भारी गलती की है और इससे हमारी प्रेत्तिष्ठा को बहुत ठेस 


93 


लगी है। अबू उबैदा ने उत्तर में अम्न इब्ने आस को लिखा कि'हमने 
एक मोर्चा खालने के लिए हम्स को छोड़ा है, तुम्‌ हमसे यरमृक में 
मिलो। 

. दूसरे दिन हजरत अबू उबैदा दमिश्क्‌ से रवाना हो. गए और 
जोर्डन की सीमाओं से यरमूक पहुंचकर रुक गए। अम्र इब्ने आस भी 
यहीं आकर मिले। 

रूमी सेनाएँ.बड़ी शान के साथ यरमूक की ओर बढ़ रही थीं। 
मुसलमानों के खिलाफ़ उनमें बहुत ज़्यादा उत्तेजना. थी, उल्लास 
और उत्साह भी बहुत था। उनके उत्साह का हाल यह था कि सेना 
जिस रास्ते से गुजरती थी, वहां के ईसाई पादरी और सन्यासी-; 
कलीसा (गिरजाघर) और मठों को छोड़ कर सेना में आकर मिल 

जाते थे। 

जब मुसलमानों को इन बातों का पता चला, तो उनका घबरा 
उंठना स्वाभाविक था। हजरत अबू उबैदा ने तुरन्त खलीफा उमर 
को सूचना दी। सूचना पहुंचते ही हजरत उमर (रॉजि०) ने मुहाजिरों 
और अन्सारियों को जमा किया और उन्हें पूरी बात बताई। तमाम 
मुसलमान बे-अछ्तियार रो पड़े और बड़े जोश के साथ पुकार कर 
कहा, अमीरुल मोमिनीन! खुदा के लिए हमको इजांजत दे दीजिए 
कि हम अपने भाइयों पर अपने को कूबान कर दें। आम राय यही थी 
कि खलीफ़ा को स्वयं इस मुहिम में शामिल होना चाहिए, मगर 
सोच-विचार के बाद यही तय हुआ कि एक भारी सेना तत्काल 
मुसलमानों की सहायता के लिए भेजी जाए, लेकिन खलीफ़ा का 
जाना उचित नहीं। हजरत उमर (राजि०) ने सूचना लाने वाले दूत से 
पूछा कि रूमी यरमूक से कितने फ़ासले पर हैं। जब दूत ने बताया 
कि केवल तीन-चार मंजिल के फासले पर, तो आप थोड़े से परेशान 
हुए और कहा, अफुंसोस! समय इतना थोड़ा है कि सहायता का 


हम . रा 
पहंचना लगभग असम्भव है।' आखिर अंब 'उबैदा के नाम एके 


प्रंभावपूर्ण पत्र लिखा और हिदायत की. कि हर क्षेत्र में इसे पंढ़करं, * 
प्रसारित कर दिया जाए। 


यह विचित्र संयोग था कि जिस दिन॑ दूतः अबू उबैदां के पास. . 
आया; उसी द्विन आमिर भी हजार व्यक्तियों के साथ पहुंच गंए। 
. फिर क्या था, पूरे जमाव के साथ मुसलमानों नें भी लड़ाई की 

. तैयारियां शुरू कर'दीं। 


रूमी सेनाओं ने दैरुल-जबल में डेरे डाले थे। यह पर्वतीय क्षेत्र , 
 यरमक के ठीक सामने था। सेनाधिकारी खालिद ने लड़ाई की, 
- तैयारियां शुरू कीं, कल सेना को चार भागों में बांट दिया।. एक भागे * 
का नेतृत्व अपने पास रखा, शेष भागों पर दूसरे प्रसिद्ध जनरंलों को 
.. नियुक्त किया। द 


रूमी सेना में दो लांख से भी अधिक सैनिक थे। उन्होंने अपनी 
. सेना को कई टककडियों में -बाँट रखा था। हर टकड़ी कें आगे पादरी 
- सन्यासी थे। वे हाथों में सलीबें लिए हुए सेना में उत्तेजना पैदां कर 
- रहे थे और तौरात व॑ इंजील से संक्तों को पढ़-पंढ़ कर सैनिकों को 
लड़ने-मरने पर उभार रहे थे। 


: जब दोनों सेनाएँ एक-दूसरे के मुकाबले में आ गईं, तो एक 
वीर योद्धा रूमी ज़नरल आगे बढ़ा और कहा, क्या मुसलमानों में 
कोई है जो मझ से भिड़ संके। उधर से कैस बिजली की तरह निकले: 
और एक व्यक्ति को, जो उनसे पहले निकल चुका था, रोक कर 
रूमी जनरल के मुकाबले में आ डटे। अभी रूमी जनरल अपने 
हथियार संभालने भी न पाया था कि कैस ने पूरे जोर से हमला किया 
और उसका सिर धड़ से जुदा हो गया। फिर क्‍या था घमासान युद्ध 
शरू हो गया, यह सिलसिला रांत अंधेरे तंकःचलता रहां और रात 
आई कि लड़ाई बन्द हो. गई। 


95 


उसी रात रूमियों ने आपस मेंमर्शावरकरके यह बात तय की 
कि अरबों का मुकाबला कोई आसान काम नहीं है, इसलिए बेहतरं 


है कि उन्हें लोभ दिलाकर वापस कर दिया जाए। अगले दिन एक 


जार्ज नामक व्यक्ति मुसलमानों के पास भेजा गया, तांकि इस 
प्रस्ताव. को व्यावहारिक रूप देने कें लिए मुसलमानों का एंक दत - 
अपने साथ लाए। जार्ज ने बात करते-करते सेनापति से प्रछा, "आप . 


लोग मसीह.-को क्‍या समझते हैं?' उन्होंने जवांब दिया, 'हम उन्हें ु 


खुदा का सच्चा नबी मानते हैं।' इस सी धी और सच्ची बात कां जार्ज 


पर इतना प्रभाव पड़ा कि वह मुसलमान हो गया और वापस जाने से .. 


* साफ़ इन्कार कर दिया। मगर अबू उबैदा ने कहा, -आप:दत हैं और 
. मुसलमान किसी स्थिति में भी वचन-भंग नहीं कर सकते। अतएव 
उन्हें समझा कर वापस कर दिया। उससे अगले दिन यह निश्चय 
हुआ कि खालिद रूमियों की सेना में जाकर उनसे बातचीत करें। 
दूसरे दिन खालिद रूमियों के सैनिक पड़ाव पर गए। रूमियों ने 
अपना रौब डालने के लिए पहले से यह प्रबन्ध कर रखा था कि 
रास्ते के दोनों ओर दूर तक सवारों की पंक्तियां बना रखी थीं, ये 
सवार सिर से पांव तक लौह-कवच धारी थे। लेकिन हजरत खालिद _ 
पूरी उदासीनता के साथ और इनको कोई महत्व न देते हुए आगे बढ़ 
गए, जैसे शेर बकरियों के रेवड़ को चीरता चला जाता है। 
रूमी सेनापति बाहान के पास पहुंच कर हजरत खालिद ने 
बातचीत शुरू कर दी। सबसे पहले रूमी सेनापति ने भाषण के रूप 
में कहना आरम्भ किया। हजरत ईसा (अलै०) का गुणयान करने के .. 
बाद कैसर की प्रशंसा की और गर्व से कहा कि हमारा बादशाह 
तमाम बादशाहों का. बादशाह (सम्राट) है। ह 
हजरत खालिद तुरन्त बोल पड़े, “तुम्हारा बादशाह ऐसा ही 
होगा, लेकिन हमने जिसको सरदार बना रखा है, उसे एक क्षण के. 


96 
लिए अगर बादशाही का ध्यान आए तो हम तुरन्त उसे पदच्युत कर 
दें।' | 

बाहान ने फिर कहना शुरू कर दिया, हे अरब! तुम्हारी कौम_ 
के जो लोग हमारे देश में आकर आबाद हुए, हमने सदैव उनसे मैत्री 
भाव रखा। हमारा विचार था कि इन सुविधाओं के प्रति पूरा अरब 
आभारी होगा, लेकिन आशा के विपरीत तुम लोग हमारे देश पर 
चढ़ आए और चाहते हों कि हमको हमारे देश से निकाल दो। तुम 
शायद नहीं जानते कि बहुत-सी कौमों ने अनेक बार ऐसे इरादे. 
किए, लेकिन कभी सफल न हुईं। अब तुमको कि तमाम दुनिया में 
तमसे आधिक कोई भी कौम अनपढ़ बर्बर और जंगली नहीं, यह 
हौसला हआ है। हम इस पर भी तुम्हारे ऊपर दया करते हैं। बल्कि . 
अगर तम यहां से चले जाओ तो पुरस्कार स्वरूप सेनापति को दस 
हजार दीनार और तम्हारे अफसरों को एक-एक हजार और तुम्हारे 
सैनिकों को सौ दीनार प्रति सिपाही देंगे। 

जब बाहान अपना भाषण समाप्त कर-चुका तो खालिद ने 
कहा कि निस्सन्देह तुम बद्धिमान हो, धनवान हो, सत्तावान हो, 
तमने अपने पड़ोसी देशों के साथ जो कछ किया, वह भी हमें मालूम 
है। लेकिन यह तुम्हारा कछ उपकार न था बल्कि धर्म-प्रचार का 
तरीका था, जिसका प्रभाव यह पड़ा कि वे ईसाई हो गए और आज 
स्वयं हमारे मुकाबले में तुम्हारे साथ होकर हमसे लड़ते हैं। यह सच 
है कद हम मुहताज, तंगदस्त और बहू थे। हमारा हाल यह था हमारा 
'शक्तिवान हमारे निःशक्ति को पीसे डालता था, कुबीले आपस में 
लड़-लड़ कर नष्ट हो जाते थे। हमने अपने हाथ से बहुत-सी मूर्तियों 
को गढ़ कर उन्हें अपना उपास्य बना रखा था, हम इतने 
अन्धविश्वासी थे कि जिन्दा इन्सानों को बलि की वेदी पर भेंट चढ़ा 
दिया करते थे, लेकिन अल्लाह ने हम पर दया की और एक पैगुंम्बर 
भेजा, जो स्वयं हममें से था। वह हम सबसे ज़्यादा शरीफ, दानी, 


क्र - 
सच्चा और सदाचारी था। उसने हमें तौहीद (एकेश्वरवाद) का पाठ 
पढ़ाया और बताया कि अल्लाह एक है, उसका कोई साझी नहीं। 
उसने हमें ओंदेश दिया कि हम इन बातों को पूरी दुनिया के सामने 
' रखें। जिसने हमारे रसूल और उसकी शिक्षा को माता, वह 


मसलमान है और हमारा भाई है, लेकिन जो हमारे धर्म को पसन्द न॒' 


करे और जिजया देना स्वीकार करे तो हम उसके समर्थक और 
संरक्षक बन जाते हैं और जो इन दो बातों से इन्कार करे उसके लिए 
तलवार है, जो हम दोनों में निर्णय कर देगी। 

* लेकिन ये बातें बाहान और उसके सरदारों को क्‍यों पसन्द 
आतीं। समझौते की आशाएं धूमिल हो ग़ई और हजरत खालिद 
(रजि०) वापस चले आए। 

दसरे दिन रूमी सेनाएँ इस आनबान से निकलीं कि खालिद जैसा. 
योद्धा भी आतंकित और प्रभावित हुए बिना न रह सका। फिर भी 
खालिद. ने प्री ब॒द्धिमानी से काम किया। अरबों की सेना चालीस . 
हज़ार थी, उनकी चालीस पंक्तियां बनाई और हर पंक्ति के सिरे पर 
एक-एक वक्ता नियुक्‍त किया, जो लोगों का धर्म-उत्साह बढ़ाता 
था। अबू सूफ़ियान और अम्न इब्न आस भी प्रभावपूर्ण शब्दों में 
लोगों की वीरता और साहस को उभार रहे थे। इस लड़ाई में 
मसलमान औरतें भी मर्दों के कन्धे से कन्धा मिलाकर शत्रुओं से 
लड़ रही थीं। अमीर म॒आविया की मां और बहन बिजली की तरह . 
घूम रहीं थीं। वे इस वीरता से लड़ीं कि अब तक उनकी वीरता की 
कथा प्रचलित है।. . स्यीलक ४ 

.. रूमियों का उत्साह हर क्षण बढ़ता जा रहा था। दो लाख रूमी 
एक साथ आगे बढ़े। उन्होंने तीस हज़ार सिपाहियों को बेड़ियां पहना 
रखी थीं, ताकि उनके मन में पीछे हटने का विचार तक न आएं 


, लड़ाई शरू हई। रूमियों के वाणों ने मुसलमानों की पंक्तियों को 


चीर डाला और उनके कदम उछड़ गए। औरंतें पिछले भाग में थीं। 


98 

उन्होंने तम्ब॒ुओं के खंटे उखाड़.डॉले और कहा कि अगर तुम लोग 
पीछे हटे, तो हम तुम्हें खुंटों से मार डालेंगी। उनका यह उत्साह 
“देखकर मआंज इब्नेजबल और. उनका लड़का रूमियों की सेना में 
“ घूस गए और लोगों ने भी उनका पालन किया। उनके हौसले को 
* देखकर परी सेना जैसे जाग-सी गई हो, उखड़ते हुए कदम फिर जम 
गए। हज़रत खालिद (रजि०) ने मौके को गनीमत. जान अपनी. 
“टकड़ी को आगे बढ़ा दिया और प्री शक्ति के साथ शत्रु-सेना पर 
टट पड़े। हर ओरं सैकड़ों हाथ, बाजू-गरदनें कट-कट कर गिर रही 
थीं, ऐसा लगता था, मानो मदारी का कोई तमाशा है। इसी बीच 
इक्रिमा ने पकारा, कौन है जो मरने का प्रेण करे?” तुरन्त जान पर 
खेल जाने वाले 400 योद्धाओं ने मरने का प्रण किया और ईक़रिमा के 
साथ इतनी वीरता के साथ लड़े कि यद्यपि कट-कट-कर वहीं ढेर हो 

' गए, लेकिन रूमियों के हज़ारों वीरों को भी साथ लेते गए। 
लड़ाई घमासान की चल रही थी। हां, येह फैसला करना ._ 
.मश्किल- था कि ऊंट किस करवट बैठेगा। प्रत्यक्षतः रूमियों का. 
“पल्ला भारी था, उनकी तायदांद मुसलमानों के मुकाबले में कहीं - 
अधिक थी, उन के हथियार भी अच्छे थे और अधिक भी। पादरी 
“उनको मसीह का वास्ता दिलाकर उनमें धार्मिक उत्साह. भी पैदा 
: कर रहे थे, फिर भी मुसलमानों का उत्साह, निछावर हो जाने की 
भावना और लड़नै-मरंने का हौसला देखकर उनकी विजय की 
आशा की जा सकती थी। सईद इब्न जैद ने कई अफसरों को मार 
डाला। शरहबील रूमियों के बीच में घिरे हुए थे, मगर उनका 
साहस और जमाव अनुपम था। वे: बड़े जोश के साथ अपने 

साथियों को, उभार रहे थे।।. | 

रूमी सेनाएं बढ़ी आ रही थीं, मगर मुसलमानों के आसमान . 
सिर पर उठ लेते वाले नारों ने उनकी बढ़ती हुई रफ़्तार को रोक 
दिया। अचानक. कैस इब्न हियरा, नें, जो पिछली तरफ थे, धावा 


-. 99, 
बोल दिया और इस तेजी से हमला किया कि रूमियों के बढ़ते कृदम. 
ही नहीं रुके, बल्कि उड़ भी गए। वह उनको धकेलते हुए एक ' 
नाले तक ले गए। सईद इब्न जैद ने भी कैस का अनुपालन किया। 
नाले के पास ही इतनी घमासान लड़ाई हुईं कि नाला लाशों से पट _ 
गया, रूमियों के कृदम उखड़ गए और वे घबड़ाकर मैदान से भाग. 
निकले। 

कहा जा सकता है कि इंस युद्ध में मरने वाले रूमी सैनिकों की 
तायदाद. एक लाख से भी अधिक थी। हर 
जब कैसर (रूसी सम्राट) को अन्ताकिया में रूमी पराजंय की 
सूचना मिली, तो उसे बड़ा क्रोध आया, पर वह कर ही क्या,सकता 
था? रही-सही सेनाओं को समेट कर वह क॒स्त॒न्तनिया की ओर चला 
गया। 
हजरत अबू उबैदा ने खलीफ़ा उमर (रजि०) को विजय की 
सूचना दी। . जब हज़रत उमर (रजि०) ने सुना तो वह त्रन्त 
वास्तविक स्वामी अल्लाह के समक्ष नतमस्तक हो गए. और उसका 
शुक्र अदा किया। 
जब यहां सब कुछ शान्त हो गया तो अबू उबैदा हम्स की ओरं 
फिर 'लौटे और खालिद को कन्सरीन की ओर बढ़ने का आदेश . 
दिया। नगर वालों ने जिजिया देना स्वीकार कर लिया। 
अबू उबैदा अपनी सेनाओं को लिए कुल्ब की ओर बढ़े। वहां * 
भी लोगों ने जिजया देना स्वीकार कर लिया, लेकिन कछ ही दिनों में 
मुसलमानों का आदर्श-चरित्र और सदृव्यवहार देखकर और - 
' इस्लाम के गुणों का परिचय पा लेने के बाद सभी ने इस्लाम स्वीकार - 
“करने का ऐलान कर दिया। हे 
| अबू उबैदा वहां से अन्ताकिया पहुंचे। यह वही नगर है, जहां 
कुसर स्वयं उहरा हुआ था। चूंकि यह शाम (सीरिया) की राजधानी 


00 

थी, इर्सालए सुरक्षित और सुदृढ़ नगर.समझा जाता था। हजरत अबू 
उबैदा ने चारों ओर से नगर को घेर लिया। थोड़े दिनों के बाद 
नंगरवासियों ने तंग आकर मुसलमानों से संधि कर ली। इस विजय 
से मुसलमानों की धाक बैठ गई और मुस्लिम सेना अधिकारियों ने 
थोड़े-से सैनिकों के साथ आस-पास के नग्रों पर विजय प्राप्त कर 
ली। 
बैत॒लमक्दस में' 

बैतुलमक्दिस कई दृष्टि से मुसलमानों के लिए विशेष महत्व . 
रखता है। यह यहूदी और ईसाई मतावलम्बियों का केन्द्र-बिन्दु है 
और मुसलमान, उन तमाम नबियों पर, जो इन दोनों समूहों में आए, 
ईमान रखते हैं। इसके अलावा यह वह जगह है, जो मुसलमानों का 
क्बला रहा और जिसकी ओर रुख करके मुसलमान नमाजें अदा 
करते रहे। ..- * | 

'कुन्सरीन की विजय के बाद खलीफा के आदेशानुसार हजरत 
अबू उबैदा ने इस्लामी सेनाओं का रुख बैतुलमक़्दिस की ओर 
किया। मुसलमानों का रोब दूर-दूर तक छा चुका था, इर्सालए 
इंसाइयों ने तुरन्त समझौता कर लेना चाहा, मगर शर्त यह थी कि 
अमीरुल मोमिनीन स्वत: आकर अपने हाथ से सन्धि-पत्र तैयार 
करें। जब हजरत उमर (रजि०) को यह बात मालूम हुई तो पहले 
तो आपको आने में संकोच हुआ,फिर मश्बवरे से यही तय पाया कि 
हजरत उमर (रजि०) का बैतुलमक्दिस, जाना अत्यावश्यक और 
महत्वपूर्ण है।" अतः हजरत अली (रजि०) को अपना स्थानापन्‍्न 
बनाकर 03 रजब को आप मदीना से रवाना हुए। 

जाबिया में मुसलमान सरदारों और जनरलों ने हजरत. उमर 
(राजि०) का स्वागत किया। उनके तड़क-भड़क.कपड़ों को देखकर 
हजरत उमर (रजि०) अति रुष्ट हुए और बड़ा दुख प्रकट करते हुए 


04 

उन प्र॒र॑ कंकरियां फेंकी। उन सब ने एक, साथ मिलकंर उन्हें 
विश्वास दिलाया कि हम सबने कपड़ों के नीचे फौजी हथियार पहन 
रखे हैं, फिर निवेदन करतें हुए कहा कि शत्रु पर रोब बिठाने के लिए 
यह जरूंरी है कि हुजूर भी अपना वस्त्र बदल लें। इतना सुनकर - 
हजरत उमर का गला रुंध आया और फ़रमाया, तुम्हें मालूम नहीं हम 
अनजान, अंज्ञानी और मूर्तिपूजक थे। अल्लाह ने हमें इस्लाम की 
दौलत से मालामाल किया, क्या यह काफ़ी नहीं कि हम उसका शुक्र . 
अदा करें और उसी से पतनं-गर्त में न गिरने की दुआ करें। 

ईसाइयों के सरदांर के साथ अमीरुल मोमिनीन ने नगर का 
मुआयना किया और विभिन्‍न स्थानों की सैरं की। उसी समय की 
एकं घटना है, .वे एक गिरिजाघर को देख रहे थे कि नमाज़ का 
वक्‍त हो गया। ईसाई सरदार ने निवेदन किया, हुजूर! नमाज अदा 
कर लें। हजरत उमंर (र्राज़०) ने इंकार कर दिया और फ्रमाया कि 
अगर आजं मैं यहां नमाज अदा करूँ तो सम्भव है कि मुसलमांन इस 
विचार से कि यंहां एकं वक़त नमाज अदा की गई थी, गिरजाधर पर 
कब्जा करने की कोशिश करें। इस विचार से अमीरुल मोमिनीन ने 
एंक दस्तावेज एक और गिरिजा के पादरी को. लिख दी कि 'एक वक्‍त 
में एक मुसलंमांन से अंधिक इस गिरजाधर में दाखिल नहीं हो. 
सकते। 

जाबियां में, मुसलमानों औरं ईसांइयों के बीच जो संमझौतां 
हुंआ, वेह इंस बातं की खुली दलील है कि मुसलमानों ने विजित 
कौमों के साथ बंड़ी ही उदांरता का प्रमाण दिया है। समझौता इस 
प्रकार था 

अल्लाह का बंन्दा अमीरुल मोमिनीनं उमर अल्लाह की दया 

और कपों से बैतुंल मक्दिसं के लोगों के साथ निम्न समझौतां करता 
है 


702 


]. वह.इन्हें विश्वास दिलाता है कि इनकी जानें, जायदादें, इन 
की इबादतगाहें, इनके गिरजे, इनकी सलीबें; जिनका वे आंदर करते 
हैं, हर प्रकार से सुरक्षत होंगी और सरकार का कर्तव्य होगा कि 
उनकी रक्षा करे। ह 

2. उनको अधिकार होगा कि वे जिस तरह चाहें, गिरजों में या. 
गिरजों के बाहरं अपने विश्वासों के अनुसार इबादत करें। 

3. उनकी जायदादें और सम्पत्तियां किसी हाल में भी जब्त न 
होंगी। |; | 

4. उनके गिरजों को, किसी मस्जिद या दूसरी इमारत में 

हरागज तब्दील न-किया जाएगा, न उनकी संलीबें उनसे छीनी 
जाएंगी। 
6. यहूदी और ईसाई दूसरे लोगों.की तरह जिजिया (सुरक्षा 
कर) अदा करेंगे। 
6. यूनानी तगर से निकाल दिए-जाएँगे, मगर उनसे किसी प्रकार . 
की छेड़ख़ानी न की जाएगी। हां, जो ठहरना चाहें और वचन दें कि वे 
,शान्ति के सांथ-जीवन बिताएंगे, उन्हें रहने का- पूरा अधिकार 
होगा। वे ईसाई, जो यूनानियों के साथ जाना चाहें, अपनी पूरी 
सम्पत्ति के साथ जा सकते हैं। | 
7.-जब तक अगली फसल पक कर तैयार न हो, किसी से 
“जिजिया न बसूल किया जाएगा। « . 
इस समझौते: परः खालिद 'इंब्न -वलीद, अम्र . इब्न आंस 
मुआविया इब्न अबू सूफियान और अंब्दरहमान इब्न औफ ने गवाह ' 
के रूप में हस्ताक्षर किए। यह समझौता .आज के ' सभ्य जगत्‌ की 
आंखें खोल देने-के लिए काफी है।-. :* +* रा 

इसके बाद हजरत उमर (रजि०) बैतुलमक्दिस की ओर चले। 


03 

उनकी राजनीतिक स्थिति तो यह थी कि वे संसार की दो महान 
शक्तिग्रों- ईरानी साम्राज्य और रूमी साम्राज्य को परास्त कर चके 
थे, पर बैतुलमक्दिस की ओर जाते समय वे एक साधारण यात्री की 
तरह एक ऊंट पर सवार, अपने एक दाम के साथ रास्ते की मंजिलें 
तय कर रहे थे। दास व स्वामी- खलीफ़ा और गुलाम- में समता 
का हाल यह था कि दोनों बारी-बारी उस ऊंट पर बैठ रहे थे। इस 
प्रकार समय का खलीफ़ा कभी सवारी पर होता तो कभी पैदल, यहां 
तक कि नगर आ गया, उस समय दास के सवार होने की बारी थी 
और खलीफ़ा के नंकेल पकड़ने की। हजरत उमर (रजि०) से बहुत 
कहा गया कि आप कम से कम यहां तो ऊँट पर सवार हो जाइए, 
लेकिन उन्होंने दास को अपनी बारी निभाने की बात कही। 

बैतुलमक्दिस में आप कई दिन तक ठहरे रहे और प्रशासनिक 
कार्यों में जुटे रहे। उन्हीं दिनों की घटना है कि हजरत बिलाल 
(रजि०) ने अमीरुल मोमिनीन से शिकायत की कि अफ़सर तो अच्छे 
भेजन करते हैं और हमारे जैसे सिपाहियों को अति साधारण भोजन 
दिया जाता है। खलीफ़ा ने उसी समय आदेश दिया कि आगे हर 
सिपाही को वेतन और युद्ध में प्राप्त शत्रु के माल के अलावा अच्छा 
भोजन सरकार की ओर से जुटाया जाए। 


हम्स में दूसरी बार 

मुसलमानों की निरन्तर विजय से ईसाई परेशान हो चुके थे। 
बार-बार वे मुसलमानों से भिड़ते और हर बार उन्हें मुंहकी खानी 
पड़ती। हिरक्ल से जजीरा वालों ने सहायता मांगी कि इस बार नए 
सिरे से, पूरी शक्ति और साहस बटोर कर हम मुसलमानों की बढ़ती - 
हुई शक्ति को रोकना चाहते हैं। अत: कैसर हिरक्ल ने एक भारी 
सेना हम्स को भेज दी। दूसरी ओर से जज़ीरा वाले तीस हज़ार की 
सेना लेकर बड़ी शान के साथ मुसलमानों से मुकाबले के लिए 


है 804.- 
निकले[ सब सेनाएँ हमम्स में ईकट्ठी हूंई। 

/ अब उबैदा नें भी नगर से बाहर निर्कल कर अपनी सेनाओं को 
पंक्तिबद्ध किंयां। इन घटनाओं की सूचना अमीरुल मोमिनीन को. दीं 
गई। हजरंतं उमर (रंजि०) ने आठ विंभिंन्न स्थानों,पर फौजी 
छावनियाँ बना रंखीं थीं और हर छावनी में चार हजार घोड़े थे, जो 
इस॑ उद्देश्य से रखे गए-थें कि कभी ऐसा संयोग आंए कि केंमुक की 
जरूरत पड़े तो तुरन्त इन्हें भेज दियां जाँए। अंबू उबैदा को पत्र 
मिलते ही खलीफ ने.कछ छा्व॑नियों कें अफसरों को हिंदायतें भेज दीं 
कि. कूमुक .को लेकर तुरन्त पहुंचें। खलीफा ने केबल इतना ही 


“ नहीं किया, बल्कि वे खूद भी देमिश्क गए।. 


..... ': जंब ये खंबरें जजीरा वालों को पहुंचीं तो वे बहुत परेशान हुए 
हंम्से में लंडांई का. इरादां बदल दिया और अपनी पूरी सेनां लेकर 


जँजीरा वापस,चले गए। अरब के दूसरे कुबीले, जो ईसाईयों कीं 


मदद के लिए आएं थे, वे भी पछताएं और हंजेरत खालिद से खूफिया 
सम्पर्क पैदा करेंके कहलायों कि तुंम कहो तो हंम इसी वक्त या ठीक _ 
लड़ाई के समय ईसाइयों से अलेंग हों जोएं। खालिद ने उनकी बात॑ 
की कोई अंहंभियेत नं दी और कहँला भेजो किं चांहे तुम हेंमोरे 
मुकाबले में रहों या सेनो छोड़ेकरे चले जाओ, हंमोरे लिए सब 
बराबर:हैं और यह कि मैं प्रंधानं सेनापति नहीं हूँ। प्रधान सेनॉपंतिं 
तो हंजुरेत अंबू उंबैदा हैं और जो कूछ कहना है, उनसे कंहो। 
* - मुसलमानों की सेना को तंकॉजी बंराबंर बढ़ंतां जा रहा थां कि 
हमलो किया जाएं, लेकिन अबू उबैदां का मेन संन्तुष्टं न थां। हजरत 
खालिंद से मशबिरा लिया गया तो उन्होंने खुले शब्दों मैं कह दिया 
, कि ईसाई हंमेशां अपनी संख्यों के बेल पर लड़ते रहे,.और उनकी 
. अब बह संल्या भीं नहीं रहीं, उनकी शंकित टूट चुकी है, इसलिए . 
बिल्कुल उनें पैर धांवा बोल दींजिए। आखिर हंजुरते अंबू उबैदी 


05 
तैयार हो गए, वक्तव्य दिया, सेना का मनोबल ऊँचा किया और 
धावा बोल देने का आदेश दे .दिया। मुसंलमानों ने जोश में आकर 
इतना तेज़ हमला कियां कि ईसाई सेना के पांव उखड़ गए और पीछे 
को भांग खड़े हुए। 
जजीरा ; 
जजीरा दजला और फरात के बीच में स्थित है। इसके 
पश्चिम की ओर आर्मीनिया और एशिया माइनर है, दक्षिण की ओर 
सीरिया हैं, प्रव की ओर इराक हैं और उत्तर की ओर भी 
आर्मीनिया के कुछ भाग स्थित हैं। ; 
जब हम्स में ईंसाइयों को बुरी तरह हारना पड़ा, तो वे बहुत 
घबराए और- जजीरे पर भारी तैयारियां शुरू कर दीं। जजीरा की 
सीमा इरांक्‌ से मिली हुई थी। आप को याद होगा क इराक की 
विजय के बाद हजरत साद इराक के प्रशासक-बना दिए गए थे। 
जजीरा पर इंसाइयों के जमाव की सूचना उन्होंने तरन्त हजरत 
उमर (रज०) को भेज.दी। आपने इस मुहिम के लिए अधिकारियों 
को भेज दिया। अब्दुल्लाह इब्नुल म॒ुकम पाँच हजार की टुकड़ी 
लेकर बिजली की तरह तकरीत की तरफ़ बढ़े। तकरीत जजीरे का 
आर्राम्भक नगर हैं। शहर के चारों तरफ़ घेरा डाल दिया गया। 
' अरब के कुछ कबीले- अयाद, तग़लब और नम्न भी ईसाइयों 
की मदद कर रहे थे। जब अब्दुल्लाह को ये हालात मालूम हुए, तो 
उन्होंने इन कबीलों को पैगाम भेजा कि कितने शमं॑ की बात है कि 
तुम अरबं होकर अर्जामयों (गैर-अरंबों) की मंदद कर रहे हो। इस 
पैगरांम का इतना प्रभाव हुआ कि वे सब इस्लाम की गोद में आ गए 
और यह तय पांया कि जब मुसलमान बाहर से शहर पंर हमली करें ._ 
तो अन्दर से अरब कबीले अजमियों पर हमला कर दें। इसका फल 
यह निकला कि अंजमी बुरी तरह परास्त हुए। 


06 . 


एक महीने तक शहर का घेराव रहा और इस बीच चौबीस 
बार मसलमानों ने इस शहर पर हमले किए, जबः तकरीत पर . 
विजय प्राप्त हो गई, तो खलीफ़ा ने साद के नाम हुक्मनामा जारी 
किया कि वह अथाज इब्न गुनीम को पांच हजार सेना के साथ 
जजीरा पर हमले के लिए भेज दें और खुद शहर 'रहा' की ओर 
बढ़े। साद ने रहा पर, जो किंसी समय रूमी साम्राज्य की यादगार 
समझा जाता था, पड़ाव, डाला, फिर छोटी-छोटी झड़पों के बाद 

जजीरा के तमाम शहर जीत लिए गए 


खूजिस्तान | 
सन्‌ पन्द्रह हि० के श्रू में हजरत मुग़गीरा इब्न शोबा बसरा के 
गवर्मर मक्रर हुए थे। उन्होंने परिस्थिति का अवलोकन कर 
खलीफा को रिपोर्ट दी कि खूजिस्तान की सीमा बसरा से मिली हुई 
है, यहां के लोग बड़े ही.उपद्रवी हैं, इसालए ख़ूजिस्तान पर विजय 
: प्राप्त किए बिना बसरा में पूर्ण शान्ति का स्थापित होना असम्भव 
* है, अतः बहुत सोच-विचार के बाद सन्‌ ]7 हि० में अहवांज पर 
जिसको हुमुंज शहर भी कहा जाता था, हमला किया गया, मगर 
शहर के हाकिम ने एक सालाना रकम देनी मंजूर करके मुसलमानों . 
से समझौता कर लिया। सन्‌ ]7 हि० में मुगीरा को अलग कर दिया 
गया और अबू मूसा अशअरी उनकी जगह मुक्रर हुए। -मुगीरा के 
चले जाने क़े बाद अहवाज के हाकिम ने विद्रोह .कर-दिया और उसे ' 
सालाना रकम, जिसका उसनेः वचन दिया था, देना बन्द कर दिया: 
अबू मूसा अशअरी के लिए, सिवा उससे लड़ने के और कोई रास्ता 
न. था, अतः उन्होंने अहवाज को घेर लिया और कड़ी-लड़ाई के बाद 
शहर पर विज़य प्राप्त -कर ली। हजारों आदमी और औरतें 
गिरफ्तार-कर लिए गए। जब खलीफ़ा को इसका पता चला तो 
आपने फ़मांन भेजा कि सब मर्द और औरतें, जो गिरफ्तार किए गए 


0 


थे, छोड़ दिए जाएँ। आज्ञापालन से किसको इन्कार हो सकता था। 
अतएव सब के सब आज़ाद कर दिए गए। इसके बाद मुस्लिम 
सेनाओं ने मुनाजिर, सूस और राम पर भी विजय प्राप्त कर ली। 

उन दिनों बादशाह यज़्दगुर्द अंपने शाही खानदान के साथ 
कम में ठहरा हुआ था। एक प्रसिद्ध.-जनरल हर्मुजान एक प्रातिनिधि- 
मण्डल लेकर .यज्दगुर्द के पास हाजिर हुआ और मुसलमानों की 
बढ़ती शक्ति का उल्लेख करके कहा कि अगर मझे उनके दमन के 
लिए नियक्त किया जाए, तो निश्चय ही मुसलमानों की बढ़ती हई 
बाढ़ को रोक दूंगा। यज़्दगुर्द ने एक बहुत बड़ी सेना उसके साथ कर 
दी। हरमुजान ने शोस्तर पहुंचकर, जो खोजिस्तान का हेड क्वार्टर 
था, बहुत बड़े स्तर पर लड़ाई की तैयारियां शुरू कीं। किले की फिर 
से मरम्मत कराई, खन्दक खुदवाई और हर तरफ़ हरकारे दौड़ाए, 
ताकि वे लोगों को देश के लिए मरने-कटने पर उभार सकें। 

अबू मूसा अशअरी इन घटनाओं से ग्राफ़िल न थे। उन्होंने 
'दरबारे खिलाफ़त' में ये सब बातें विस्तार से लिखीं और सहायता 
चाही। अमीरुल मोमिनीन ने कृफ़ा के गवर्नर के नाम फरमान भेजा 
कि कृफ़ा में अब्दुल्लाह इब्न मसऊद को अपना उत्तराधिकारी 
नियुक्त करके ज़्यादा से ज़्यादा फ़ौज लेकर अबू मूसा की मदद के 
लिए पहुंंचो। 

हरम॒ज़ान को अपनी सेना पर बड़ा गर्व था। इसलिए अपनी 
शक्ति के बल पर उसने शहर से निकल कर मुसलमानों पर हमला 
किया। अबू मूसा उच्च श्रेणी के सेनार्पात थे। उन्होंने बड़ी 
ब॒ुद्धिमानी से सेना को गठित.किया। खूब जोर का मुकाबला हुआ। 
अन्त में मसलमानों को ही विजय प्राप्त हईं। हमुंजान घबड़ा गया 
उसका गवं चर-चुर हो गया, यहां तक कि उसने किलाबन्द होकर 
लड़ने में ही अपनी कशलता जानी। 


१08 

एक दिन अर्जामयों (ईरानियों) का एक आदमी अबू मूसा की 
खिदमत में-हाजिर हुआ और कहा कि अगर उसके पूरे परिवार को 
श्रण दी जाए, तो वह मुसलमानों का कब्जा शहर पर करा देगा। 
बात मान ली गई और वह अशरस नामक एक मुसलमान अफुर्सर 
को एक सुरंग के जरिए अपने साथ शहर में लें गया, फिर वहां से वह 
उसे किले में लेकर पहँचा। अजमी ने मुसलमान अफसर को तमाम 
रास्ते दिखा दिएं और ऊँच-नीच भी समेंझा दी। अबू मूसा ने पूरा 
इत्मीनानं कर लेने के बाद दो सौ योद्धाओं को अशरस के साथ भेज 
दिया, ताकि वे उसी तहंखाने के रास्ते शंहर में दाखिल होकर किला 
के दरवाजे खोल दें। अतः-उन योद्धाओं ने, जिन्होंने सत्ये- धर्म को 
विजयी बनाने के लिए जान हथेली पर रखी हुईं थी, शहर में दाखिल 
होकर पहरेदारों को मौत के घाट उतार दिया और किलें के दरवाजे 
खोल दिए। फिर क्‍या था मुस्लिम सेना विजय पताका लिए अन्दर 
दाखिल हो गई। यंह देखकर हरमुजान बु्ज पर-चढ़ गया और कहा 
कि अब मेरे पास 00 बाणं हैं, किसी की हिम्मतं नहीं कि मुझे 
जिन्दा हाथ लगांए, मैं अपने आपं को तुम्हारे हवाले करने को तैयार 
हूं, बंशर्ते कि मुझे जिन्दा अमीरुल मोमिनीन के,पास मंदीना पहुंचा 
दिया जाएं। वहीं मेरे बारे में जो फैसला करेंगे, मुझे मंजूर होगा। 


हजरत अंब मंसा ने उंसकी प्रार्थना स्वीकार कंर लीं और 
हजरतं अनस (र्राज०) को इस कार्य पर नियुक्त कर दिया कि वे, 
हरंमजान को 'दरबारे खिलाफत' में लें जांएं। हरमुजांन अपने दोस्तों 
और रिश्तेदारों के साथ मदीने की ओर चला, पूरी शांन व शौकतं 
के साथं औरं मल्यवान बस्त्रों से संसोज्जत। हेरमुज़ान समझता था 
कि जिस व्यक्ति ने तंमार्म दँनियां में हलचल मचा रखी है, वह 
निश्चय ही बहत महान होगा, बंडी शान-शौकत से रहता होगां। 
खूलीफे-ए-वंक्त से मिलनें हरेमुजांन मस्जिदे नबवी में पहंचा। 
अमीरुल मोमिनीन के बारे में मालूम किया। जब उसे एक लंम्बे कृद 


09 
और छरहरे व्यक्ति की ओर, जो फटे-पुराने कपड़े पहने जमीन पर 
सोया हुआ था, इशारा करके बताया गया कि वही अमीरुल 
मोमिनीन हैं, तो हरेंमुजान्न स्तब्ध रह गया। इसी बीच अमीरुल 
मोमिनीन की आंख खुल गई। दुर्भाषए के जरिए बात-चीत हुई। 
अपको बड़ा दुख था कि उस व्यक्ति ने दो मुसलमान जनरलों को. 
मार डाला हैं। अभी वह सोच ही रहे थे कि उसके बारे में क्या हुक्म 
दें कि हरमुजान ने कहा कि जब तक वह पानी न पी ले, उसके कृत्ल 
का हुक्म न दिया जाए। हजरत उमर (र्राजु०) सहमत हो गए। जब 
पानी का प्यालां हरमुजान के सामने आया, तो उसने प्याला लेकर 
“जुमीन पर रख दिया और कहा कि मैं पानी कदापि न पीयूंगा और 
वचन के अनुसार जब तक मैं पानी न पी लूं, आप मुझे कत्ल नहीं 
कर सकते। हजरत उमर (रजि०) उसकी इस चाल पर मुस्कराए 
हरमुजान ने कहा, 'मैं पहले ही से मुसलमानों के भाई-चारे से 
प्रभावत होकर इस्लाम कुबूल कर चुका हूं और अब फिर दोबारा 
कलिमा पढ़ता हूं। मैंने यह बहाना इर्सालए किया कि लोग यह न 
सोचें कि तलवार की डर से मैंने इस्लाम स्वीकार कर लिया है। 
हजरत उमर (राजि०) ने दो हजार अशरफ़ी सालाना उसका वजीफ़ा 
तय किया और वह अमीरुल मोमिनीन के करीबी लोगों में से हो 
गया। 
शोसतरु की विजय के बाद मुसलमानों ने जुन्दी साबूर का 

घेराव कर लिया और विजय 29200 हाथ लगी। इस शहर 
पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद खू के पूरे क्षेत्र पर 
मुसलमानों को विजय प्राप्त हो गई। 


0 


कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ 


« जिनः दिनों रूमी..और ईरानी साम्राज्य के बड़े-बड़े गढ़ 
मुलसमानों के कब्जे में आते जा रहे थे और हजरत खालिद और अबू 
उबैदा जैसे सेनार्पातयों और जनरलों: के चामत्कारिक कारनामों की 
धूम मर्ची हई थी, उसी समय हजरत खालिद का सेनार्पाति-पद से 
हटाया जाना और अमवास की बबा का फैलना इस्लामी ईतिहासं की 
महत्वपूर्ण घटनाओं में से है। 

कहा जाता हैं कि हजुरत उमर, हजरत खालिद से, प्रशा्सानक 
दृष्टि से सन्तुष्ट नहीं थे, इसलिए कि हजरत खालिद केन्द्र को 
हिसाब-किताब भेजने में बड़ीं सस्ती दिखाते थे। उन्हें बार-बार 
सचेत किया गया कि वे अपने कत्तंव्यों के निभाने में कोताही न किया 
करें, मगर उन्होंने यह कह कर टाल दिया कि मैं हजरत अबूबक़र 
सिद्दीक के संमय में*भी ऐसा ही करता रहा हूं, इसलिए मजबूर हूं। 
हजरत उमर (रॉजि०) जैसे सच्चरित्र और अनुशासन प्रिय व्यक्ति 
इस उत्तर से कैसे सन्तुष्ट हो संकते थे? आपने स्पष्ट कह दिया कि 
बे सिर्फ इस शंतं पर सेनार्पात रह सकते हैं कि हिसाब निर्यामत रूप 
से केन्द्र को निधांरित समय पर भेज दिया करें। मगर जब यह 
खालिद को मंजूर न हुआ तो उन्हें सेना्पत-पद से हटाकर सेकेण्ड 
इन कमांड मुक्र्रर कर दियां गया और हजरत अबू उबैदा को 
सेनापति बना दिया गया। 

इसी तरह उन्होंने एक व्यक्ति को, जिसने उनकी शान में 
कुसीदा पढ़ा"था, दस हज़ार अशरफ़ी की भारी राशि परस्कारं-के 


0 || 
तौर पर दी थी। जब हजरत उमर (रजि०) को इस बात की सूचना 
मिली, तो वे बहुत नाराज़ हुए और कहा कि अगर यह रकम 
बैतुलमाल से दी गई है, तो खियानत है और अगर अपनी गिरह से दी . 
गई है तो फिजूलख्ची है। - 

हजरत उमर (र्राजु०) ने हज़रत अबू उबैदा के पास फ़रमान' 
जारी किया कि वें: आम मुसलमानों के सामने खालिद की 
-जवाब-तलबी करें। अगर वह गलती को मान लें, तो उन्हें माफ़ कर 
दिया जाए हे ५ 
, - अबू उबैदा फ़रमान पढ़ कर अवाक्‌ रह गए।वे जानते थे कि 
खालिद किस श्रेणी के जनरल हैं,लेकिन फिर भी खलीफ़ा का फ़रमान 
था, इर्सालए उसकी अवज्ञा भी नहीं की जा,सकती थी.। विवश हो. 
उन्होंने हजरत खालिद को बुलवाया और भरी सभा में फ़रमान 
सुनाया। हजरत खालिद खामोश रहे,दूसरी बार फिर फ़रमान पढ़ा . 
गया, वह फिर खामोश रहे। हजरत बिलाल आगे बढ़े, उन्होंने 
जनरल के सिर से अमामा (पड़ी) उतार कर उसी अंमामा से 
उनके हाथ कमर के पीछे ले जाकर बांध दिया। कैसी थी वह घड़ी! 
बह योद्धा, जिसका नाम सुनकर संसार के बड़े-बड़े योद्धा क्राँप उठते 
थे, एक अपराधी की हैसियत से मस्जिद में खड़ा है। तीसरी बार 
फिर पूछा गया कि ये रुपये तुमने कहां से लिए? जवाब में हजरत 
खालिद ने कहा कि यह मेरा अपना रुपया था। हज़रत बिलाल नें 
तुरन्त उनके हाथ खोल दिए और खलीफ़ा के दरबार में पहुंचने का 
हुक्म सुना दिया गया। 
खलीफ़ा के दरबार में पहुंचते ही अपील की गई मेरे साथ 
अन्याय किया, गया हैं। 
हजरत उमर ने पूछा, तुमने इतनी दौलत कहां से ली है? ' 
खालिद ने जवाब दिया, 'अपने हिस्से के युद्ध में प्राप्त माल 


80 . 
से।' - ६३5 ! 
मेरे हिसाब के मुताबिक मेरे हिस्से में साठ हजार अशर्फ़ी होनी 
चाहिए 

अत: उनका हिसाब चेक किया गया तो अस्सी हजार निकला। 
. बीस हजार की रकम बैतुलमाल में दाखिल “की ग़ई। फ़िर हजरत 
खालिद को सम्बोधित करके खलीफ़ा हजरत उमर (र्राजु०) ने कहा 
खदा की कसम! खालिद तम मझे प्रिय हो, मैं दिल से तुम्हारा आदर 
करता हूं। 
: इसके बाद अमीरुल मोमिनीन ने तमाम राज्यपालों को 
: लिखवाया कि हजरत खालिद को बद-दयानती या नाराजगी की 
बजहं से पद-च्यूत नहीं किया ग़या, बॉल्क मैं देखता हूं कि जनता उन 
. पर लटट हो रही है। वह समझने लगी है कि तमाम लड़ाइयां खालिद 
की वजह से जीती जा रही हैं और असली विजय देने वाले अर्थात्‌ 
खुदा को लोग भूल रहे हैं। 
कैसी विचित्र है यह घटना कि इतने बड़े योद्धा से साधारण 
मनष्य जैसा बर्ताव किया गया। इस घटना से हजरत खालिद की 
शालीनता और हजरत उमर (रजि०) की सावधानी और सतर्कता 
का पता चलता है।.इस घटना के क॒छ वर्ष बाद ही एक रेगिस्तांनी 
क्षेत्र में, जहां वह मदीना से प्लेग से डर कर भाग आए थे; बड़ी 
बेबसी की हालत में अपने असली मालिक की तरफ़ रुजू कर गए। 
मौत के समय वे अपने बाज़ओं और जिस्म के घावों को, जो उन्होंने 
विभिन्‍न लड़ाइयों में पाए थे, दिखाते हुएं दहाड़ें मार-मार कर रौते 
थे और कहते थे कि मैं मौत से डरकर यहां आया, मगर मौत ने मेरा 
, पीछा न छोड़ा, मैं कभी मौत से नहीं डरा. था, मगर.आज मौत के 
- विचार ने मुझे बहुत.निढाल कर दिया है। 


वाउ 


अमवास की वबा 

संन 8 हि० में सीरिया, मित्र और इसकं॑ में इस जोर का प्लेग 
फैला कि उसने इन क्षेत्रों में भारी तबाही मचा दी। सन्‌ [7 हि० के 
आखिर में ववा फैली और कई महीनें तक जारी रही। अमीरूल 
मोमिनीन खुद सुरगृ. नामक॑ स्थान पर पहुंचे और सेना को कुच-का 
हक्‍म दे दिया। हजरत अबु उबैदा भांग्य पर बंहत ज्यादा विश्वास 
रखते थे, उन्होंने इसका विरोध कियां। लोगों के आग्रह पर 
अमीरुलमोमिनीन मदीना लौट गए। वहां पहंच कर आपने अब 
उबैदा को 'दरबारे खिलाफ़त' में तलब किया। अबू उबवैदा समझ 
गए कि फिर कूच का ह॒क्‍म देने के लिए बुलाया जा रहा है, इ्सालए 
उन्होंने मदीना जाने की अधिक चिन्ता न की। 

हजरत उमर (र्गज्‌०) वहृत परेशान और चिन्तामग्न रहा 
करते थे, आखिर अबू उबैंदा को साफ़-साफ़ लिख भेजा कि जहां 
सेना ने डेरे डाल रखे हैं, वह जगह नशेब में है और नम है, तुम 
लोगों की जानें खामखाही वरबाद कर रहे हो।अबू उबैदा ने फ़रमान 
के मुताबिक कूच किया और जाबिया में जाकर डेरे डाल दिए। यह 
जगह जलवायु की दृष्टि से बहुत अच्छी समझी जाती थी, मगर 
जाबिया पहुंच कर अबू उबैदा बीमार हो गए। काफ़ी इलाज किया, 
लेकिन कोई फ़ायदा न हुआ। जब उन्हें जान बचने की आशा न रही 
तो जोरदार शब्दों में सेना को नसीहत की और स्वयं अंपने रब से जा 
मिले। 
उनके बाद हजरत मुआज सेनार्पति नियुक्त किए गए। कुछ 
दिनों के बाद मुआज के बेटे वीमार हुए और आनन-फानन देहान्त 
हो गया। उन्हें दफ़न कंरके वापस आए, तो खुद बीमार पड़ गए. और 
तत्काल मृत्यु के शिकार हो गए। हज़रत मुआज के बाद हजरत 
अम्र इद्न आस सेनार्पात नियुक्त किए गए। 5 


वाबः 


बीमारी इतने जोरों पर थी कि कछ ही दिनों में पच्चीस हजार 
मसलमान मौत के घाट चढ़ गए। हजरत अम्र इब्न आस न तमाम 
लोगों को एकत्र करके एक वक्तव्य दिया कि जब महामारी शुरू 
- होती है, तो आग की तरह फैलती है, इसलिए तमाम सेना को यहाँ से 
उठकर पहाड़ों पर चला जाना चाहिए। कछ लोगों ने उनसे मतभेद 
किया. और कहा कि,यह भाग्य के विरुद्ध है, मगर अधिकांश 
व्यक्तियों ने सेना्पात क्री बात मान ली और महामारी का खतरा दूर 
हो गया। अब उबैदा, हारिस इब्तन हिशाम, यजीद इब्न अबी 
* सफियान, मआज इब्न जबल, स॒हैल इब्न उमर और उत्बा इब्न सुहैल के 
अलावा कई बजर्ग हस्तियां इस महामारी का शिकार हुईं 
अमीरुलमोमिनीन को तमाम घटनाओं से सूचित किया जाता रहा। 
जब यज़ीद इब्न-अबी सुफ़ियान और मुआज़ इब्न जबल की वफात की 
खबर खलींफा को मिली तो अमीरुल मोमिनीन को भी परेशानी हुई 
आखिर मआओविया को दमिश्क्‌ और शुरहबील को जार्डन का गवनर 
मक्॒रर फ़रमाना॥इंस महामारी की वजह से इस्लाम की विजयों का 
जोर कम हो गया। लोगों की हालत ना-काबिले बयान थी। जब 
अमीरुल मोमिनीन को तबाहकारियों की तफ़्सील मालूम हुई तो वे, 
तड़प उठे और हजरत अली को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करके 
स्वयं सीरिया को चल पड़े। दो दिन ऐला में रुकने के बाद दमिश्क्‌ 
पहंचे, सेना को वेंतन दिए। .जो लोग मर चुके थे, उनर्क जायज 
वारिसों को बलाकर उनकी मीरास उन्हें दिला दी। कई एक नई 
छावनियां कायम कीं, खाली जगहों पर नए पदाधिकारी नियुक्त किए. 
तात्पर्य यह कि प्रा इन्तिजाम करके वापस लौट आए। 


कीसारिया की विजय 


कीसारिया पुराने समय का बड़ा प्रसिद्ध नगर था। यह नगर 
सीरिया के तट पर स्थित था और फ़िलस्तीन-का बहुत महत्वपूर्ण 


[5 
जिला समझा जाता था। कहा जाता है कि इसके तीन सौ से अधिक 
बड़े और बा-रौनक बाजार थे। इस शहर पर सन्‌ ]3 हि० में अग्र. 
इब्न आस के सेनापतित्व मैं मुसलमानों ने चढ़ाई की, मगर उस पर 
विजय न पा सके। हज़रत उमर (रजि०) ने यजीद इब्न अबी 
स॒फ़ियान को अबू उबैंदा की जगह सेनापति नियुक्त करके 
कीसारिया पर धावा बोल देने का हुक्म दिया। मगर जब सन 3 
हि० में उनकी भी मृत्यु हो गई तो उनके भाई अमीर मुआविया को 
यह सेवा सुपुर्द की गईं। अमीर मुआविया ने बहत बड़ी सेना लेकर 
कीसारिया पर हमला कर दिया, अर्से तक घेराव पड़ा रहा। इस बीच 
कई बार शहर वालों ने निकल कर मुसलमानों का मुकाबला किया, 
न तो शहर ही जीता जा सका, न शहर वाले ही मुसलमानों को 
पसपा कर सके। आख़िर यूसुफ़ नामक एक यहूदी ने मुसलमानों को 
एक सुरंग का पता दिया, जो शहर के नीचे से गुजरती हई किले के 
दरवाजे तक पहुंचती थी। मुसलमान उस रास्ते से किले तक पहुंचे 
और किले के दरवाजे खोल दिएँ। इस जोर की लड़ाई हुई कि अस्सी 
हजार इंसाई काम आए और मुसलमानों ने शहर पर विजय प्राप्त 
कर ली, चूंक यह सीरिया का बड़ा अहम शहर था, इर्सालए 
लगभग पूरे सीरिया पर मुसलमानों की विजय घोषित कर दी गई। - 


6 


_अजेंमी इराक 


इराक भूं-भाग' दो भागों में विभाजत थो। पश्चिमी भाग की 
_ अरबी इराक और पूर्वी भाग को अजमी इराक कंहंते हैं। 

... ईरानियों का खयाल था कि अरब लूटमार और कत्ल व गांरत - 
के लिए :उठे हुए हैं और सीमावर्ती भागों को, लूटकर उनकी यह 
कामना पूरी हो जांएगी। फिर वे अपने घरों को लौट जाएंगे, लेकिन 
जब खूजिस्तान पर विजय मिल गई, तो उन्हें असली खतरे का. 
एहसास हुआ। अतः ईरानी-सम्राट ने हर ओर हरकारे और दूत दौड़ा ' 
दिए, ताकि इस ख़तरे की सूचंना बस्तीं-बस्ती, घर-घर पहुंच जाए। 
फिर क्‍या था, समूचे देश में एक हलचंल मंच गई। देश र्की 
परम्पराओं को बाकी रंखने के.लिए लगंभगं डेढ़ लांख आदमी ईरानी 
झंडे तले कुम में आ जमा हुए। | * 

अमीरुलमोमिनीन को तमाम घटनाओं की सूचना मिलती 

. रहीं। कफ़ा के गवर्नर हजरतं अम्भार इब्न यासिर (राजि०) ने 
'ईरानियों की जबरदस्त तैयारियों के हालात सविस्तार लिखकर भेजे 
थे। हजरतं उंमर [रजि०) वह पत्र लिए हुए मस्जदे नबवी में 
दाखिल हुए और उन्होंने अंपने वरिष्ठ साथियों से मशंबियं चाहा । 

: अपना मत व्यक्त करते हुए तलहा इब्न उबैदुल्लाह ने कंहा' 

कि अमीरुलमोमिनीन! इस नाजुक घड़ी को आप हम सबसे बेहतर 

- समझतें हैं, इसलिए अपने अनुभव के आधार पर यथोचिंत आदेश 
दें। हज़रत उस्मान ने राय दी कि सीरिया, यमन और बसंय के 


7 


गवर्नरों को हिदायत की जाए कि वे अपनी सेनाओं के साथ लड़ाई के 
मोर्चे पर पहुंच जाएं. और खलीफा खूद कूफ़ा जाकर उचित प्रबन्ध 
करें। अधिकांश को यह राय पसन्द आईं, मगर हजरत अली 
(रजि०) ने उसका विरोध करते हुए फ़र्माया कि मुझे मर्शावरा सही 
नहीं जंच रहा है। जब मुसलमानों की सेनाएँ सीरिया, यमन और 
बसरा से चल देंगी तो सीमा के लोग विद्रोह कर देंगे। अमीरूल 
मोमिनीन का मदीना से चला जाना भी सही न होगा, मेरी राय है कि 
अमीरुल मोमिनीन मदीना में ठहरे रहें और यमन, बसरा और 
सीरिया से सिर्फ़ एक-एंक तिहाई सेना को समर-दक्षेत्र में उतारा 
जाए। 

हजरत उमर ने हजरत अली की राय से सहर्मात व्यक्त की। 
अब सेनार्पात की नियुक्ति का प्रश्न था। आमतौर से यही कहा जा 
रहा था कि इसका बेहतर फैसला अमीरुलमोमिनीन ही कर सकते 
हैं, इसलिए यह: काम उन्हीं के सुपुर्द किया गया। बहुत कुछ 
सोचने-समझने के बाद हज़रत उमर (र्रजु०) ने नोमान इब्न 
मुर्कारन का नाम पेश किया, सब इस नाम पर सहमत थे, अतः - 
उन्हीं को इस पद पर नियुक्त कर दिया गया। 

नोमान इब्न मुकरिन तीस हजार सिपाहियों को लेकर कृफ़ा से 
युद्ध-क्षेत्र की ओर चले। बड़े-बड़े योद्धा सहाबी साथ थे। हजरत 
उमर (रजि०) ने इस्लामी सेनाओं के नाम, जो पहले से फ़ारस में 
मौजूद थीं,फ़रमान भेजा कि वे ईंरानियों को नहादन्‍्द की ओर बढ़ने 
न दें, अतएव जासूसों ने रिपोर्ट दी कि नहादन्‍्द तक रास्ता बिल्कल 
साफ है, इर्सालएं नोमान बिना किसी बाधा या कष्ट के बढ़ते चले 
गए और नहादन्द से 9 मील के फ़ासले पर जा डेरे जमाए। 

ईरानियों ने भी मुसलमानों से निबटने के अनेक उपाय शुरू 
कर दिए। एक दूत अरबों के पास भेजा, ताकि समझौता करने के 


48 


लिए अरवों के किसी विश्वसनीय व्यक्त को साथ लाए। हज़रत 
नोमान ने इस काम के लिए मुगीरा इब्न शोबा को नियुक्त किया। 
ईरानियों ने अपनी आदत के मुताबिक अरबों पर रोब डालने के लिए 
बड़े ठाठ से दरबार सजाया। मर्दांन शाह ताज पहन कर तख्त पर 
बैठा, आस-पास राजकुमारों और वरिप्ठ ऑधरिर्कास्यों की पंक्तियां 
स्जी। नंगी तलवारें आंखों को चकाचौंथ्र किए दे रही थी। लेकिन' 
इन बातों का प्रभाव अरब मुसलमानों पर कहां पड़ने वाला! जम कर - 
बातें कीं। पहले मर्दांन शाह ने खुशामद की, लॉकन खुशामद से 
काम न चला तो राव डालने की काशिश की, लेकिन यह चाल भी 
बेकार हो गईं, यहां तक कि मुस्लिम दृत नाकाम होकर वापस-चला 
आया और दोनों तरफ से लड़ाई की तैयारियां शुरू हो गईं। 
: अर्जामयों ने तमाम मैदान में गोखुरू बछा दिए, ताकि 

मसलमानों को आगे बढ़ने में काठनाई हो। वे खुद किला बन्द थे 
और जब चाहते, अचानक मुसलमानों पर हमला करके उन्हें 
न॒कसान पहुंचा देते। 


नोमान ने इस संबंध में अपने परामशंदाताओं को इकट्ठा 
किया, परामर्श लिया और बात यह तय पाई कि कुछ टुकंड़ियां तो 
वहीं ठहरी रहें, जहां पहले पड़ाव डाला था और शेष सेना सात-आठ 
मील की दरी पर चली जाएं, इस तरह ईरानी सेनाएं थोड़े लोगों को 
देखकर हमला करेंगीं, फिर उन्हें निशाने पर लेंकर जोर का हमला 
बोल दिया जाएगा, इस तरह पूरी ईरानी सेना पसपा होकर रह 
जाएगी। 
जैसा सोचा गया, वैसा ही हुआ। ईरानी सेनाएँ मुसलमानों पर 
टट पडीं। मसलमान पीछे हटते चले गए। यहां तक कि वह घड़ी आ 
गई और योजना के अनुसार मुसलमान सेना ईरानियों पर टूट पड़ी। 
घमासान लड़ाई हुई, खून की नदियाँ बह-गईं, मैदान में खून 


49 


इतना बहां कि घोड़ों को संभालना कठिन हो गया। अलावा दूसरे 
घोड़ों के, नोमान का घोड़ा भी फिसल कर ऐसा गिरा कि वे: भी गिर 
पड़े और काफ़ी घायल हो गए। ज्यों ही वह गिरे, उनके भाई ने झंडा 
थाम लिया। नोमान का हुक्म था कि अगर मैं गिर जाऊँ, तो कोई 
व्यक्ति लड़ाई को छोड़कर मेरी ओर अपना ध्यान न लगाए। एक 
सिपाही ने उन को देखा और सहायता के लिए उनके पास बैठना 
चाहा, मगर सेनापति के हुक्म की याद आते ही,तुरन्त वहाँ से चल 
दिया। मुसलमानों के हमले की बढ़ी हुई ताकत ने ईरानियों के कदम 
डगमगा दिए। हजरंत नोमान ने आँखें खोलीं, पूछा, लड़ाई का 
अंजाम क्‍या रहा? कोई बोला, मुसलमान विजयी हो गए। तुरन्त 
अल्लाह का शुक्र अदा किया और कहा, जल्द से जल्द अमीरुल 
मोमिनीन को खबर पहुंचाओ।यह कहकर उनके प्राण पखेरू उड़ गए। 

रात तक लड़ाई. का सिलसिला जारी रहा। मुसलमानों का 
उत्साह और मनोबल अपने उत्कर्ष को पहुंचा हुआ था। ईरानियों के 
पाँव उखड़ चुके थे, आखिर वे भाग निकले। मुसलमानों ने उनका 
पीछा किया और नहादन्द तक उनको धकेलते हुए ले गए, यहाँ के 
अग्निपूजक पुजारी ने निवेदन किया, अगर उसकी जान बरूशी की 
जाए, तो वह एक अमूल्य निधि का पता देगा। उसने सम्राट किसरा 
परवेज के मूल्यवान हीरे-जवाहरात के खजाने का पता दे दिया। 
हज़रत हुज़ैफा ने, जो हज़रत नोमान के बाद सेनापतित्व का पद संभाले 
हुए थे, युद्ध में प्राप्त तमाम माल को सैनिकों में बाँट दिया और . 
हीरे-जवाहरात के साथ माल का पांचवां हिस्सा अमीरूलमोमिनीन 
की खिदमत में भेज दिया। 

हजरत उमर (रज०) को कुछ समय से युद्ध-स्थिति की 
सूचना नहीं मिली थी, इस कारण बहुत ज़्यादा चिन्तित थे कि इसी 
बीच दूत आ पहुंचा। आप सफलता की सूचना से अति प्रसन्न थे 


20 
लेकन जब नोमान की मृत्यु का हाल सत्ता, तो वहत दर तक रात 
रहे। जब दुत ने कहा, और भी बहत से सहावी और असंख्य 
मसलमान शहीद हए हैं, जिनको हजुर नहीं जानते, तो आप बेहत 
ही रोए और कहा, उमर जाने या न जाने, मगर खूठा उनकी जानता 
है। जब हीरें-जवाहरात सामने लाए गाए ता अमीरूलमोमिनीन ने 

वापस कर दिए और कहा कि ये वापस ल जाओ और उन्हें बचकर 
सेना में बांट दो। ये जवाहरात चार करोड़ दिरहम में बिके और रकम 
सैनिकों में बांट दी गई। 

मसलमानों की इस विजय से इंरानियों का जोर टूट गया और 

उनकी !शॉक्त क्षीणप्राय होकर रह गई 


सैनिक-चढ़ाई 


मसलमानों को आज तक जितनी लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं, वे 
केवल देश की रक्षा के लिए थीं, हाँ अरवी इराक ऐसा देश था, जिस 
मसलमानों ने अपने राज्य में शामिल कर लिया। इसका कारण यह 
था कि इस क्षेत्र में जो लोग आबाद थे, वे अरबी नस्ल के थे उनकी 
भाषा अरबी थी। अलबत्ता, इधर जो लड़ाइयां हुई, उनक कारण 
स्वयं पैदा हो गए थे। मुसलमान लड़ने पर मजबूर थे, वरन हजरत 
उंमर (राज०) कहा करते थे कि काश! हमार और फ़ारस के बीच 
आग के पहाड़ हो जाते, ताकि हम फ़ांसस पर और फारस वाल हम 

. पर हमलावर न हो सकते। 
हम पहले ही लिख चुके हैं कि ईरानियों के मन में अरबों के 
खिलाफ अति विद्वेष-भाव पाया जाता था। बार-बार हारन की 
वजह से वे चोट खाए नाग की तरह तिलमिलाग्ा करते थे और 
रात-दिन सोचा करते थे कि किस तरह अरबों को परास्त कर अपन 
मांथे का कलंक मिटाएं। वें क्षेत्र, जिन पर मुलमानों का कब्जा हा 
चकका था, ईरानियों के दिल में कांटा बन कर खटकते थे और उनकी 


॥९4॥ 
काॉशिश रहती थी कि वहां एक ऐसी महाक्रान्ति आ जाए कि 
मुसलमानों गं के कृदम उखड़ जाएं, मानो ये इंरानी ऐसे खतरनाक 
पड़यन्त्र रच रहे थे कि अगर इन पर तत्काल ध्यान न दिया जाता, 
५ इस्लामी राज्य के लिए बगबर खतरा बना रहता। 
इधर मुसलमानों का यह हाल था कि जिन क्षेत्रों पर उनका 
आधिकार हुआ था, उनकी कोशिश रहती कि ब्वहां के निवासियों को 
हर प्रकार की सुख-सुविधा पहंंचाएं, मगर इन पड़यन्त्रकारियों के 
कारण नतीजा हमेशा उलटा निकलता। यह एक एसी स्थिति थी कि 
इस पर ध्यानपूर्वक विचार होना चाहिए था। खलीफ़ा ने अपनी 
मन्त्रणा-परिपद बुला ली, कारणों पर विचार किया जाने लगा। खूब 
सोच-विचार के बाद निष्कर्प यह निकला कि जब तक-यज़्दगुर्द का 
पूरी तरह देश से निवांसन न हो जाए, साजिशों का सिलसला खत्म 
नहीं हो सकता। चूंकि तख़्ते कियान का वारिस मौजूद है, इसलिए 
ईरानियों का विचार है कि उनके हाथ-पांव मारने से इंरानी साम्राज्य 
की [पुनस्थांपना हो जाएगी। 
इन कारणों से हज़रत उमर (र्राज०) ने सामान्य सैनिक चढ़ाई 
का निश्चय कर लिया। कई जहाज अपने हाथ से तैयार किए। हर | 
क्षेत्र के लिए सेना और सेनाधिकारी तैनात किए। खुरासां का चार्ज 
अहनफ़ इब्न कुँस को, सावृह और उर्दशेर, मुजाशिअ इब्न मस॒ुऊद 
को, असतखर उस्मान इब्न आस को, फसा सीरीया को, किरमान 
सुहैल इब्न अदी को, असफ़हान अब्दुल्लाह को, सीस्तान आसिम 
इब्न उमर को, मकरान हक्‍्म इब्न उमैर को सुपुर्द कर दिया। 
अब्दुल्लाह इब्न अब्दुल्लाह ने सन॒ 2। हि० में बड़ी तैयारी के 
साथ असफ़हान पर चढ़ाई कर दी। ईरानियों ने पूरे जमाव के साथ 
उनका भी मुकाबला किया। ईरानी सेना का सेनार्पात इस्तज़ार था, 
जो बड़ा ही निडर, वीर योद्धा था। पहले प्रथम पंक्ति का कमांडर 


]22 

जावदिया आगे बढ़ा और कहा कि मुसलमानों में से जिस को साहस 
हो, मेरे मकाबले में आकर अपना भाग्य-निर्णय करें। हजरत 
अब्दल्लाह स्वयं आगे बढ़े और जावदिया उनके हाथ से मारा गया। 
इसके बाद असफहान के सरदार ने मुस्लिम सेना को सन्देश 
भिजवाया कि सेनाओं का लड़ाना खामखाही लोगों का कत्ल कराना 
है, इर्सालए बेहतर होगां कि केवल हम और तुम लड़कर फैसला कर 
लें। अब्दल्लांह ने इस शर्त को मंजूर कर लिया। रईस का नाम 
फाजतफान था। दोनों योद्धा भिड़ गए। सरदार ने बड़ी शान से 
अब्दल्लाह पर हमला किया। हजरत अब्दुल्लाह न बड़ी फर्ती और 
बहादरी से हमले को रोका। सरदार ने अपना भविष्य देख लिया 
समझ गया कि अब हारने के अलावा कोई रास्ता नहीं, तुरन्त बोला 
कि मैं समझौता चाहता हं और शर्त यह है कि शहर वालों में.स जा 
चाहे जिजिया देकर मुस्लिम-राज्य में शान्तिपूर्ण जीवन बिताए और 
जो जिजिया देना स्वीकार न करे, वह शहर से चला जाए। हजरत 
अब्दल्लाह ने इसें भी मंजूर कर लिया और समझौता हा गया। 


उसी जमाने में पता चला कि हमदान में विद्रोह हो गया है। 
खलीफा हजरत उमर (र्राजु०) ने नोमान इब्न मुकरिन को बारह 
हजार की सेना के साथ इस द्रोह दमन पर नियक्त किया। वहाँ 
मसलमानों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। घरा डाल 
पड़े हुए थे, मगर शहर था कि,उस पर विजय किसी प्रकार मिल ही 
नहीं पा रही थीं। हमदान के अलावा आस-पास के तमाम क्षेत्रो पर 
कब्जा हो चुका था। मुसलमानों के दूसरी जगहों के जीतने की खूब 
चर्चा थी। जब हमदान के नागरिकों को इसका पता चला तो उन्‍्हान 
पृष्टि के लिए आदर्मी दौड़ाए। जब उन्हें खबर मिली कि मुसलमानों 
ने सच-मच आस-पास के तमाम स्थानों को जीत लिया है, तो उनके 
दिल बैठ गए। विवश हो मुसलमानों से समझीता करके शहर उनक 
सुपुर्द कर दिया। ह 


* ॥23 


वैलम ने जो एक मशहूर सरदार था रय और आज़रबीजान के 
लोगों को उकसाया कि अरबों को नप्ट-विनप्ट करने के लिए तुम 
लोगों को अपनी जानें लड़ा देनी चाहिए। अतएव इसी आधार पर 
उसने एक भारी सेना तैयार कर ली। रय का सरदार जेंबदी पूरी भीड़ 
लेकर उसमें शामिल हो गया। घमासान लड़ाई छिड़ी, फिर भी 
वैलम परास्त हुआ और विजय मुसलमानों के हाथ लगी। 

अमीरुल मोमिनीन के हुक्म के मुरताबक उत्बा एक भारी 
सेना लेकर आजरबीजान की ओर बढ़ें। एक मशहूर योद्धा बुकुर 
उत्वा की मदद के लिए नियुक्त किए गए थे। जर्मीदान पर बुकँर का 
स्फन्दयार से मुकाबला हुआ। स्फ़न्दयार गिरफ्तार हो गया। दूसरी 
ओर स्फन्दयार का भाई बहराम उत्वा के मुकाबले में आ डटा, 
लेकिन उसे ऐसी हार हुई कि मैदान से भांग निकला। स्फुन्दयार 
सेनापति के सामने पेश किया गया, तो उसे इस शत पर रिहा कर 
दिया गया कि वह आठ लाख रुपये वार्पिक टैक्स देता रहे। 

जब जरजान के सरदार रोजवान को९ खबर पहुंची कि 
मुसलमानों ने रय (ईरान) पर बिना किसी अवरोध के काबू पा लिया 
है तो उसने नोमान के भाई सुवैद से, जो रय की मुहिम के कमान्डर 
इन चीफ थे, पत्र-व्यवहार करके सुरक्षा-टैकक्‍्स (जया) देना मंजूर 
कर लिया और समझौते के मुताबिक मुसलमान जरजान और 
दुहतान के रक्षक और शान्ति के जिम्मेदार करार पाए और यह भी 
तय पाया कि वे लोग जो सैनिक सेनाएँ मुसलमानों की तरह अदा 
करेंगे, उन्हें जिजिया नहीं देना होगा। इसी तरह एक-एक करके 
तमाम सरदारों ने जिजिया का अदा करना मंजूर कर लिया और यह 
बड़ा राज्य, बिना किसी लड़ाई के मुसलमानों के कब्जे में आ गया। 

आजरबीजान की मुहिम में बुकैर उत्बा के सहायक थे।. 
आजरबीजान की विजय के बाद बुकर पूरी सफलता के साथ बाब 


चुखव - 

की ओर बढ़े। यहां का शासक शहरबराज ईरानियों के पराधीन 
था। मसलंमानों के आने की ख़बर सुनकर वह स्वयं सेत़ार्पात की 
सेवा में उर्पास्थत हआ और निवेदन कियां कि, जब इंरान जीत लिया 
गया तो मेरी क्‍या ताकत कि मैं मुकाबले पर आऊँ। जब कभी 
सैनिक सेवा की जरूरत हो, मैं हाजिर हूं, इसलिए मुझसे जिजिया न 
लिया जाए। चुँक ज़िजिया सिर्फ सैनिक सेवा के बदले में लिया जाता 
था, इसलिए उसे माफ़ किया गया। यहाँ विजय प्राप्त कुरके ' 
मसलमान संनाएँ आग्रे बढ़ीं। शहरबराज साथ-साथ चला। 
अव्दुररहमान इब्न रवीआ ने वैजा और बुकैर ते कान पर' विजय 
प्राप्त करके उसे इस्लामी राज्य. में. शामिल कर लिया। 


25 


फारस की विजय 


उस समय फ़ारस उस राज्य का नाम था, जिसके उत्तर में 
असंफ़हान, दक्षिण में फ़ारस सागर पूरब में किरमान और पश्चिम 
में इराके अरब था। इसका सबसे बड़ा और प्रसिद्ध नगर शीराज है। 
फारसः पर सबसे पहले सन्‌ ]7 हि० में आक्रमण हुआ था, 
मगर उसमें कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं प्राप्त हुई थी। यह 
आक्रमण हजरत उमर (र्राजु०) की इजाजत के बिना किया गया था. 
और वे इसके घोर विरोधी थे। ४ 
कहा जाता है कि जंब हजरत साद (रजि०) ने कादसिया पर 
विजय प्राप्त कर ली, तो हजरत अली को स्पर्धा हुई, अतः उन्होंने 
झट सेनाएँ तैयार करके नदी कें रास्ते फ़ारस पर आक्रमण कर दिया 
यहां तक कि अमीरुलमोमिनीन से इजाजत लेना भी ज़रूरी न 
समझा। वह अपनी सेनाओं और जहाजों के साथ इस्तख़र पहुंचे। 
इस्लामी सेनाओं ने जहाजों से उतर कर तट पर कृदम जमाया ही था 
कि शत्रुओं ने जहाजों और सेनाओं को इस ढंग से घेरे में ले लिया कि 
उनका सिलसिला एक दूसरे से बिल्कुल कट गया, क्योंकि दुश्मन की 
कोशिश थी कि मुसलमान जहाजों के करीब बिल्कुल ही न पहुंचने 
- पाएँ। यरद्याप मुसलमानों की हालत बहुत नाजुक थी, फिर भी 
उन्होंने दिल खोल कर मुकाबला किया। इस्लामी सेना के सेनार्पाति 
ने अपनी सेना को सम्बोधित करके कहां, मुसलमानो! निरुत्साह न 
होना, दश्मन हमारे जहाज़ों को हमसे छीनना चाहता है, लेकिन : 
अगर अल्लाह ने चाहा, तो जहाजों के साथ देश भी हमारा होगा। 


426 

यर्याप मसलमानों की भारी संख्या इस लड़ाई में काम आई, फिर भी 
वे बड़ी वीरता, साहस और जमाव के साथ दुश्मन के मुकाबल पर 
डटे रहे। 

शत्रओं ने जब अपनी हार के आसार देखे, तो उन्होंने 
मसलमानों के जहाज डबा दिए। यद्यपि शत्रु के कृदम उखड़ गए 
और मसलमान ही विजयी रहे, मगर वे अपनी भारी संख्या के 
कट-मर जाने की वजह से आगे नहीं बढ़े। उन लोगों ने थल-मार्ग से 
बसरा पहुंचने की कोशिश की, मगर इंरानियों ने चारों ओर से राहें 

बन्द कर रखी थीं और वे घिर कर रह गए। 

जब अमीरुलमोमिनीन को तमाम बातें मालूम हुईं तो रोष से 
भर उठे और अली को बड़ा तेज पत्र लिखा। 

जो कछ होना था, वह तो हो चुका था, समस्या थी 
बची-खची सेना को बचाने की। खलीफ़ा बराबर इस पर विचार 
करते रहे। सोच-विचार के बाद उत्बा इब्न गृज॒वान को लिखा कि 
अली की सेना को बचाने के लिए अबू सबरा के नेतृत्व में तुरन्त 
बारह हजार की सेना फ़ारस की ओर भेज दी जाए। 

इधर ईरानी भी ग़ाफ़िल न बैठे थे। इस बीच उन्होंने हर ओर 
से सेनाएँ इकट्ठी कर ली थीं, अतएवं बड़ी घमासान लड़ाई शुरू 

हुईं । आखिर ईरानियों के कृदम उखड़ गए और वे युद्ध -क्षेत्र से भाग 

खड़े हुए। 

चंक अमीरुल मोमिनीन ने सख्ती से हुक्म दिया था कि बिना 
इजाजत हर्रागज क॒दम न उठाया जाए, इर्सालए इस्लामी सेनाएं 
विवश हो बसरा लौट आईं, लेकिन नहादन्द के बाद जब हजरत 
उमर (र्राजु०) ने सेना की आम चढ़ाई का हुक्म दिया तो फारस पर 
भी सेना चढ़ दौड़ी। पार्रासयों ने तोज पर पूरी तैयारी के साथ तमाम 
सेनाओं को इकट्ठा किया। मुसलमानों ने तोज की ओर ध्यान ही नः 


॥27 


दिया, बल्कि खलीफ़ा के आदेशानुसार एक ही समय में बहुत-सी 
जगहों पर इस्लामी सेनाएँ पहुंच गईं। मुसलमानों की इस सैनिक 
चाल से पार्रासयों के छक्के छूट गए और उन्हें तोज छोड़ कर भाग 
जाना पड़ा। 

फिर मुसलमानों ने एक-एक करके उर्दशेर, तोज, इस्तखर 
जीत लिए और धीरे-धीरे बहुत से शहरों पर कब्जा कर लिया। 


किरमान 

इस मुहिम पर सुहैल इब्न अदीं नियुक्त किए गए थे। यहाँ के 
हाकिम ने मुसलमानों का मुकाबला किया, लेकिन लड़ाई में मारा 
गया। उसकी मृत्यु के बाद मुसलमानों के लिए मैदान साफ़ था 
इसलिए इस्लामी सेनाएँ; बिना किसी अवरोध के बढ़ती गईं, यहां 
तक कि बेरफ़्त और यरजान तक, जो कि किरमान की तिजारती 
मण्डी और मशहूर शहर थे, जा पहुंचीं। 


सीस्तान 

आसिम इब्न उमर ने सीस्तान पर हमला किया। लोगों ने 
तत्काल जिजिया देना स्वीकार कर लिया, इसलिए नहर बल्ख से 
लेकर सिन्ध' तक मुसलमानों के लिए मैदान साफ़ हो गया। 


मकरान 


उसी साल मकरान्र पर हकम इब्न उमर ने हमला किया। 
रासिल शाहेमकरान ने स्वयं इस लड़ाई में भाग लिया, जबर्दस्त 
लड़ाई के बाद रासिल की हार हुई और मुसलमानों का मकरान पर 
अधिकार हो गया। कछ हाथी, जो लड़ाई में मसलमानों के हाथ 
.लगे, केन्द्र को भेज दिए. गए 


28 


खूरासान 


हजरत उमर (राज०) ने अहनफ इव्नं कुंस को खुरासान की 
मंहिम के लिए नियुक्त किया था। वह तिंब्सैन होते हुए हिरांत पहुंचे 
और उस पर विजय प्राप्त कर मर्दशाहजहाँ की ओर॑ बढ़े। उन.दिनों 
बादशाह यज्दग्द यहीं ठहरा हुआ था। मुंसलमानों कं आन की 
खबर पाकर उसने चीनी संम्राट सें सहायता चाही और अपने में 
मसलमानों के मकाबले की शॉक्ति न पाकर मुसंलमानों के पहुचन स 
पहले मर्दरूद चला गया। अहनफ़ ने मर्दशाहजहां पर तो हारिसा 
इब्न नोमान को छोड़ा और खुद मर्दरूद का रुख किया। यह सुनकर 
यज्दगर्द यहां से भाग कर बल्ख पहुंचां। मुसलमानों की सहायता के 
लिए क॒फा से और अधिक सेनाएं आ पहुंचीं। अहनफ़ ने नई सेना की 
लेकर बल्ख पर हमला किया और यज़्दगुर्द को बुरी तरह परास्त 
होना पड़ा। मुसलमानों ने नीशांपुर से लेकर तखारिस्तान तक का 

* परा क्षेत्र जीत लिया और मर्दरूद को राजधानी बनाया। 
हज़रत उमर (र्राजु०) ने इन विजयों को पसन्द किया, मगर 
- हकक्‍म दिया कि इस्लामी सेनाएं अब आगे न बढ़न पाए। 

यज़्दगुर्द हार कर चीनी सम्राट के पास भाग गया और उससे 
सहायता चाही। सम्राट ने उसका बड़ा आदर-सम्मान किया और 
एक भारी सेना लेकर स्वयं यज़्दगुर्द के साथ खुरासान की ओर बढ़ा। 
अहनफ चौबीस हजार की सेना के साथ बल्ख में डर डाल पड़ थ। 
जब उन्हें खबर मिली कि यज्दगर्द चीनी सम्राट को लिए बढ़ा चला 
आ रहा है, तो तरन्त मर्दरूद पहुंच गए। चीनी सम्राट खाकान और ' 
यज्दगर्द दोनों मर्दरूद पहंचे। स्थित का अवंलोकन करने के बाद, 
खाकान तो वहीं ठहरां रहा और यंज़्दगुर्द मर्देशाहजहां की ओर 
बढ़ां। अहनफ़ ने खुले मैदान में लड़ना उचित नहीं जाना, अत 
उन्होंने शहर पार करके एक उचित स्थान पर, जिसंके पीछे पहाड़ 


429 


थे, डेरे. डाल दिए। एक समय. तक दोनों सेनाए' एक-दूसरे के 
मुकाबले में डेरे डाले पड़ी रहीं, मगंर कोई लड़ाई न हईं। एक दिन 
एक सरदार से अहनफ़ का मुकाबला हो गया। अहनफ ने इस जोर 
से बरछी मारी कि सरदार का काम तमाम हो गया। एक के बाद एक 
करके दो और सरदार उनके हाथ से काम आए। संयोग कि उस ओर 
ख़ाकान-सस्‍्वयं आ निकला और अपने प्रतिष्ठित सरदारों की लाश 
देखकर बहुत घबराया और शर्मिन्दा हो बोला कि खामखाही दसरों 
की मुसीबत मोल ली। उस पर इन सरदारों की मौत का यह प्रभाव 
हुआ कि वह यज़्दगुर्द को सूचित किए बिना अपनी सेना को लेकर - 
वापस चला गया। 


. - जब यज़्दगुर्द को खाकान के चले जाने की सूचना मिली, तो 
बहुत घबराया। आखिर उसने निश्चय कर लिया क़ि अपना साजो 
सामान लेकर तुर्किस्तान चला जाए। लेकिन उसके स्वार्थी और भ्रष्ट 
अधिकारियों ने उसे ऐसा नहीं करने दिया, उन्होंने यज़्दगर्द की हत्या. 
का षड़यन्त्र रच लिया। मगर उसे वक़्त पर पता चले गया और वह 
अकेले भाग कर ख़ाकान की राजधानी:फ़रग़ाना जा पहंचा। , 

जब हजरत उमर (रजि०) को विजय की सूचना मिली, तो 
उन्होंने अल्लाह का शुक्र अदा किया और मसलमानों को हिदायत 
की कि वे भली जिन्दगी गुज़ारें, वरन्‌ उनका भी वही हाल होगा, जो 
यज्दगुर्द का हआ। ; 


430- 


मिस्र की विजय 


हज़रत अम्र इब्न आस एक अनुभवी कमांडर थे। वे मिस्र में 
व्यापार किया करते थे। जब आखिरी बार हजरत उमर (रजि०) ने 
सीरिया की यात्रा की, तो हजरत अम्न इब्न आस ने उनसे मुलाकात 
की और मिस्र की स्थिति आदि पर रौशनी डालते हुए उस पर विजय 
प्राप्त करने की इजांज़त ले ली। यद्यपि हज़रत उमर (रजि०) पहले 
तैयार न थे, लेकिन बाद में इजाज़त भी दे दी, तो इस तरह कि अगर 
मेरा कोई निषेध पत्र तुम्हारे पास पहुंचे, तो आगे बढ़ने के बजाय 
उलटे वापस हो जाना। 

बहरहाल चार हजार की सेना लेकर हजरत अम्र इब्न आंस 
मिस्र की ओर बढ़े। अभी वे - मिस्र की सीमा में प्रवेश ही कर सके थे 
- कि अमीरुल मोमिनीन कां पत्र उन्हें मिला कि यदि मसलहत आड़े न॑ 
आए' तो आगे न बढ़ें। वे: उस समय मिस्र के शहर अरीश तक 
पहुंच चुके थे। उन्होंने अपने सरदांरों से परामर्श किया,'बात यह 
तय पाई कि अब वापस लौटना रुसवाई और बदनामी का कारण' 
होगा। इसलिए इस्लामी सेनाओं को आगे बढ़ते रहना जारी रखें 
और फर्मा जा पहंंचे। यह शहर रूम सागर के किनारे स्थित था। 
रूमी- सेनाओं ने जबर्दस्त मुकांबला किया। एक महीने की भारी 
कोशिशों के बाद मुलमानों की महान्‌ विजय प्राप्त हुई और रूमी 
बुरी तरह पसपा हुए। फर्मा से सेनाए,बिलीस पहंची, यहाँ 
मामूली-सी झड़प के बाद शहर पर कब्जा हो गया, फिर हजरत 
अग्न इब्न आस फिस्तात पर बढ़े। जब मिस्र के.शासक को जो रूमीं 


॥3] 


सम्राट कैसर के पराधीन था, मंसलमानों के फिस्तात की ओर बढ़ने 
का हाल मालूम हुआ तो वह तुरन्त एक भारी सेना लेकर वहां पहंच 
गया। मुसलमानों ने इस किले की मजबती का अन्दाजा लगाया, तो 
बहुत परेशान हुए, और अमीरुल मोमिनीन को हालात से सचित 
किया। हज़रत उमर (राजि०) ने ।2000 की सेना सहायता के लिए 
भेज दी। इस सेना में चार प्रसिद्ध कमांडर थे, जिनमें प्रसिद्ध कमांडर 
जुबेर इब्न अव्वाम भी शामिल थे। एक समय तक घेराव डाले 
मुसलमान पड़े रहे। आखिर मुसलमान तंग आ गएं। जबैर इब्न 
अव्वाम बड़े हौसला वाले इन्सान थे। कछ साथियों को साथ लेकर 
किले पर जा चढ़े और तकबीर के नारों से ऐसा आतंक पैदा कर दिया 
कि किला वाले यह समझे कि मुसलमान अन्दर दाखिल हो गए हैं। 
अतः वे सब आतंकित होकर पलायन-मार्ग ढूंढने लगे। हज़रत जबैर 
ने तुरन्त दीवार से नीचे उतर कर किले का दरवाज़ा खोल दिया और 
पूरी इस्लामी सेना भीतर घस आई। 

मकूकस ने, जो मित्र का शासक था, समझौते का सन्देश 
भिजवाया, ज़ों मुसलमानों ने स्वीकार कर लिया। जब रूमी सम्राट 
हिरक्‍ल को इन घटनाओं की सूचना मिली, तो वह बहत रुष्ट हआ 
और एक भारी सेना को आदेश दिया कि वह स्कन्दरिया,पहंच कर 
मुसलमानों का मुकाबला करे। 


स्कन्दरिया 
फिस्तात की विजय के बाद सेनारपति अम्र इब्न आस ने 
अमीरुल-मोमिनीन को तमाम हालात की सूचना दी और आगे बढ़ने 
की इजाजत चाही। हजरत उमर (रजि०) ने आगे बढ़ने की इजाजत 
दे दी। - 
संयोग ऐसा हुआ कि सेनापति के खेमे में एक कबूतर ने 
घोंसला बना रखा था. जब सेनांपति का खेमा उखाड़ा जाने लगा, तो 


- 32: डर ह * 
उनकी नजर कबूतर के घोंसले पर पड़ी। अरबों की मेहमानदारी 
जगर्प्रासद्ध है। अतएवं सेनापति ने कहा कि 'यह कबूतर हमारा 
. मेहमान है, इसलिए खेमा न उखाड़ा जाए। खुद तो सेना चली गई 
और वह खेमा वैसे ही वहीं खड़ा रहा। है 
फिस्तात और स्कन्दरिया के दंर्मियान रूमियों की जगह- 
छोटी-छोटी आबादियां थीं। इन सबने एक जुट होकर मुसलमानों . 
का मुकाबला किया और उनको आगे बढ़ने से. रोका, मगर उन्होंने पे 
बुरी तरह मुंह की खाई। हजरत अम्न इब्न आस बड़ी तेजी से. 
इस्लामी सेनाओं के साथ आगे बढ़ते चले गए और स्कन्दरिया 
आकर दम लिया) ॥ े ्ि 
मक्‌क॒स ने एक मुद्दत के लिए समेझौता करना चाहा, मगर, 
. ऐसा समझौता मुसलमानों को मंजूर न था। इसलिए हजरत अग्नर 
: इब्न आस ने साफ़ इन्कार कर दिया। शहर वालों ने मुसलमानों को 
आतंकित करने के लिए किले पर अगणितं सेनाएं,जमां कर दीं, मगर 
ये लोग ऐसी बातों को कब ध्यान में लाते थे। उन्होंने शहर वालों को 
कहला भेजा कि तुम्हें नहीं मालूम कि हम संख्या की अधिकता के 
आधार पर कभी नहीं लड़े और न कभी भारी संख्याओं का हम पर : 
रोब पड़ा। तुम्हारा सम्राट इस बात को खूब जानता है और हमारे 
मुकाबले में उसे कई बार प्रास्त होना पड़ा. है। मक्‌क॒स स्वयं इस 
बात को स्वीकार कर चुका था और वह जानता था कि अरबों के डर 
- . से हिरक्ल कुस्तुन्तुनिया जा पहुंचा था, मगर वह मजबूर था इसलिए 
चुप रहा। . कि  , 
'मकूक॒स किसी प्रकार भी अरबों से लड़ाई करने को तैयार ने 
: था। उसकी इच्छा.थी कि जिजिया देकर अरबों से सन्धि कर ली 
जाए, मगर हिरक्ल के डर की वजह से ऐसा, न करने पर मजबूर 
था। आखिर उसने मसलमानों सें खूफिया समझौता कर लिया, 


॥33 


जिसके अनुसार तय पाया कि तमाम किब्ती अर्थात मकूक्स और 
उसकी जाति के तमाम व्यक्ति मुसलमान के हाथों बिल्कल सुरक्षित 
रहेंगे। इसके बदले किब्तियों ने, लड़ाई के ,ज़मांनें में, न केवल 
मुसलमानों के मुकाबले में आने से परहेज़ किया, बल्कि उनकों हर 
प्रकार की सहायता भी पंहूचायी उन्होंने फिस्तात से लेकर 
स्कन्दरिया तक पुलों की मरम्मत की और स्कन्दरिया के लम्बे घेरे 
के दिनों में मुसलमानों .को रसद पंहूंचाते रहे। 

कभी-कभी रूमी किले से निकल कर मुसलमानों का मुकाबला 
करते। एक दिन एक रूमी ने कहा कि अगर मुसलमानों में कोई 
योद्धां है, तो आकर मेरा मुकोबला करे। मुस्लिमा इब्न खालिद 
अपना घोड़ा बढ़ाकर उसके मुकाबले के लिए निंकलें, मगर उसने 
पलक झपंकते ही उन्तको जमीन पर पछाड़ दिया और खुद मुस्लिमा 
के सीने पर सवार हो गंया।. करीब था कि वह उनको खेँंजर से 
हलाक कर देता कि एक मुसलमान ने बढ़कर उऩकी जान बचाई। 
हजरत अग्न इब्न आस को बड़ा गुंस्सां आग्रा और उन्होंने मुस्लिमों 
को बहुत बुरा-भला कहा, मगर वे वक्‍त की नज़ाकत की देखकर 
चुप ही रहे। ; 

' कभी एक पक्ष का पलड़ा भारी हो जाता था, कभी दूसरे का 
लेकिन परिणाम नहीं निकल पाता था। आख़िर एक दिन मुसलमानों 
ने इस जोर से आक्रमण किया कि रूमियों को धकेलते हुए किले के 
अन्दर जा पहुंचे। वहां बड़ी घमासान लड़ाई हुई। रूमियों ने अपनी 
पूरी शक्ति लगा कर मुसलमानों को बाहर निकाल दिया किले के 
दरवाजे बंद कर लिए। संयोग ऐसा हुआ कि सेनापति और मुस्लिमा 
इब्न खालिद किले के भीतर रह गए। रूमियों ने उन्हें जिन्दा 
गिरफ्तार करना चाहा, मगर उन्होंने तलवारें निकाल लीं। रूमी 
उनका पराक्रम और धैर्य देखकर दंग रह गए। आख़िर यह तय पाया 


- वउ4 
कि एक रूमी और एक मुसलमान आपस में लड़े। अगर रूमी योद्धा 
मारा जाए तो वे इन दोनों को किले से बाहर निकल जाने देंगे और 
अगर मसलमान मारा जाए तो दूसरा हथियार डाल देगा। मुस्लिमा 
इब्न खालिद इस विचार से, कि कहीं सेनार्पति को कोई क्षति न पहुंच 
जाए, उनको रोक कर स्वयं आगे बढ़े और इस जोर से मुकाबला 
ककया कि वह अपनी जान न बचा सका और मारा गया। रूमियों को 
मालम न था कि इस्लामी सेनाओं के सेनापति उनके कब्जे में हैं 
इर्सालए उन्होंने वायदे के मुताबिक किले का दरवाज़ा खोल दिया 
और वे दोनों बाहर चल दिए। हजरत अम्न ने अपने पहले दुव्यंवहार 
की मस्लिमा से माफी चाही और उन्होंने खुल दिल से उन्हें माफ़ कर 
दिया, इर्सालए कि पहले से उनके मन में दुर्व्यवहार का कोई भाव न, 
था। 
चेरा एक मुद्त तक पड़ा रहा। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जा रहे थे 

अमीरुलमोमिनीन की चिन्ता बढ़ती जा रही थी। आखिर 
अमीरुलमोमिनीन ने सेनापति हजरत अम्र को लिखा कि लगता है 
कि तम ईसाइयों में रहकर उनकी तरह ऐशपरस्त और काहिल हो 
गए हो, वरन यह सम्भव न था कि घेरा इतना लम्बा हो। मेरा पत्र 

देखते ही सैनिकों को लड़ने-मरने पर उभारो और लोगों को बताओ' 
कि काहिली की जिन्दगी से तो मौत हजार गुना बेहतर है। 

सेनार्पात ने ऐसा ही किया, जोरदार भाषण दिया और पूरे 

जोश के साथ हमले की तैयारियां शुरू हो गईं। फिर हजरत उंबादा 
इब्ने साबित (र्राज०) को बुला भेजा, जो प्यारे नबी (सलल०) की 
संर्गात में बहत रह चके थे, बरकत के लिए उनका नेजा लिया, झंडा 
तैयार करके उनको दिया और कहा कि इस लड़ाई में. आप हमारे 
सेनापति हैं, उन प्रसिद्ध योद्धाओं को, जिन्हें अमीरूल मोमिनीन ने 
कमक के साथ भेजा था. सबसे आगे निय॑क्त किया। मुसलमानों ने 


35 


सिर पर कफ़न बांध कर इस जोर से हमला किया कि दुश्मन का 
सारा जोर टूट गया, इस प्रकार पहले ही हमले में शहर जीत लिया 
गया। तुरन्त खलीफा की सेवा में अपना एक दूत दौड़ा दिया, चूंकि 
दोपहर के वक़्त दूत पहुँचा था, उसने सोचा कि अमीरुलमोमिनीन 
आराम कर रहे होंगे, इसालए उसने मस्जिदे नववी की ओर रुख 
' किया। अमीरुलमोमिनीन की एक बांदी ने उसे देखा और उसका 
रंग-रूप देखकर यह समझ गई कि जरूर यह व्यक्ति लड़ाई की 
' ख़बर लेकर आया हैं। अतः उसने अमीरुलमोमिनीन को जाकर 
ख़बर दे दी। उन्होंने तुरन्त उसे बुलाकर लड़ाई का हाल मालूम 
किया और विजय की खबर पाते ही सज्दे में गिर पड़े, उसी वकुत 
मुनादी करा दी गई कि अल्लाह ने मुसलमानों को मिस्र पर भी विजय. 
दे दी। 
. _ स्कन्दरिया की विजय के वाद हजुरत अम्न इब्न आस फ़्स्तात 
को लौट गए और उसे नियोजित ढंग से फिर से आबाद कराया। इस 
विजय के बाद रूमियों का ज़ोर दूट गया। मुसलमानों ने 
शांति-स्थापना के लिए देश में जगह-जगह सेनाएँ फैला दीं। लोगों 
ने राजी-खुशी से जिजिया देना कुबूल कर लिया। 
सेनारपति ने लड़ाई के असंख्य कैदियों के बारे में हजरत उमर - 
(राजि०) से हिदायत चाही, वहां से जवाब आया कि उन्हें इस्लाम 
बताओ, समझाओ, अगर इस्लाम स्वीकार कर लें तो उन्हें अपना 
' जैसा समझो, कोई भेद-भाव न करना और इस्लाम स्वीकार न करें, 
तो जबरदस्ती न करना, वे जो अकीदा रखना चाहें रखें, जिस धर्म को 
चाहें मानें। हां, अगर वे सैनिक सेवा के लिए अपने को अर्पित करें 
तो ठीक है, वरना उनसे सुरक्षा-कर (रजिज़िया) लो। इसलिए इनमें 
से किसी एक शर्त के मानने पर इन कुँदियों को छोड़ दो। 
सेनापति ने इन तमाम कुँदियों को इकट्ठा करके 


-36. « 
अमीरुलमोमिनीन का पत्र सुनाया और साफ़-साफ़ कह दिया कि इन 
तीनों शर्तों में, जो जी चाहे स्वीकार कर लो, क्योंकि धर्म के मामले 
में तुम लोगों पर किसी प्रकारं की कोई जबर्दस्ती नहीं।अतः कुछ तो 
मुसलमान हो गए और क॒छ दूसरी शर्तों पर छोड़ दिए गए। 


$़ 


37 


खलीफा की निर्मम हत्या 


इराके अजम की लड़ाई में एक ईरानी कैदी गिरफ्तार होकर 
मदीना लाया गया था, जो बड़ा ही क्रूर हृदय था। हजरत उमर 
(ररज०) ने ईरानी के मदीना में रहने पर कभी सन्तोष नहीं 
व्यक्त किया था, मगर प्रमुख व्यक्तियों और जन-साधारण के 
सामान्य मत के कारण वे मौन रहे थें। 

.जिस विशेष कैदी का यहां उल्लेख किया जा रहा है, उसका 
नाम फ़ीरोज़ था और वह हज़रत मुगीरा इब्न शोबा का दास था। 
बह बढ़ई, लोहारी आदि का काम जानता था। इस जालिम ने एक 
दिन खलीफ़ा उमर (राजि०) के.पास हाजिर होकर निवेदन किया कि 
मुग़ीरा ने मुझ पर बहुत बड़ा टैक्स लगा दिया है, जो मैं अदा करने में 
असमर्थ हूं। आप ने पूछा कि तुम्हें कितनी रकम अदा करनी पड़ती 
है। उसने जवाब दिया कि लगभग पैंतालीस पैसे प्रतिदिन। हजरत 
उमर बोले, तुम्हारे पेशों की दृष्टि से यह राशि कुछ अधिक तो नहीं 
है, इर्सालए मैं क्‍या हस्तक्षेप करूं? 

इस समय बह व्यक्ति चुप-चाप चला गया, लेकिन दसरे दिन 
सुबह की नमाज में खंजर छिपाए मस्जिद के एक कोने में 
आ छिपा। सफ़ों (पंक्तियों) के ठीक हो जाने पर हजरत उमर 
(रजि०) ने यथाविधि नमाज पढ़ानी शुरू ही की थी कि उस हत्यारे 
ने झपट कर हजरत उमर (रजि०) पर ताबड़तोड़ छः वार किए। 
जब ढोंड़ी के नीचे गहरा घाव हो गया तो उन्होंने हजरत 
अब्दुर्रहमान इब्न औफ का हाथ पकड़ कर अपनी जगह खड़ा कर 
दिया और खूद धरती पर गिर पड़े। इतने में फ़ीरोज़ नें कई लोगों को 


38 
घायल कर दिया और अन्त में आत्महत्या कर लीं। 

एक ओर फीरोज की यह निर्ममता, क्रूरता और क्षुद्र स्वार्थ के 
लिए हत्या कर देने की दृष्भावना और दूसरी ओर ईमान वालों का 
सब्र, सहनशीलता, दुनिया से उदासीन हो अपने स्वामी से गहरा 
सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश, कितना बुनियादी फर्क होता है, ईमान 
को दिल में उतार लेने में और न उतार लेने में। नमाज से छूटने के* 
बाद जब लोगों ने देखा तो लगा अमीरुलमोमिनीन घायल हो धरती 
पर तड़प रहे हैं, तुरन्त डॉक्टर बुलाया गया, उसने मरहम पट्टी की 
और दवाई पिलाई। लोगों का विचार था कि वे स्वस्थ हो जाएंगे, 
मगर जब उनको दूध पिलाया गया तो वे घाव की ओर से बाहर 
निकल आया। यह देखकर लोग बहुत घबराए| जो होना है, वह तो 
होगा ही, लेकिन इस्लामी राज्य को कोई क्षति न आएं और केन्द्रीय 
सरकार मजबूत रहे, इसे देखते-हुए लोगों ने हजरत उमरं (रजि०) 
से कहा, वक्‍त की. नजाकत को देखते हुएं:बेहतर होगा कि आप 
अपना उत्तराधिकारी निश्चित कर लें। 

अमीरुल मोमिनीन ने अपने बेटे हज़रत अब्दुल्लाह (र्राज०) 
को बलाया और कहा, 'प्यारे नवी (सलल०) की धर्म-पत्नी हज़रत 
आइशा (र्रज०) की सेवा में उर्पास्थत होकर कहो कि उमर 
(रज०) इजाजत चाहता है कि अल्लाह के रसूल (सलल०) के पहलू 
में मुझे दफ़न किया जाए। 

अमीरुल मोमिनीन का सन्देश सुनकर हजरत आइशा 
(ररज०) ने रोते हुए उत्तर दिया कि यद्याप मेरा इरादा था कि वह 
जगह अपने लिए मुख्य कर लूं, मगर अब अमीरुलमोमिनीन हजरत 
उमर (र्रज०) को अपने पर प्रमुखता दूंगी। | 

हजरत अब्दुल्लाह ने वापस आकर अपने प्यारे बाप को सूचित - 
किया कि हज़रत आइशा (र्रज०) उनकी कामना पूरी करने पर 
तैयार हैं। यह सुनकर हजरत उमर (रजि०) को हार्दिक शान्ति मिल 


439 


गईं' और अपनी सर्व॑प्रिय कामना के पूरी होने पर अल्लाह का शुक्र 
अदा किया। 

इसके बाद आपने अपना उत्तराधिकारी चुनने की ओर ध्यान 
दिया। आपने बहुत सोचा, पर किसी व्यक्ति पर आप का मन 
सन्तृष्ट न हुआ। काफ़ी सोच-विचार के बाद आप ने छः व्यक्तियों- 
हजरत अली, उस्मान, जुबैर, तलहा, साद इब्न वक्‍ककास और 
अब्दु्रहमान इब्न औफ़ का नाम लिया कि इन व्यक्तियों में से जिसके 
बारे में बहुमत पाया जाए, उसे खंलीफ़ा बना दिया जाए। 

हजरत उमर (र्ज०) को देश और राष्ट्र के हित व कल्याण 
का जो ध्यान था, उसक़ा अन्दाजा इस से हो सकता हैं कि उस कष्ट 
व बेचैनी की हालत में .भी, जहां तक उनकी शक्ति काम करती रही 
और जब तक होश बाकी रहा, इसी धुन में लगे रहे। लोगों को 
सम्बोधित करके कहा कि जो व्यक्त भी खलीफा चुना जाए, उसको 
मैं वसीयंत करता हूं कि वह पांच वर्गों के अधिकारों को मुख्य रूप से 
ध्यान में रखें-- मुहाजिर, (मक्का से वेघर होकर मदीना आये हुए 
लोग) अन्सार (मुहाजिरों की हर तरह मदद करने वाले मदीनावासी) 
अरब, (अरब देश के जन-साधारण) वह अरबवासी जो और 
शहरों में जाकर आबाद हो गए? हैं, जिम्मी (इस्लामी राज्य की 
गैर-मुस्लिम प्रजा) फिर हरेक के अधिकारों की व्याख्या की। चुनांचे' 
जिम्मियों के हक में जो शब्द कहे, वे इस प्रकार थे, 'मैं समय के 
ख़लीफ़ा को वसीयत करता हूं कि वह अल्लाह की जिम्मेदारी और 
अल्लाह के रसूल की जिम्मेदारी को ध्यान में रखे, अर्थात जिम्मियों 
को जो वचन दिया है, वह पूरा किया जाए- उनके दुश्मनों से लड़ा 
जाए और उनको उनकी ताकत से ज़्यादा कष्ट न दिया जाए।' 

... इन जरूरी कामों के कर लेने के बाद आपने फिर अपने: बेटे 

हजरत अब्दुल्लाह को. बुलाया, पूछा, मुझ पर कितना ऋण है? 


40 
मालम हआ किं छियासी हजार दिरहम।फ़रमाया-कि मेरी जायदाद : 
बेच कर यह ऋण अदा कर दी जाएं। अगर इससे पूरा न हो सके तो 

अदी परिवार क्रैश से लेकर यह ऋण कौड़ी-कौड़ी अदा कर दे, 
लेकिन बैत॒ुलमाल (राज-कोष) के रुपये को हरगिज हाथ न लगाया.. 
जाएं, क्योंकि उस का हकदार मैं नहीं बल्कि गरीब हैं। अमीरुल 
मोमिनीन का मकान बेचा ग़या। अमीर . मुआविया*ने उसको 
छियालीस हजार दिरहम में खरीद लिया और उससे पूरा ऋण अदा 
हो गयां। 

प्राण निकलने से क्रछ क्षण पहले आपने कहां, जब मेरा 

जनाजा लेकर मझे दंफ़न करने के लिए जाओ तो हजरत आईशा से 
फिर पछ लेना कि उमर अन्दर आने की इजाजत चाहता है। अगर 
वे खशी के साथ इजाजत दे दें; तो मुझे अल्लाह के रसूल (सलल०) 
के पहल में दफ़न कर देना और अगंर वे' इजाजत ने दें, तो फिर 

आम मसलमानों कें कब्रिस्तान में मुझे दफ़ना देना। ा 
ह तात्पर्य यह कि इस्लामी राज्य का द्वितीय खलीफ़ा अल्लाह के 
रसूल (सल्ल०) का प्रेमी, इस्लांमी सिंद्धान्तों को अमली जामा 
पहनाने वाला, मुस्लिमों, ग़ैरं-मंस्लिमों को समान भाव से देखने 
वाला, विशद्ध कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने वाला, लगभग 
चौथाई दनिया का शासक जमीन के नीचे दफ़ंन कर दिया गया। - 


.._ हर व्यक्ति दुखी था, आंखें भीगी हुई थीं और कलेजा मुंह को 
निकला चला आ रहा था। हजरत उस्मान, हजरत तलहा, साद इब्न 
वक्‍कास, अब्दर्रहमान इब्न औफ और हज़रत अली (रराजि०) ने 
आपको कब्र में उतारा। प्यारे नबी,(सल्ल०) की आरामगाह के 
पहल ही में आप की भी आरामगाह है।. इस प्रकार वह व्यक्ति _ 
जिसके दबदबे, रोब और जलाल से बड़े-बड़ें सम्राट कांपते थे और 
जो देश और राष्ट्र के लिए सरासर दर्द और मुहब्बत था, हमेशा के 
लिए गहरी नींद सो. गया। 


या - 


लड़ाइयों पर एक विहंगम दृष्टि 


पिछले पृष्ठों में लड्डाइयों के उल्लेख से इतनी बात तो स्पष्ट हो 
गई- होगी कि हजरत उमर (राजि०) के समय में मुसलमानों में 
कितना जोश, कितना उत्साह, इस्लाम के लिए लड़ने-मरने की: 
कितनी प्रबल उत्सुकता पाई जाती थी। प्रश्न पैदा हो सकता है कि 
कुछ रेगिस्तानी बहुओं ने किस प्रकार फ़ारस और रूम पर शानदार 
विजय प्राप्त कर ली? क्या यह इतिहास का कोई अपवाद है? 
आखिर इसका कारण क्‍या था? क्‍या इन घटनाओं की -तुलना 
सिकन्दर और चंगेज की विजयों से की जा सकती है? जो कछ हुआ 
उसमें खूलीफ़ा का कितना हाथ रहता था? आदि, आदि। 

हम चाहते हैं कि इन पृष्ठों में इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजने की 
कोशिश की जाए। - 

हजरत उमर (रजि०) के विजित देशों और राज्यों का कल 
क्षेत्रफल 225]030 वर्गमील था अथात्‌-मक्‍का से उत्तर की ओर 
036, पूरब की ओर [087 दक्षिण की ओर 483 मील था। 
पश्चिमी की ओर, चूंकि केवल जिद्ठा तक राज्य-सीमा थी, इसलिए 
वह उल्लेखनीय नहीं। 

. इन विजित क्षेत्रों में सीरिया, मिस्र, इराक्‌ जजीरा, खूजिस्तान 

इराकेअजम, आरमीनिया, आजरब[ईजान, फारस, किरमान, 
खरासान और मकरान शांमिल था... 


- ब42 


'शानदार विजय का रहस्य 

इसमें सन्देह नहीं कि उस समय रूम और फारस सार्मारक_ 
कला-कौशल की दुष्ट से अपने उत्कर्ष को पहुंचे हुए थे, नंए-नएं 
अस्त्र-शस्त्र, सैनिकों की अधिक संख्या, दक्ष सेना्पाति, साधनों की 
रेल-पेल, इन तमाम चीजों के कारण उन्हें अरबों पर. बहरहाल 
प्रधानता प्राप्त थी, लेंकिन मुसलमानों में उस समय इस्लाम के 
प्रवर्तक हजरत मुहम्मद (सलल०) के कारण जो उत्साह, जो हौसला, 
जो साहस, जो उमंग और जो शौर्य भर उठा था और जिसे हजरत 
उमर (रज०) ने और अधिक उभार दिया था, रूम और फारस के 
साम्राज्यों के लिए अपनी प्री शक्ति और साधन्न सम्पन्नता के बाद 
भी उसका मकाबला करना आसान न था। इस प्रकार विजय तो 
बहरहाल प्राप्त हो. गई, पर विजय के साथ-साथ स्थाई सरकार 
और अच्छे प्रशासन के मिल जाने के कारण इस्लाम के पैदा किए हुए: 
चरित्र व आचरण की धाक भी बैठतीं चली गई | अल्लाह को.डर 
और मरने के बाद अपने कर्मों की जवाबदेही के एहसास ने 
मसलमानों में इतनी सच्चाई और ईमानदारी भर दी थी कि जिस . 
राज्य में भी विज॑ंय प्राप्त करके प्रवेश करते, वहां की जनता इससे 
इतना प्रभावित होती कि अलग धर्म के अनुयायी रहते हुए भी, उन्हें 
मस्लिम शासन का पतन पसन्द न था। यरमूक की लड़ाई में 
मसलमान जब सीरिया के जिलों से निकले, तो तमाम ईसाई जनता 
ने पुकारा कि 'खुदा तुम को फिर इस देश में लाए।' और यहंदियों ने 
तौरात हाथ में लेकर कहा कि हमारे जीते-जी कैसर अब यहां नहीं 
आ सकता। हां! ईरान की हालत इससे भिन्‍न .थी, .वहां केन्द्र के 
अधीन बहत-से बड़े-बड़े सरदार थे, जो बड़े-बड़े जिलों और प्रान्तों 
के मालिक थे, वे केन्द्र के लिए नहीं, बल्कि स्वयं अपनी सत्ता को 
बाकी रखने के लिए लड़ते थे। यहीः कारण है कि राजधानी पर 
विजय प्राप्त कर लेने के बाद भी फ़ारस में हर कृदम पर मुसलमानों 


343 


को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन सामान्य जनता, वहां 
भी मुसलमानों से प्रभावित होती गईं और इसीलिए विजय के बाद 
शासन को सुदृढ़ बनाने में उनसे बड़ी मदद मिली और मिलती चली 
गई। 

सामान्यतः विजेता और उसकी सेनाएं अपने विजित क्षेत्रों पर 
अत्याचार की हद कर दिया करती है, लेकिन हजरत उमर (रजि०) 
जैसे महान विजेता की और से न्याय व दया के अलावा और कोई 
आदेश नहीं जारी किया गया। उन्होंने कृत्लेआम तो बड़ी बात, पेड़ों 
के काटने तक की इजाजत नहीं दी थी। उन्होंने आदेश दे रखा था 
कि बच्चों और बूढ़ों से बिल्कल छेड़खानी न की जाए, दुश्मन से 
कभी किसी मौके पर किए गए वायदे को समझौते के रहते हुए न 
भंग किया जाए, न छल-कपट से काम लिया जाए। अधिकारियों को 
खुला आदेश था कि "शत्रु तुमसे लड़ाई करें, तो उन्हें धोखा न दो, 
किसी की नाक-कान न काटो, किसी बच्चे को कृत्ल न करो।' 

यह तो सही है कि हजरत उमर खिलाफ़त की पूरी मुद्दत में 
एक बार भी किसी लड़ाई में शरीक नहीं हुए, लेकिन यह बात भी 
अपनी जगह पर सही है कि उस समय की शानद्वार विजय का बड़ा 
रहस्य यह भी था कि प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के साथ-साथ हजरत 
उमर (रजिं०) ने इन लड़ाइयों में प्री दिलचस्पी ली थी, पूरा 
उत्साह दिखाया था, वे सेनाओ की पूरी गतिविधियों का ज्ञान रखते 
थे, मानो सेनापति के माध्यम से पूरी सेनाओं का संचालन वही किया 
करते थे। सेना का क्रम, सैनिक अभ्यास, बैरकों के निर्माण, घोड़ों 
की देखभाल, क्लों की हिफ़ाजत जाड़े और गर्मी की दृष्टि से 
आक्रमणों का निर्धारण, डाक पहुंचाने का प्रबन्ध, सैनिक 
अधिकारियों की नियुक्ति, किला तोड़ अस्त्रों का इस्तेमाल, ये और 
इस तरह की बह॒त-सी बातें हैं, जिनसे साफ जाहिर होता है कि 


4 
हजरत उमर (रजि०) के बिना यह मशीन काम नहीं कर सकती 
थी। फिर हज़रत उमर (रजि०) जैसा उत्साही व दृढ़ संकल्पी 
व्यक्त स्वग्रं. किसी मामले में .दिलचस्पी ले, तो उसकी सफलता 
संदिग्ध नहीं रहती। हजरत उमर (राजि०) के समय की लड़ाइयों के 
साथ कछ ऐसी ही स्थिति थी। हे 


]45 


'शासन-व्यवस्था 


इस्लाम ने जिस शासन-व्यवस्था को अपनाया है, उसे 
'खिलाफ़त' कहते हैं और सर्वोच्च शासनाधिकारी को 'खलीफा' 
कहते हैं। खिलाफ़त-व्यवस्था तानाशाही की अंत विरोधी है। 
बादशाही से भी इसका कीई मेल नहीं। खिलाफ़त आज के लोकतत्त्र 
की तरहं भी नहीं कि.जिसमें या तो भीड़तन्त्र पनपती है या 'लोक' के 
नाम पर किसी एक दल या दल के किसी प्रमुख की मनमानी चलती 
है। खिलाफ़त-व्यवस्था सही अर्थों में लोकतंत्र है। लोकतन्त्र का. 
सही रूप अगर देखना है तो हज़रत उमर (राजि०) के शासन-काल 
पर अवश्य ही दृष्टि डालनी चाहिए। 
हजरत उमर (राज़ि०) का शासन 3४१० अर्थों में लोकतन्त्र 
का प्रतिनिधि काल थां। हर छोटे-बड़े में मज्लिंसे शूंरा 
(मन्त्रणा परिषद्‌) से मशविरा जरूर कर लिया जाता, यह मज्लिस 
केन्द्र में भी थी और राज्यों में भी। मज्लिसे शूरा के लोग किसी दल 
विशेष या किसी गुट विशेष से न सम्बन्ध रखते, न अपने हित वह 
स्वार्थ को लेकर देश व राष्ट्र या सत्य के स्वार्थ या हित को आघात 
पहुंचाते। निष्पक्ष भाव से जो बात सच्ची होती, वही कहते, वही 
मशवबिरे देते 
मामूली और रोजमर्रा के मामलों में इस मज्लिस के फैसले बड़े 
महत्वपूर्ण होते थे, लेकिन जब कोई अहम मामला होता तो मशबिरे 
में देश के दूसरे प्रतिनिधि जन भी शरीक कर लिए जाते, मानो यह 
एक प्रकार की वृहत्‌ सभा थी, जिसमें हर वर्ग के लोगों का 


46 


प्रतिनिधित्व पाया जाता था। सन्‌ 2! 5४० में जब नहादन्द की बड़ी 
लड़ाई हुई थी और ईरानियों ने भारी सेना लेकर आक्रमण किया था, 
उस समय जनता की इच्छा थी किइस लड़ाई में स्वयं खलीफा 
हजरत उमर (राजि०) भी शामिल हों, तो वृहत्‌ सभा ही बुलाई गई 
थी और बहुमत से निर्णय किया गया था कि हजरत उमर (रजि०)' 
का युद्ध-स्थल में जाना उचित नहीं है। 
फिर हज़रत उमर (राजु०) के शासन-काल में जनता अपने 
कर्त्तव्यों और अधिकारों से भली-भांति परिचित थी! हजरत उमर. : 
(रजि०) ने बारं-बार इस बात का ऐलान किया था कि लोगों को: _ 
कर्तव्य हैं कि अपने अधिकारों की सुरक्षा करें और खलीफ़ा तक पर, 
आलोचना करने का अधिकार सबको है। 
' खिलाफ़त-कालं में जन-साधारण को प्रशासनिक मामलों में 
कछ भी कहने-सुननें और मशविरा देने का पूरा-पूरा अधिकार 
प्राप्त था। राज्यों और जिलों के अधिकारियों की नियुकित प्रायः. 
जनता की मर्जी को दुष्टि में रख कर की जाती थी, बल्कि कभी -कभी 
तो चुनाव की शक्ल पैदा हो जाती थी। कूफ़ा, बसरा और सीरिया में' 
जब अधिकारियों की नियुक्ति की बात आई, तो .हजरत उमर 
(रजु०) ने इन तीनों राज्यों में आदेश भेजे कि वहां के लोग, 
अपनी-अपनी पसन्द से एक-एक व्यक्ति चुन कर भेजें, जो उनके 
नजदीक तमाम लोगों से अधिक सच्चरित्र, सूझ-बुझ वाले और 
योग्य हों। हजरत साद इब्न अबी वक़कास बहुत बड़े सहानी और 
“यग्य पुरुष थे। हज़रत उमर ने उनको कफे का गवर्नर नियुक्त 
किया था, लेंकिन जब लोगों ने उनकी शिकायत की, तो उन्हें 
* पदच्युत कर दिया गया। का 
किसी भी लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी पहचान है कि हर 
आदंभी को अपने अधिकार औरःहित की सुरक्षा का पूरा-पूरा मौका 
दिया जाए। हजरत उमर (रॉजि5) का खिलाफ़ृत-काल इस दृष्टि से 


वव7 

भी बेहतरीन लोकततन्त्र का प्रमाण जुटाता था। आपके राज्य 'में हर 
व्यक्ति-को पूरी स्वतंत्रता थी, लोग खुले तौर पर अपने विचार व्यक्त 
करते थे। तमाम जिलों से लगभग हर वर्ष शिष्टमंडल आया करते। 
इसका उद्देश्य इसके अलावा कुछ न होता .था-कि खलीफ़ा को हर 
प्रकार के हालत से परिचित कराया जाए। 

सही लोकतंत्र तो यही है कि शासक व शासित सभी समान 
हों। किसी भी शासक को यह अधिकार न प्राप्त हो कि उस पर 
सामान्य कानून का प्रभाव न पड़े, वह देश की आमदनी में से जिंदगी . 
क्री जरूरतों से आधिक न ले सके, उसके अधिकार सीमित हों, हर 
व्यक्ति को उस पर आलोचना का अधिकार हो। ये तमाम बातें 
हजरत उमर (रजि०) के समय में अपनी चरम सीमा को पहुंच गई : 
थीं और इसलिएं हुईं थीं कि हज़रत उमर स्वयं चाहते थे। 


एक मौके पर एक व्यक्ति ने हज़रत उमर (रजिं७) 
सम्बोधित करके फ़रमाया कि हे उमर! अल्लाह से डर! उपस्थित 
जनों में से एक व्यक्ति ने उसको रोका और कहा कि बस, बहुत हो 
गया। हजरत उमर (रजि०) ने कहा, नहीं; कहने दो! अगर ये लोगें 
न कहें तो ये बेकार के लोग हैं और हम लोग न मानें, तो हम किसी 
काम के नहीं। 


हजरत उमर (रजि०) ने अपनी जनता पर पूरी तरह स्पष्ट 
कर दिया था: 

"मुझको तुम्हारे माल (अथांत्‌ बैतुलमाल) में केवल उतना हक्‌ 
है, जितना यतीम के सरपरस्त को यतीम के माल में। अगर मेरा 
अपना धन हो तो कुछ न लूँ और जरूरत पड़े तो जरूरत भर खाने 

'को ले लूँ।' 


- [48 


हजरत उमर (राजि०) का प्रशासन 


हजरत उमर (राज०) पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने मीलों में फैले 
'हुए इस्लामी राज्य के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए 

* समूचे देश को.विभिनन्‍न प्रान्तों में बांट रखा था। प्रान्त, जिला और 

पंरगना उन्हीं की ईजाद है। 

उन्होंने समूचे देश को आठ प्रांन्तों- मक्का, मदीना, सीरिया, . 
जजीरा, बसरा, क॒फ़ा, मिस्र और फ़िलस्तीन में बांट रखा था। बाद में 

' खुरासान, आजरबाइजान और फ़ारस तीन प्रान्तों की वृद्धि हुई। 
7 प्रान्तों का सबसे बड़ा अधिकारीः गवर्नर (वाली) हुआ करता 

, था। इसके अलावा दूसरे पदाधिकारी इस प्रकार हुआ करते थे- 
साहिबुलखिराज अर्थात कलेक्टर, साहिबे अहदास अर्थात्‌ पुलिस 
अधिकारी, साहिबे बैतुलमाल; अर्थात्‌ वित्त-अधिकारी, काजी 
अर्थात्‌ मजिस्ट्रेट या जस्टिस। हर प्रान्त में एक सैनिक अधिकारी भी . 


होता था, लेकिन अधिकतर प्रान्त का गवर्नर ही इस सेवा-भार को 
संभालता था। पुलिस विभाग भी हर प्रान्त में अलग न था, कलेक्टर 


ही इस काम को अंजाम दे लिया करता था। 

प्रान्तों और जिलों के विभाजन के बाद, सबसे महत्वपूर्ण जो 
कार्य होता है, वह है पदाधिकारियों का चुनाव और नियुक्ति और 
उनके कर्त्तव्यों और अधिकारों की सूची। इन मामलों में अगर . 
चौकसी और मुस्तैदी न दिखाई जाए और केन्द्रीय सरकार मनमानी 
करती रहे तो प्रशासनिक ढांचे के अस्त-व्यस्त होने में कछ॑ अधिक 
देर नहीं लगती और पूरे देश की शांति-व्यवस्था खतरे में पड़ जाती 
है।' 


49 ५ 
राज्य चलाने की इस नीति के सम्बन्ध में हज़रत उमर 
(राज०) की चौकसी और मुस्तैदी देखने की चीज थी। हर-महत्वपूर्ण 
पद पर योग्यतम अधिकारियों को ही नियुक्त किया। गवर्नर नियुक्त 
करने का मामला हो या सेनार्पात की नियुक्ति का, वित्ताधिकारी का 
मामला हो या जज की नियुक्ति का, आपने मशविरा करके उन्हीं 
को ये पद दिए जो उसके योग्य थे। हर अधिकारी को उसके कर्त्तव्य 
और अधिकार साफ़-साफ़ बता दिए जाते थे। गदर्नरों की नियुक्ति 
में अधिक सावधानी दिखाई जाती थी। उससे वचन लिया जाता था 
कि वह :- ः 
. तुर्की घोड़े पर सवार न होगा, 
2. बारीक कपड़े न पहनेगा, 
3. छना हुआ आटा न खाएगा, 
4. दरवाजे पर दरबान न रखेगा, 
5. जरूरतमंदों के लिए दरवाज़ा हमेशा खुला रखेगा आदि। 
जिस समय कोई गवर्नर नियुक्त होता था, उसके पास जितना. 
धन होता था, जितनी जायदादें होती थीं, उसकी विस्तृत सूची तैयार 
कर सुर्राक्षत रख दी जाती थी। अब अगर गवर्नर की आर्थिक दशा 
में काफ़ी सुधार हो जाता था और असाधारण वृद्धि हो जाती थी, तो. 
उसकी पकड़ की जाती थी। 
तमाम अधिकारियों को हुक्म था कि वे हर वर्ष हज के समय में 
हज करने आएँ। उस अवसर पर पूरे देश से हर खास व आम जमा 
होते ही थे। हजरत उमर (ररज०) खड़े होकर ऐलान फरमा देते कि 
जिस किसी को किसी अधिकारी से कुछ शिकायत हो, पेश करे। 
अतः: छोटी शिकायतें भी पेश होनेलगती थीं, फिर उनकी जांच होती 
थी और उन शिकायतों को दूर करने की भरपूर कोशिश की जाती 
थी। एक बार ऐसे ही एक अवसर पर एक व्यक्ति ने उठकर 
शिकायत की कि आपके फ्लां अधिकारी ने मुझ को निरपराध सौ. 


हे 50. 
कोड़े मारे हैं। हजरत उमर ने हुक्म दे दिया कि उस अधिकारी को 
सौ कोड़े अब यह व्यक्ति लगाए। कछ लोगों ने आपत्ति की कि आप 
अधिकारियों को इस तरह अपमानित कराएंगे तो काम कैसे चलेगा। 
लेकिन हजरत उमर (रजि०) की यह आपत्ति मान्य न हुई। फिर 
“लोगों ने उस व्यक्ति को समझा बुझा कर कछ मुआवजा ले-देकर 
राजी कर लिया। इस तरंह यह विवादास्पद संकट टल गया। गवर्नरों 
के विरुद्ध की गई शिकायतों की जाँच के लिए कभी कमीशन भी 
, बिठा दिया जाता था। जब हजरत अबू मूसा अशअरी, गवर्नर बसरा 
के खिलाफ लोगों ने शिकायतें कीं, तो उनकी जाँच एक कमीशन के 

' जरिए ही कराई गईं थी। 
आधिकारियों की गलतियों की बड़ी कड़ी पकड़ की जाती थी, 
मुख्य रूप से ऐसी गर्लातयों की जिनसे पद का दिखावा, भेद-भाव या 
नुमाइश का भास होता था। जिस अधिकारी के बारे में मालूम हो 
जाता था कि बह रोगियों की देख-भाल नहीं करंता, या कमजोरों को 
उसके दरबार तक पहुँचने का अवसर नहीं मिल पाता, उसे त्॒रन्त 
मुअत्तल कर दिया जाता था। कहा जाताहै कि.एक बार हजरत 
उमर (र्रज०) बाजार से गुजर रहे थे। एक ओर से आवाज आई कि 
उमर! क्या अधिकारियों के कछ विधान बना देने से तुम अल्लाह के 
अजाब से बच जाओगे? क्‍या तुम्हें मालूम है कि अयाज इब्न गनम, 
जो मिस्र का अधिकारी, है, बारीक कपड़े पहनता है और उसके 
दरवाजे पर पहरेदांर मुक्रेर है? हजरत उमर ने मुहम्मद इब्न 
मुस्लिमों को बुलाया और कहा कि अयाज को, जिस हाल में पाओ 
साथ लाओ। महंम्मद इब्ल मस्लिमा ने वहां पहुँच कर देखा, सच में 
दरवाजे पर पहरेदार खड़ा था और अयाज बारीक कपड़े का करता 
पहने बैठे थे। इसी हाल में वे” अयांज़ को लेकर मदीना चले 
आए।हज़रत उमर (रजि०) ने तुरन्त वह क्रता उतरवा कर मोटा 
करता पहना दिया और बर्करियों का एके रेवड़ मंगवाकर आदेश 


5 


दिया कि जंगल में ले जाकर चराओ। अयाज इन्कार का साहस तो न 
बटोर सके, मगर बार-बार कहते थे कि इससे तो मर जाना बेहतर 
है। . 
* हजरत साद इब्नें अबी वकक्‍कास (राजि०) ने कफा में अपने 
लिए एक महल बनवाया था, जिसमें ड्योढ़ी भी थी। हजरत उमर 
(ररज०) ने इस. विचार से कि इससे जृरूरतमंदों के लिए रुकाबटें 
खडी होंगी, महम्मद इब्न मुस्लिमा को नियुक्त किया कि जाकर. 
डयोठी में आग लगा दें, चनाँचे इस हकम का पूरा पालन हुआ और 
साद इब्ने अबी वककास चुपचाप देखा किए। हज़रत उमर (रजि०) . 
ने बराबरी की जो रूह देश में फूकी थी, वह इसके बिता सम्भव न 
थी। हजरत उमर (राज०) इस बात की तह में भी उतर चुके थे कि 
घसखोरी और भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए यह जरूरी है कि . 
गवर्नरों और दसरे अधिकारियों की तनख़्वाहें उचित और अधिक 
हों। अतः गवर्नरों की तनख़्वाहें उस समय, जर्बाक हर चीज सस्ती 
थी, पाँच-पाँच हजार मु॒क्र्रर की गई थी। 


452 


वित्त-विभाग . 
* नियमित रूप से वित्त विभाग की स्थापना हज़रत उमर 
(ररजु०) का .बड़ा महत्वपूर्ण कारनामा है। सन्‌ 6 हि० में जंब , 
, इर॒ूके अरब'पर पूरा कब्जा हो गया और यरमूक की विजय से 
रूमियों की शक्ति टूट गई तो हजरत उमर (राज०) ने इस ओर 
विशेष ध्यांन दिया। | े 
इस सम्बन्ध में उस समय तक की यह नीति भी एक बाधा थी 
कि विजित क्षेत्र लड़ने वाले सैनिकों की मिल्कियत बन जाता था और 
यह उनकी जागीर समझी जाती थी और वहां के लोग उनके दास। 
प्रर हजरत उम्र (राज०) इस नीति के कट्टर विरोधी थे और चाहते 
थे कि अगर राज्य की वित्तीय स्थिति को सुधारना है, तो इसे समाप्त 
होना चाहिए। हजरत उमर /रजि०) का विचार था कि अगर हम 
/ इस नीति को स्वीकार कर लें तो हुकमत कैसे चलेगी, सेनाएँ कैसे 
तैयार होंगी, विदेशी आक्रमणों से; प्रतिरक्षा, के लिए. रुपये कहां 
से आएंगे, शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ख़॒र्च कैसे पूरे होंगे। 
अन्ततः भन्त्रणा-परिषद्‌ में यह समस्या रखी गई। समर्थन और : 
विरोध में हर प्रकार की दलीलें आईं 'और यह नियम हमेशा के लिए 
बना दिया गया कि जिन क्षेत्रों पर भी विजय प्राप्त की जाए, वे सेना 
| की न मिल्कियत' हो बल्कि राज्य की सम्पत्ति समझी जाएंगी। 
इस नियम के बन जाने के बाद हजरत उमर (रजि०) ने 
विजित क्षेत्रों के बंन्दोबस्त पर ध्यान दिया। इराक चूंकि अरब से. , 
बहुत करीब और अरबों के आबाद हो जाने के कारण अरब का एक 


453 


प्रान्त बन गया था, सबसे पहले उसे हाथ में लिया। हजरत साद 
इब्न अबी वक़कास के जिम्मे जनगणना का काम किया गयां। यहां 
यह स्पष्ट रहे कि सबसे पहली जनगणना हजरत उमर (र्राजु०) ने 
ही कराई। थी और उसी समय यह तय किया गया था कि हर बीस 
वर्ण. बाद जनगणना अवश्य हुआ कंरेगी। सारी जमीन इस तरह 
नापी गई, जैसे कपड़ा नापा जाता है। हजरत उमर (रजि०) ने यह 
पैमाना स्वयं अपने हाथ से तैयार किया था और उस्मान इब्न हुजेफो 
इब्न रैहान की इस कार्य के लिए नियुक्त किया था। कई महीनों तक 
यह काम जारी रहा जांच के नतीजे में पहाड़ों और जंगलों और नहरों 
को छोड़कर कुषि योग्य जमीन के आंकड़े मालूम कर लिए गए।' 
शाही जागीरों, धर्म-स्थानों, सड़कों आदि की जुमीनें भी इस जमीन 
में शामिल न थीं, इन्हें पहले ही अलग कर दिया गया था। इन 
जमीनों को उनके पुराने कब्जादारों को देकर उस पर लगान लगा दी 
गई; जो बहुत ही मामूली थी और जिसे लोग खुशी-खुशी देने पर 
तैयार थे। जिस सुचारू रूप से यह बन्दोवस्त किया गया, उसका 
फल यह निकला कि बहुत-सी बेकार जमीनें भी अनाज उगलने- 
लगीं और कृषि उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ गया। 


कषि-उत्पादन बढ़ाने क्रे लिए हजरत उमर. (रजि०) 
सिचाई का प्रबन्ध बड़ा अच्छा करा दिया था। तमाम विजित क्षेत्रों 
में नहरें जारी कराई' और बांध बांधने, तालाब तैयार करने, पानी: 
का विभाजन करके महाने बनवाने, नहरों की शाखाएं, खुलवाने के 
लिए' एक बड़ा विभाग कायम किग्ना। अल्लामा मिकरीजी के 
कथनानसार फारस- और मिस्र में एक लाख बीस हजार मजदूर 
रोजाना साल भर इस काम में लगे रहते थे और राजकोष 
(बैतुलमाल) से पूरा खर्च अदा किया जाता था। इसका नतीजा यह 
निकला कि लगभग सभी बेकार जमीनें-कृषि योग्य हो गईं, अनाज 
की पैदावार बढ़ी और लगान और पैदावार का दसवां-बीसवां भाग 


4 ; 
(उश्च) ज॒कात के रूप में राज्यं-कोष में जमा होकर सरकारी खंजांने 
को मालामाल करता रहा। ग ; > 
आमदनी के दूसरे साधन 
इस लगान और उश्च॑ के अलावा आमदनी के कुछ और साधन 
भी थे जो राज्यकोष को बराबर सुदृढ़ .बनाए रखतें.थे जैसे :-- 
जकात .. 
जुकात मुसलमानों के लिए मुख्य थी और मुसलमानों की 
किसी भी किस्म की आमदनी इसका अपवाद न॑ थी, यहां तक'कि - 
भेड़ बकरी, ऊँट पर भी ज़कात थी। जकात हर उस मुसलमान पर 
फर्ज थी, जिसके पास 52.5 तोला चांदी या उसके मूल्य के बराबर 
, रुपये एक वर्ष तक बचे रह जाएं। ऐसे तमाम मुसलमानों के लिए 
जरूरी था कि वे अपनी जमा की हुई रक॒म का 2.5 प्रतिशत ज़कात 
के रूप में निकाल कर केन्द्र सरकार के. हवाले कर दें। 
भेड़-बकरी-ऊँट के लिए और व्यापार की चीजों के लिए भी जकात' 
के नियम हजरत मुहम्मद (सल्ल०) के समय में ही तैयार हो चुके थे. 
औरःइस पर सख्ती से अमल होता था। हजरत उमर (राजि०) के 
शासन-काल में जो वृद्धि हुई, वह यह थी कि व्यापार के घोड़ों पर 
जकात मुक॒र्रर कर दी गई। इस प्रकार ज॒ुकात की इस नई मद से 
सरकारी आमदनी में एक और वृद्धि हो गई। है 
उश्व हु 
उश्च खास हजरत उमर (राजि०) की.ईजाद है। शुरूआत इस 
तरह हुई कि मुसलमान, जो विदेशों में व्यापार के उद्देश्य से जाते थे, 
उनसे वहां के नियमानुसार व्यापारं-सामग्री पर दस प्रतिशत टैक्स 
लिया जाता था। हजरत अबू मूसा अशअरी ने हज़रत उमर 
(रजि०) को इससे सूचित किया। हज॒रत-उमर ने आदेश दिया कि 
इन देशों के जो व्यापारी हमारे देश में आएं, उनसे भी उतना ही 
. टैक्स लिया जाए। मुंज के ईंसाइयों ने,;जो उस समय तक इस्लामी 


॥55 


राज्य के अधीन नहीं हुए थे, स्वयं हजरत उमर (रजि०) के पास 
लिखित आवेदन-पत्र भेजा कि हमको दस प्रतिशत टैक्‍स अदा करने 
की शर्त पर अरब में व्यापार करने की इजाजत दी जाए। हजरत 
उमर. (रजि०) ने इसे मंजूर कर लिया और फिर जिम्मियों और 
मुसलमानों पर भी यह नियम लागू कर दिया गया। धीरे-धीरे 
हजरत उमर (रजि०) ने तमाम विजित क्षेत्रों में इस नियम को लागू 
करके एक प्रमुख विभाग'खोल दिया, जिससे बहुत बड़ी आमदनी हो 
गईं। यह टैक्स मुख्य रूप से व्यापार-सामग्री पर लिया जाता था 
और उसके आयात-निर्यात की अवधि एक वर्ष की थी अर्थात्‌ 
. व्यापारी एक वर्ष तक जहां-जहां चाहे, माल ले जाए, उससे दोबारा 
टैक्स नहीं लिया जाता था। यह भी नियम था कि दो सौ दिरहम से 
कम मूल्य के माल पर कुछ नहीं लिया जाएगा। हज़रत उमर 
(रजि०) ने टैक्स वसूल करने वालों को यह भी ताकीद कर दी थी कि 
खुली हुई चीज़ों से यह टैक्स लिया जाए और इसके लिए सामान की 
तलाशी न ली जाए। 


जिज़िया 

जिज़िया वह टैक्स है जो इस्लामी राज्य की ग्रैर-मुस्लिस प्रजा 
के कुछ व्यक्तियों से सुरक्षा के मुआवजे के तौर पर लिया जाता था।. 
दूसरे शब्दों में इसे सुरक्षा-कर कहा जा सकता है। यही कारण है कि 
जब यरमूक “की लड़ाई के कारण इस्लामी सेनाएं सीरियां के 
पश्चिमी भागों से हट आईं और उन्हें यकीन हो गया कि जिन नगरों 
से वे जिज़िया वसूल कर चुकी हैं, जैसे हम्स, दमिश्क्‌ आदि वहां की 
सुरक्षा का भार अब वे सहन नहीं कर सकते, तो जिज़िया से जितनी 
भी रकम वसूल हुई थी, सब वापस कर दी और साफ़ कह दिया कि 
इस समय हम तुम्हारे जान व माल की हिफ़ाज॒त के जिम्मेदार नहीं 
हो सकते। इसलिए जिज़िया लेने का भी हमें अधिकार नहीं। 


॥56 रु 
फिर यह कि जिजिया हर गैर-मुस्लिम से लिया नहीं जाता 
था। जिन लोगों की कभी किसी सैनिक सेवा से लाभ उठाया गया, 
उनको अपने धर्म पर रहते हुए भी, जिजिया से माफ़ रखा गया। 
हजरत उमर (रजि०) ने स्वयं इरांकु के अधिकारियों को लिख भेजा 
: था कि सैनिकों में से जिससे मदद लेने की जुरूरत हो, मदद लो और 
उन का जिजिया छोड़ दो। . 


57 


न्‍्याय-विभाग 


यह विभाग हजरत उमर (रजि०) ही के शासन-काल में 
» नियमित रूप से स्थापित किया गया और प्रशासन से इसे बिल्कुल 
अलग रखा गया। 

न्यायपालिका का अलग 'होना था कि तमाम जिलों में 
न्यायालय (अदालतें) स्थापित कर दिए गए, काजियों (जज़) की 
नियुक्ति कर दी गई। काज़ियों के लिए कार्य-वधि नियत कर दी 
गई। अतः हजरत अबू मूसा अशअरी, गवर्नर-क्‌फ़ा के नाम जो 
फर्मान जारी किया गया था, उसमें साफ़ लिखा था कि:- 

. काजी को न्यायाधीश के रूप में तमाम लोगों से समान 
व्यवहार करना चाहिए। 

2. आमतौर से मुद् ई ही सबूत जुटाएगा। 

3. मुहआ अलैह अगर किसी किस्म का सबूत या गवाही नहीं 
रखता, तो उससे कुसम ले ली जाएगी। 

4. दोनों फ़रीक्‌ हर हालत में सुलह कर सकते हैं, लेकिन जो 
बातें कानून के खिलाफ होंगी, उनमें सुलह नहीं हो सकती। 

5. काजी, खुद अपनी मरज़ी से मुकदमें का फैसला करने के 
बाद उस पर पनर्दृष्टि डाल सकता हैं। 

6. मुकदमे की एक तारीख तय होनी चाहिए 

7. तारीख पर अगर मुदआ अलैह हाजिर न हो तो मुकदमे में 


858 . 


इकतरफा फैसला दे दिया जाएगा। 

8. हर मसलमान गवाही के योग्य है, लेकिन जो सज़ायाफ्ता 
हो, या जिसकी झूठी गवाही देनी साबित हो, वह गवाही के काबिल 
नहीं। 

कहा जाता है कि न्यायपालिका को सुदृढ़ और सुचारू रूप से 
काम करने के लिए चार बातों की आवश्यकता पड़ती है:- 
(क) अच्छा और पूर्ण विधान, जिसके अनुसार निर्णय किए 
जाएँ। हे 

(ख) योग्य और न्यायप्रिय निष्पक्ष अधिकारियों का चयन। 

(ग) वे नियम, वे सिद्धान्त जिनके कारण अधिकारी घूसखोरी 
और दसरे भ्रष्टाचार के शिकार न बनने पाएँ।कि उसका प्रभाव 
निर्णयों पर पड़े। 

(घ) और आबादी के अनुपात से काजियों (मजिस्ट्रेटों) 
नियुक्ति, ताकि न्याय मिलने में किसी को विलम्ब न्‌ हो। 

हज़रत उमर (रजि०) ने इन चारों बातों पर इतना ध्यान दिया 
कि इससे ज्यादा दिया ही नहीं. जा सकता था। 

अदालतों की एक बड़ी जरूरत समता और बराबरी भी है। 
अर्थात्‌ न्यायालयों में राजा-प्रजा, अमीर व गरीब, सज्जन-दुर्जन, 
सबको एक नजर से देखा जाए। हजरत उमर (रजि०) इस बात का 
इतना खूग्माख रखते थे कि उसकी परीक्षा और अनुभव के लिए 
अनेकों बार स्वयं अदालत में मुकदमे के फ़रीक्‌ बनकर गए। एके 
बार उनमें और उबई इब्न काब में कोई झगड़ा हो गया। उबई ने 
काजी जैद इब्न साबित के यहां मुक॒दमा दायर कर दिया। हजरत 
उमर (रजि०) मुहआ अलैह की हैसियत से. हाजिर हुएं। जैद ने 
सम्मान करना चाहा। हजुरत उमर (रज़्ि०). ने फरमाया, यह, 


459 कि 
तुम्हारा पहला “जुल्म. है। यह कह कर उबई के बरांबर बैठ गए. 
उबई के पास-कोई सबूत न था और हजरत उमर (रजि०) को दावे 
से इन्कार था। हजरत उबई के नियमानुसार हजरत उमर (रजि०) 
से कुसम लेनी चाहिए-थी, लेकिन जैद ने उनके पद का विचार करंके 
उबई से दरख्वास्त की कि अमीरुल मोमिनीन को कसम से माफ़ 
_ रखो। हज़रत उमर (रजि०) को इस हिदायत से भी बड़ी तकलीफ 
पहुंची, हजरत जैद (रजि०) से बोले कि जब तक तुम्हारे नंजदीक ' 
“जन-साधारण और उमर दोनों बराबर न हों, तुम न्याया धीश बनने 
. के योग्य नहीं समझे जा सकते। 
काजियों और उनकी कार्रवाइयों के बारे में हज़रतं उमर 
(रजि०) ने जिस प्रकार के नियम व सिद्धांत बनाए थे और उन पर 
जिस प्रकार सख्ती से अमल कराया था, उसी का यह नतीजा. था कि 
उनके शासन-काल में, बल्कि. बनू उमैया काल तक न्यायालयों में . 
निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ढंग से काम होता रहा।. 


इफ्ता-विभाग 

न्यायपालिका का यह पुराना सिद्धांत है कि कानून का न 
जानना माफ़ी की वजह नहीं बन सकता। यह सिद्धाँत पहले भी था 
और अब भी है, लेकिन न पहले ऐसा कभी हुआ और न आज हो रहा 
है, जबकि अब शिक्षा का प्रसार घर-घर हो गया है कि ऐसे उपाय 
अपनाए जाएँ, जिनसे जन-सा धारण भी जरूरी बातों से वाकिफ रहे, 
लेकिन इस्लाम ने इसका विशेष प्रबंध किया था। इफ़्ता विभाग इसी 
कास के लिए मुख्य था। इसका स्वरूप यह था कि बड़े ही योग्य धर्म 
शास्त्री (फ्कीह) हर जगह मौजूद रहते थे और जो व्यक्ति कोई बात 
पूछना चाहता था, इनसे पूछ सकता था। उनका कर्त्तव्य था, कि 
पूरी छान-फटक के साथ उन प्रश्नों का उत्तर दें, जो उनसे पूछे गए 
हैं। ऐसी स्थिति में, कोई भी व्यक्ति, जब चाहे कानन की बातों को 


60 

जान सकता था और इसलिए कोई व्यक्ति यह बहाना नहीं कर 
-सकता था कि वह कानून नहीं जानता। 

हजरत उमर (र्रजु०) के शासन-काल में जिस पाबन्दी के 
साथ इस पर अमल हुआ हैं और इस विभाग ने काम किया है, उनसे 
पहले के युग में शायद इतना नहीं हों सका था। 

इस विभाग की सफलता इसी में है कि इफ़्ता (फतवे) की आम 
इजाजत न हो बल्कि प्रमुख व योग्य व्यक्त इसके लिए मनोनीत 
किए जाएं। ताकि शुद्ध ज्ञान ही लोगों तक पहुँच सके। हजरत उमर 
(रजि०) ने इस पहलू को सदैव ध्यान में रखा और कछ प्रमख 
व्यक्तियों को छोड़कर फतवा देने की आम इजाजत जन-सा धारण. 
कोन थी। 
पुलिस-विभाग 

फ़ौजदारी के तमाम मुकदमे अदालतों में काजियों के यहां 
देखे-सुने जाते थे, लेकिन आर्राम्भक कार्रवाइयाँ पुलिस द्वारा ही 
अंजाम पाती थीं। पुलिस-विभाग निर्यामत रूप से कायम भी कर , 
दिया गया था और उस.समय उसका नाम अहदास था। पुलिस 
अधिकारी को भी 'साहिबुल अहदास' कहते थे। बहरैन पर हजरत 
उमर (राजि०) ने कुदाम: इब्न मज॒ऊन और हजरत अबू हरैरा को 
नियुक्त किया तो कृदामः को मालगुज़ारी वसूलने का जिम्मेदार: 
बनाया और हजरत अबू हरैरा को स्पष्ट शब्दों में पुलिस के 
अधिकार दिए। उस समय॑ पुलिस का काम शान्ति-व्यवस्था बनाए 
रखने का था ही, उनके कर्त्तव्यों में यह बात भी शामिल थी कि वे 
देखें कि दुकानदार नाप-तौल में धोखा न दे सकें, कोई व्यक्ति सड़क | 
पर मकान न बना ले, जानवरों पर ज़्यादा बोझ न लादा जाए, शराब 
ऐलानियां बिकने न पाए आदि। 


> ढ़ 
 जेलख़ाने ; 
हजरत उमर (राजि०) की एक ईजाद यह भी है कि उन्होंने: 

जेलखाने बनवाए, वरन्‌ इनसे पहले अरब में जेलखानों का नामों 
निशान तक न था और यही कारण था कि सजाएँ सख्त दी जाती 
थीं। हज़रत उमर (राजि०) ने सबसे पहले मक्के में सफ़वान इब्न' . 
उमैया का मकान चार हजार दिरहम में खरीदा और उसको 
जेलखाना बनाया, फिर और जिलों में भी जेलखाने बनवांए। 


- |62- 


|. सेना-विभाग 

. इस्लाम से पहले सेनाओं के सिलसिले में कोई विशेष नियम व ' 
विंधान कहीं नहीं पाया जाता था। इसंसे सबसे बड़ी कमजोरी यह 
रहती थी कि सेनाओं कां केन्द्र से कोई नियमित सम्पर्क नहीं बन 
पाता था और जब वे चाहतीं विद्रोह कर बैठतीं और स्वतत्त्र राज्य 
की घोषणा कर द्वेतीं॥ ग अल ऐे 

हजरत उमर (रजि०) का ध्यान इस ओर भी आंकृष्ट हुआ _ 
और इस विभाग को इतना नियमित व सुगठित कर दिया कि उस 
युग. के लिए यह एक विचित्र बात थी। 

* सैनिकों के रजिस्टरों को तैयार करा लिया गया, पूरे देश के 
लिए. एक सेना तैयार कर लीं गई। रजिंस्टर के अनुसार लड़ने वाले 
सैनिकों और वालंटियर कोर या रिजर्व फोर्स को दो भागों में 
विभाजित कर दिया गया। 

ऐसे ही पूरे देश-को सैनिक क्षेत्रों में बांट कर हर क्षेत्र के हेड 
बूवार्टर निर्धारित कर दिए गए। ईन हेंड क्वार्टरों पर सेनाओं के लिए. 
जो प्रबन्ध किए गएं, वे निम्न थे :- 

।. सेनाओं के रहने के लिए बैरकें तैयार की गईं। 

-2, हर जगह बड़े-बड़े अस्तंबल तैयार कराएं गए, जिनमें 
चार-चार हजार घोड़े हर वक्‍त साज व सामान क़े साथ तैयार रहते 
थे। ये केवलं इसलिए तैयार रखे ज़ाते थे कि अचानक जरूरत पेश 
आएँ!तो 32 हज़ार सैनिकों की टुकड़ी तैयार कर ली जाए। 


463 


3. सेना से सम्बन्धित हर प्रकार के कागजात और रिकार्ड 
इन्हीं जगहों पर रहता था। य ५ 

4. रसद के लिए जो अन्न और खाद्य पदार्थ जुटाए गए थे, वे 
सब इन्हीं जगहों पर रखे जाते थे और यहीं से दूसरी जगहों को भेजे 
जाते थे। बा, 


इन हेड क्वार्टर्स के अलावा हजरत उमरं (रजि०) ने बड़े-बड़े . 
शहरों और महत्वपूर्ण स्थानों पर काफ़ी बड़ी संख्या में सैनिक 
छावनियां स्थापित कीं। इसी तरह सेनाओं की जरूरतों का प्रबंध 
और उनकी तनख़्वाहों पर भी विशेष ध्यान दिया।- सेनाओं के 
सम्बन्ध में कछ और बातों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था, जो 
इस प्रकार हैं :- . 

(क) मौसम की दृष्टि से लड़ाई-की दिशाएँ निर्धारित कर॑ दी 
जाती थीं, जैसे जो ठंडे देश थे वहां गर्मियों और गर्म देशों को जाड़े में 
सेनाएँ भेजी जाती थीं। 

(ख) वसन्त ऋतु में सेनाएं उन स्थानों की भेजी जाती थीं, जहाँ 
की. जलवायु बेहतर हो और जहां हरियाली पाई जाती हो। 

(ग) बैरकों और छावनियों के निमांण में सदैव अच्छी जलवायु 
को ध्यान में रखा जाता था। मकानों को हवा और रोशनी की दृष्टि 
से भी इस तरह तैयार किया जाता था कि स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव 

. ने पड़ें। ह 
(घ) सेना को जब कूच करने कां आदेश दिया जाता तो साथ 
ही इसे भी ध्यान में रखा जाता था कि वह जुमा के दिन अपना पड़ाव 
डाले और पूरे एक दिन पड़ाव डाले रहे, ताकि लोग कुछ आराम कर 
लें और हथियारों और कपड़ों को दुरुस्त कर लें । साथ ही यह भी 
ताकीद रहती कि हर दिन उतनी ही मंजिलें तय की जाएं, जिससे कि 


मा 
थकन का अनुभव कम से कम हो और वहां पड़ाव डाला जाए जहा 
हर तरह की ज़रूरतें पूरी हो सकें। - 
'ड) छाट्टियों का नियम: भी बना दिया गया था कि जो सेनाएं दूर 

के इलाकों में पड़ी थीं उनके सैनिकों को साल में कम से कम एक 
बार, वरन्‌ दो बार छट्टियाँ दी जाएँ, बल्कि एक मौके पर जब हजरत 
उमर (रजि०) ने एक औरत को अपने पति की जुदाई में करुणं पद 
पढ़ते सना तो अधिकारियों को आदेश दे दिया कि कोई चार महीने | 
,. से अधिक बाहर रहने प्रर मजबूर न किया जाए। 

लेकिन ये तमाम सविधाएँ उसी समय तक़ थीं जब तक ः 
जरूरत का तकाज़ा था, वरन्‌ आराम तलबी, काहिली और 
भोगी-विलासी जीवन जीने से बचने के लिए बड़े कड़े नियम बना 
दिए थे। इसकी बड़ी ताकीद थी कि सेनानी रिकाब के सहारे सवार 
न हों, नरम कपड़े न पंहनें, धूप खाना.न छोड़ें, हम्मामों में न नहाएँ। 

इस प्रकार हजरत उमर (रजि०) ने अपने विवेक़ से काम 
लेकर सेनाओं को नियमित रूप से गठित किया और उस समय तक 
की सामरिक कला को उन्नति देकर उसे अपनी चरम सीमा पर 
पहंचा दिया। उस युग में इस कला का इतना भारी विकास और 
वैज्ञानिक गठन, सिर्फ हजरत उमंर (रजि०) की प्रशासनिक 
सुझ-बझ का पता देता है। 


365 


इस्लाम का प्रचार-प्रसार 


सेनाओं और सैनिक कार्रवाइयों से किसी को यह भ्रम नहीं. 

होना चाहिए.कि इस्लाम के प्रचार व प्रसार का.जो काम बहत ही 
बड़े पैमाने पर-हुआ, उसमें तलवार का बड़ा दखल था। तलवार के 
. बल पर धर्म-परिवर्तनं के खिलाफ़ स्वयं कुरंआन मजीद की यह 

* आयत गवाही दे रही है किः- -- 
ला इकराह फ़िंद्दीन ' (धर्म के मार्मलें में: कोई-ज़र्बदस्ती नहीं) 


भला हजरत उमर (रजि०) या उनके साथी इसके विरुद्ध कैसे 
कोई काम कर सकते थे। समझाने-बझाने के बावजूद जब हजरत 
उमर (रजि०) का दार्स स्वयं इस्लाम स्वीकार करने-प्रर तैयार ने 
हुआ तो आपने यही आयत पढ़ी थी। 

हां, हजरत उमर (रजि०) के युग में, इस पहल से अवश्य काम 
हुआ कि इस्लाम के पावन सन्देश को एक-एक व्यक्ति तक पहुंचाने - 
की कोशिश की गई। यहां तक कि हजरत उमर (राजि०) अपनी 
सेनाओं को भी जब कच करने का आदेश देते थे, तो ताकीद कर देते. 
थे कि पहले उन लोगों को इस्लामी संदेश पहुंचाया जाए और यह 
बताया जाए, कि जिसने पैदा किया है, जो स्वामी है, पालनहार है 
उसी का भेजा हुआ यह संदेश है कि. अपने पूरे जीवन में उसी की“ 
भक्ति व आज्ञापालन करो, यही सफलता की कुंजी है और इसी से 
तुम्हारा स्वामी मरने के बाद तुम्हें शाश्वत सुखों का भागीदार: 
बनाएगा, इसलिए यही मुक्ति-मार्ग है, इसे अपनाओ। 


/ - ॥66: 


सिद्धांत कितना ही अच्छा हो, अगर वह व्यवहार्य न्‌ हो, या : 
उस पर चलकर कुछ लोग आदर्श न प्रस्तुत कर रहे हों, तो वह 
प्रभावहीन सिद्ध होता है। हजरत उमर (रराज०) का युग इस पहलू से 
भी आदर्श रहा है कि उन्होंने अपने शासन-काल में मुसलमानों को: 
आदर्श जीवन बिताने पर पूरा बल दिया। बल्कि यों कहना चाहिए 
कि उस युग के लोगों को देखकर इस्लाम के चलते-फिरते चित्र की 
याद-ताजा हो जाती थी। यहां तक कि इस्लामी सेनाएं भी जिस ओर 
से गुजर जाती थीं लोगों को खामखांही उनकी देखने का शौक पैदा 
होंता था। इस तरह जब लोगों को उनके देखने औरं उनसे 
मिलने-जुलने का अवसर मिलता था तो एक-एक मुसलमान 
. सच्चाई, सादगी, पवित्रता, उत्साह और निष्ठा का चित्र नज़र आ 
जाता था। ये चीजें स्वतः लोगों के मन को खींचती थीं और इस्लाम 
. उनमें घर करता जाता था। सीरिया प्रदेश ही की प्रसिद्ध घटना है कि 
रूमियों का दूत जार्ज, हज़रत अबू उबैदा और उनके सैनिकों के 
आचरण से इतना प्रभावित हुआ कि इस्लाम की सत्यता उसके लिए 
कोई अनजानी चीज न रही और तुरन्त-इस्लाम स्वीकार कर लिया। 
शत्ता, जो मिस्री राज्य का एक बड़ा सरदार था, मुसलमानों ही के 
आचरण से प्रभावित होकर इस्लाम का शैदाई बना था और अन्ततः. 
दो हजार आरदमियों के साथ मुसलमान हो गंया था। यही कारंण है 
कि मुसलमानों के कदम ज्यों-ज्यों आगे बंढ़ते गए, उनके 
चरित्र-आचंरंण के अमिट चिंन्ह लोगों. के दिलों पर अपनी छाप 
डालते गए, इस्लाम फैलता गयां और लोग मुसलमान होते“गए। 


प्रचार के दूसरे, साधने 


इस्लाम-प्रंचांर के लिए कुरआन का जमा करना, उसकी शुद्ध" 
प्रतिं का निकलवांनां, समूचे देश में उसकी शिक्षाओं का चलन आम 
करना भी काफ़ी महत्वपूर्ण कार्य है। हजरत.-उमर (रजि०) ने भी 


67 


इस ओर विशेष ध्यान दिया। यह बात सभी जानते हैं कि प्यारे नबी 
(सलल०) के समय में क्रआन मजीद को पुस्तक रूप नहीं प्राप्त हुआ 
था। बिखरे हुए अंश विभिन्‍न लोगों के पास थे वह भी क॒छ हड्डियों 
पर, कुछ खजूर के पत्तों पर, कुछ पत्थर की तख््तियों पर। सभी 
क्रआन के हाफिज भी नहीं थे। हज़रत अबूबक्र (रजि०) के: 
'शासन-काल में जब मुसैलमा किज्जाब से लड़ाई हुई, तो सैकड़ों 
सहाबी शहीद हुए, जिनमें क्रआन के हाफिज भी बहत थे। यह 
बात हजरत उमर (रजि०) के लिए बंड़ी चिन्ताजनक थी। आपने 
कुरआन को एक प्रति में संकलित कर लिए जाने पर हजरत अबबक़र 
(राज०) को तैयार कर लिया और उन्हीं के शासन-काल में 
राजकीय प्रति तैयार करा; ली गई। 


हज़रत - उमर (रजि०) का काल आते-आते इसकी 
आवश्यकता और बढ़ गई कि कुरआन की सुरक्षा का विशेष प्रबन्ध 
' किया जाए और ऐसे चोर दरवाजे बन्द कर दिए जाएँ.जिनसे अन्य 
ईश्वरीय धर्म-ग्रन्थों की तरह उसमें संशोधन-परिवर्तन सम्भव न" 
हो सके। इसी उद्देश्य से हज़रत उमर (राजु०) ने सबसे पहले: 
उसकी तालीम पर अधिक जोर दिया .और ऐसी व्यवस्था की कि हर 
वर्ष सैकड़ों और हंज़ारों हाफिज पैदा हो जाएँ। आपने कंरआन का 
पढ़ना अनिवार्य कर दिया, चुनांचे एक व्यक्ति को, जिसका नाम अब 
सुफ़ियान था, कुछ व्यक्तियों के साथ इस पर तैनात किया कि वह 
कृबीलों में घूम-घूंम कर हर व्यक्ति की परीक्षा लें और जिसको 
कुरआन मजीद का कोई भागं याद न हो, उसको सज़ा दें। 

हजरत उमर (रजि०) नें कुरआन के साथ हदीस और फिक़्ह 
(धमंशास्त्र) की शिक्षा पर भी काफ़ी जोर दिया। इसके लिए सभी . 
प्रान्‍्तों और जिलों में अध्यापकों का प्रबन्ध किया गया। इन- 
अध्यापकों को बंड़ी-बड़ी तनख़्वाहें दी जाती थीं, ताकि वे एकाग्र 


68 


होकर पढ़ने-पढ़ाने. के काम कों अंजाम दे सकें। धर्म-शिक्षां आम 
, हो, इसके लिए मदरसों और स्कलों के अलावा, .हजरत उमर 
(राज०) ने हर शहर-क॒स्बे में इमाम और मुअज़्जिन नियुक्त किए 
और बैतलमाल. से उनकी तनख्वाहें नियत-कीं- इन प्रबंधों से 
मौलिक शिक्षाओं को बच्चा-बच्चा जानः'गया। मुसलमानों 'के 
' अलावा गैर-मुस्लिमों को भी इस्लामी शिक्षाओं का ज्ञान हो गया। 


. कछ और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ 

/ उपर्यक्त कछ. प्रमुख व्यवस्थाओं के साथ-साथ कुछ और 
प्रशासनिक कार्रवाइयां हैं, जिनका महत्व बहुत से पहलुओं से बहुत 
» ज्योंदा है, जैसे :- 

. दफ्तर और कागजात के रिकार्ड के लिए संन्‌ और साल की 
आवश्यकता पड़ती है। हज़रत उमर (रजि०) से पहले इन चीजों का 
बजद था ही क़ब? 'कछ प्रसिद्ध घटनाओं के आधार पर साल 
जोड़कर बताने का चलन आम था, लेकिन यह हजरत उमर, 
(रजु०) ही थे, जिन्होंने हिजरी सन्‌ का आरम्भ किया। 


2. हर काम के अलग-अलग रजिस्टरों के रखने का रिवाज, 
हजरत उमर (रजि०) के समय में ही चला था। इन रजिस्टरों में 
सही-सही लिखने के लिए माहिर लोगों (एकाउंटेंट्स) को नियुक्त 
किया गया। यहीं कारण है कि बैतुलमाल (राजकोष) का 
हिसाब-किताब बड़ा साफ़-सुथरा रहता था। जब जो चाहे मालूम 
कर सकता था कि विभिन्‍न युद्धों में कया और कितनी रकम जमा 
हुई, कितनी खर्च: हुई. और अब खजाने में क्‍या है। 

3. जन-गणना और उसे संबंध के कागृज़ात की तैयारी और 
रिकार्ड भी हज़रत उमर (रज०) ही की देन है। ह 

. 4. सिक्कों का चलन भी हजरत उमर (राजि०) ही के समय से 
शंख हो गया थधा। 


69 


इस्लामी राज्य की ज़िम्मी-प्रजा 


हजरत उमर (रजि०) ने जिम्मी! प्रजा को जो अधिकार दिए, 
उसका मुकाबला अगर उस समय के और राज्यों से किया जाए तो कोई' 
अनुपात ही नहीं बनता। रूमी व ईरानी साम्राज्य में जिम्मियों को 
दास' से अधिक महत्व प्राप्त न था। लेकिन इस्लामी राज्य के 
ग्रैर-मुस्लिमों को इतने अधिकार मिले हए थे, मानो समानता के 
आधार पर समझौता करने वाली दो जातियां हों। उदाहरण में 
बैतुलमक्दिस के समझौते को लीजिए, जो हज़रत उमर (रजि० ) 
मौजूदगी ही में हुआ था और जिसमें कहा गया था:- 


यह वह ,अमान (शरणं) है, जो अल्लांह कें बन्दे अमीरुल 
मोमिनीन उमर (रजि०) ने एलिया के लोगों को दी। यह अमान 
उनकी जान, माल, गिरजा, सलीब, तंदुरुस्त, बीमार और उनके 
तमाम धार्मिकों के लिए है, इस प्रकार कि उनके गिरजों में न निवास 
किया जाएगा,न बे ढाए' जायेंगे, न उनको या उनके अहाते को कछ 
नुकसान पहुंचाया जाएगा, न उनकी सलीबों और उनके माल में 
कुछ कमी की जाएगी। धर्म के मामले में उन पर कोई जबर्दस्ती न 
की जाएगी, न उनमें किसी को नुकुसान पहुंचाया जाएगा। एलिया में 
उनके साथ यहूदी न रहने पाएंगे। एलिया वालों का कर्तव्य है कि 
और नगरों की तरह जिजिया (सुरक्षा कर) दें और यनानियों में से जो 


 ], जिम्मी-प्रजा इस्लामी राज्य की उस गैर-मुस्लिम प्रजा को कहते हैं 
जिनकी जान और माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी इस्लामी सरकार लेती है। 
अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें स्वयं युद्ध में भाग लेना नहीं पड़ता। इस सरक्षा के 
लिए वे सरकार को एक विशेष कर देते हैं जिसे जिजया कहा जाता है। 


70 


नगर से निकलेगा, उसकी जान और माल को अमान है, जब तक कि 
वह शरण-स्थल को न पहुंच जाए और जो एलिया ही में रहना चाहे 
तो उसे भी अमान है और उसको जिजिया देना होगा और एलिया 
बालों में से जो व्यक्त अपनी ज़ान और माल लेकर यूनानियों के 
साथ चला जाना चाहें, तो उनको, उनके गिरजों को और सलीबों को 
अमान है, यहाँ तक कि वे शरण-स्थल को पहुंच जाएँ और जो कुछ 
इस तहरीर में है, उस पर अल्लाह का, अल्लाह के रसूल का 
खलीफों का, मसलमानों का जिम्मा है, बंशर्तें कि ये लोग निर्धारित 
कर देते रहें। इस तहरीर पर गवाह हैं खालिद इब्न वलीद, अम्न इब्न 
आस, अब्दर्रहमान इब्न औफ़ और मुआविया इब्न अबी सुफ़ियान 
और यह सन्‌ 5 हि० में लिखी गईं। 

इस समझौते से साफ़ मालूम होता है कि हजरत उमर (र्राजु०) 
ने जिम्मियों को काफ़ी अधिकार दे रखे थे, उनकी सुरक्षा की हर 
प्रकार की जिम्मेदारी थी, उनको अपने धर्मं पर चलने की पूरी 
स्वतन्त्रता दे रखी थी। यूनानी ही-मुसलमानों के असल शत्रु थे, फिर. 
भी उन्हें परी सविधाएँ दी गईं। और यह केवल कागरजी कार्रवाई ही 
नहीं थी, वॉक हजरत उमर (र्ाज०) ने इसे व्यवहारिक रूप भी 
दिया। . 

यह आज से ]350 साल पहले का दौर था, जिम्मी प्रजा 
इस्लामी राज्य से पूरी तरह सन्तुप्ट थी, पर आज ( आज भी अनेक 
राष्ट्रों ने अपने अल्पसंख्यकों को अनेकों अधिकार दे रख हैं, पर 
उनकी हैसियत कागजी ख़ानापुरी से आधिक नहीं है। क्या आज का 
युग हज़रत उमर (र्राज़०) के युग का मुकाबला कर सकता हैं? 

सबसे बड़ी बात यह है कि जान व माल की सुरक्षा के संदर्भ॑ में 
हजरत उमर (राज़०) ने किसी मुसलमान और ज़िम्मी में कोई 
अन्तर नहीं किया। कोई मसलमानं अगर किसी जिम्मी को कृत्ल का 
डालता था, तो हजरत उमर (ररजि०) तुरन्त उसके बदले मुसलमान 


ऊ 


॥7 


को कत्ल करा देते थे। इमाम शाफुई रिवायत करते हैं कि बिक्र इब्न 
वाईल कबीले के एक व्यक्ति ने हियरा के एक ईसाई को मार डाला। * 
हजरत उमर (र्राज०) ने लिख भेज कि क़ातिल मक्‍्तूल (मरने वाले) 
के वारिसों को दे दिया जाए। अतः वह व्यक्त, मक्तल के वारिस के 
जिसका नाम हनैन था, हवाले कर दिया गया और उसने उसको 
कृत्ल कर डाला। 


माल और जायदाद के बारे में उनके अधिकारों की सरक्षा 
इससे बढ़कर क्या हो सकती थी कि जितनी जमीनें उनके कब्जे में 
थीं, उसी हैसियत में बहाल रंखी गईं, यहां तक कि मुसलमानों को 
उन जमीनों का खरीदना भी नाजायज क़रार दे. दिया गया। 


एक बार एक काश्तकार की फूसल को सैनिकों से नुकसान 


'पहंच गया, हजरत उमर (रजि०) ने बैतुलमाल से दस हजार 


न्‍ दिरहम मुआवजे में दिलवाए। 
. जिम्मियों से मशविरे लिये जाते 


एक बड़ा अधिकार जो जनता'को प्राप्त हो सकता है, वह यह 
है कि राज्य-प्रशासन में उनको भी शरीक किया जाए। हजरत 


* उमर (रजि०) सदैव ऐसे मामलों में जिनका सम्बन्ध जिम्मियों से . 


होता था, उनके मत और मशविरे के बिना कोई कृदम न उठाते थे। : 
जब इराक का बंदोबस्त हो रहा था तो. ईरानी सरदारों को मदीना - 
बुलाकर मालगज़ारीं के हालात मालूम किए। मिस्र में जो इन्तिजाम 
किया, उसमें मकूक्स से अक्सर राय ली। 

जिम्मियों पर किसी भी प्रकार की कठोरता हजरत उमर 
(रजि०) को प्रिय न. थी। 'किताबुल ख़्राजु' में उल्लिखित है कि 
हजरत उमर (रजि०) जब सीरिया से वापस आ रहे थे, तो कुछ 
आंदमियों को देखा कि धूप में खड़े हैं और उनके सिर पर तेल डाला 
जा रहा है। लोगों से पूछा कि बात क्या है? मालूम हुआ कि इन 


72 9 
* लोगों ने जिज़िया नहीं अदा किया है, इसलिए उनको सजा दी. जाती 
है। हजरत उमर (रजि०) ने पूछा कि आखिर उनकी विवशता क्‍या 
है? लोगों ने कहा गरीबी'। फ़रमायां, छोड दो और उनको कष्ट न 
दो। मैंने अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से सुना .है, 'लोगों को कष्ट न 
दो।' जो लोगं दनिया में लोगों को .अजाब पहंचाते हैं, अल्लाह 
कियामत में उनकों अजाब पहुंचएगा।' हजरंत अबू उबैदा को 
सीरिया की विजय के बाद जो आदेश भेजे, उसमें.ये शब्द थे :- 
पाएं, न उनको नुक्सान पहुंचाने पाएं.न उनका माल बे-वजह खाने 
पाएं. और जितनी शर्तें तुमनें उनसे की हैं, सब पूरी करो।' 


धार्मिक स्वतंत्रता ह 

धार्मिक मामलों में जिम्मियों को पूरी स्वतंत्रता प्राप्त थी। वे 
हर प्रकार की. धार्मिक रस्में पूरी करते थे, खुले तौर पर नाकूस- 
(शंख) बजाते थे, सलीब निकालते. थे, हर किस्म के मेले-ठेले करते 
थे। उनके धर्म-गरुओं को जो धार्मिक अधिकार प्राप्त थे, ब्रिल्कुल 
बाकी रखे गए थे। अतः हजैफ़ा-इब्न यमान ने माह दीनार वालों को ' 
जो. तहरीर लिखी थी, उसमें ये शब्द स्पष्टं रूप-से लिखे गए थे :- . 

उनका धर्म न बदला जाएगा और उनेके धार्मिक मामलों में 
कोई हस्तक्षेप न किया जाएगा ” लगभग यही शब्द तमाम दूसरे 
समझौतों में पाए जाते हैं, जो गैर-मुस्लिमों से किए जाते थे। 


अधिक सुविधाएं 

जिम्मियों से जिजियां और : उश्च' के अलावा कोई और कर न 
लिया जाता था, जबकि मसंलमानों से जकात वसूल की जाती थी. 
जिंसकी मात्रा उपर्यक्त दोनों करों से अधिक थी। जुकात के अलावा : 
मुसलमानों से-उश्चः भी वसूल किया जाता था। - 


“ इस्लामी राज्य की ओर से मुसलमान अपंगों, बूढ़ों को वजीफ़ा 


3 : 
मिला करता था, लेकिन जिम्मियों कों मुसलमानों से भी अधिक 
सुविधाएं प्राप्त थीं। हज़रत खालिद इब्न वलीद (रजि०) ने हियरा 
की विजय के अवसर पर जो समझौता-पंत्र तैयारे किया था, उसके 
शंब्द इंस प्रकार थे :- 

'और मैंने उनको यह अधिकार दिया कि अगर कोई बूढ़ा 
व्यक्ति काम करने से विवश हो जाए, या उस पर कोई विपदा आ 
जाए, या पहले धनवान था, फिर निर्धन हो गया, उंसके धर्म के लोग * 
उसे दान देने लगें, तो उसका जिजिया खत्म कर दिया जाएगा और 
उसको और उसकी औलाद को मुसलमानों के बैतुलमाल से- पूरा : 
खर्च दिया जाएगा, जब तक वह इस्लामी ं राज्य में रहे। लेकिन अगर 
वह विदेश.चला जाए, तो राज्य उसके खर्चे का जिम्मेदार न होंगा। 

* हजरत उमर (रजि०) के शासन-काल की घटना है कि एक- 
बार हजरत उमर (रजि०) ने एक बूढ़े व्यक्ति को भीख मांगते देखा, 
पूछा, भीख क्‍यों माँगता है? कहा, मुझ पर जिजिया लगाया गया है 
और मुझ में उसके अदा करने की शक्ति नहीं है। हज़रत उमर 
(रजि०) उसको साथ -घर पर ले आए और कुछ नकृद देकर 
बैतलमाल के अधिकारी से कहला भेजा कि इस प्रकार के विवश 
लोगों का वजीफा बांध दो। 

जिम्मियों को अधिक से अधिक सुविधाओं के देने की भावनां 
इस हद तक आगे बढ़ी हुई थी कि उनके षडयन्त्र करने या विद्रोह' 

' भड़काने सरीखे अपराध के पाए जाने के बाद भी उनकी दी. गई 
. सुविधाओं को ध्यान में रखा जाता। 

सीरिया की अन्तिम सीमा. पर एक नगर था, जिसका नाम 
अरबसस था और जिसकी दूसरी सीमा एशिया माइनर से मिली हुई 
थी। सीरिया पर जब विजय मिल गई तो इस नगर पर भी विजयू , 

' प्राप्त कर ली गई और समझौता हो गया, लेकिन यहां .के लोग 
घडयन्त्र में लगे रहे और रूमियों को इधर की ख़बरें बराबर पहुंचाते 


हि - गाज दि 

'रहे। वहां के अधिकारी हज़रत. उमर इब्न सांद ने हज़रत उमंर 

: (रजि०) को सूचना दी। हज़रत उमर (रजि०) ने उनके उत्तर में 
लिखा कि जितनी भी उनकी .जायदाद; जमीन, मवेशी और सामान 
हैं, सब गिन कर एक-एक की दो ग॒नी फीमत दे दो और उनसे कह 
“दो कि कहीं और चले जाएँ। अगर इस पर भी तैयार न हों तो उन को 
एक साल की मुहलत- दो. और उसके बाद देश निकाला .दे दो। 
. इस्लामी राज्य के जिम्मी इन सुविधाओं से किस हद- तक 
_सन्तुष्ट थे; इसका बड़ा प्रमाण: यह है कि जिम्मियों ने हर॑;मौके पर 
स्वयं अपने धर्मानुयायिं के:मुकाबले में मुसलमानों: का साथ दिया। 
मुसलमानों से उनके लगाव.का हाल यह-था कि यरमूक की लड़ाई के 
समय॑ जब मुसलमान हम्स- नगर से.निकले, तो 'यहूंदियों ने तौरात 

“ हाथ में लेकर कहा कि ज़ब तक हम जिन्दा:हैं, कभी रूमी.यहां न 
आने पाएंगे। ”, और ईसाइयों ने बड़ी हंसंरंत से कहा, 'खुदा, कीं 

, कसम! तुम रूमियों के मुकाबले में हमें कहीं ज़्यादा प्रिय्न हो। 


॥5: 


न्यायप्रिय शासक 


राजनीति और शांति-व्यवस्था तथा न्याय की दृष्टि से हजरत 
“उमर (रज़ि०) का नाम कियामत तक चमकते सूरज की तरह रौशन 
'रहेगा। सोचिए तो, कितना बड़ा राज्य है, भांति-भांति कें लोंग हैं, 
अनेक धर्मावलम्बी हैं, विभिन्‍न जातियां हैं, लेकिन कहीं कोई बेचैनी 
नहीं, अशान्ति नहीं, हर जगह शॉन्ति है, व्यवस्था है और न्याय है। 
अरबसूस ने बार-बार विद्रोह करना चाहा, तंग आकर उन्हें 
देश निकाला दे दिया गया, फिर भी पूरी मानवता के साथ और 
न्यायपूर्ण व्यवहार दिखाते हुए। न उनकी जायदाद जब्त की गई, 
[माल-असबाब। जो ले जा सके, ले गए, शेष की सूची तैयार करा कर 
एक-एक की दोगुनी कीमत अदा कर दी गई। इसी तरह नजरान के 
ईसाइयों को, कोई और रास्ता न पाकर जब अरब से निकल जाने का 
आदेश दिया गया, तो इस रियायत के साथ निकाला गया कि उनकी. 
जायदाद की एक-एक पाई चुका दी जाए, साथ ही गवर्नरों को 
हिदायत कर दीं गई कि जब उनका गुजर उनके इलाके से हो, तो 
उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ दी जाएँ और जब ये कहीं स्थायी रूप से 
वास करें तो चौबीस महीने तेक इनसे कोई जिजिया या टैक्स न लिया 
जाए 
हजरत उमर (रजि०) का शासनकाल निस्संदेह लोकतंत्र का 
, आदर्श काल था, वह अपनी नीति, निष्ठा, न्याय, विवेक के कारण 
'लोगों.के दिलों प्र शासन्त करते थे और किसी को साहस न हो पाता 
'था कि उनके किसी निर्णय का कोई विरोध कर सके। सीरिया के 


॥76 


सफर में जब उन्होंने खुली सभा में हजरत खालिद को सेनापतित्व से 
पदच्युत कर दिया और अपनी नीति की सफ़ाई पेश कर दी. तो एक 
व्यक्ति ने वहीं उठकर कहा:- 
'हे उमर! खुंदा की केसम, आपने इन्सांफ नहीं किया, आपने 
- तो अल्लाह के रसूल (सलल०) के अधिकारी को पदच्युत कर दिया, 
. आपने अल्लाह के रसूल की खींची हुई तलवार को म्यान में डाल दीं, 
आपने नातेदारी भंग कर दी, आप अपने चचेरे भाई से जले।' 
हजरत उमर (रजि०) ने यह सब-सुनकर केवल इतना कहा 
कि 'लगता हैं तुम को अपने भाई की हिमायत में गुस्सा आ गया है।' 
“ ऐसी स्थिति में'भी आपके रोबं का हाल यंह था कि हजरत 
खालिद को, ठीक उस समय,.जबकि तमाम इराक व सीरिया के 
क्षेत्रों में लोग उनके शौर्य-पराक्रम के गुणगान किया करते थे, , 
, पदच्युत किया और किसी को साहस न हुआ कि कोई प्रतिक्रिया 
दिंखा सके, यहाँ तक कि किसी प्रकार का कोई विचार भी मन में ला. 
सके। अमीर मुआविया और अम्र इब्नुलआस (रजि०) की शानो 
शौकत. खुले दिन की तरह सभी जानते थे, लेकिन हजरत उमर 
(रजि०) के नाम से वे कांप-कांप जाते थे। हजरत अम्न इब्न आस 
(रजि०) के बेटे अब्दुल्लाह (राजि०) ने एक व्यक्ति को बे-मतलब 
मारा था। हज़रत उमर. (रजि०) ने अम्र इब्न आस के सामने उनको 
उसी पिटे हुए व्यक्ति से कोड़े लगवाए। हजरत साद इब्न अबी 
वबक्‍कास, ईरान के विजेता को मामूली शिकायत पर जवाबदेही में - 
तलब किया, तो उनको तत्काल हाज़िर होना पड़ा। 
सब समान 
उततके शासन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि 
मानव-मानव में कोई भेद-भाव नहीं किया जाता था, न्याय की दृष्टिः 
से सभी बराबर थे: किसी को कोई प्रमुखंता प्राप्त न थी। सीरिया का : 


॥77 


प्रसिद्ध संरदार जिबिल्ला इब्नुल अलीम ग्रस्सानी मुसलमान हो गया 
' था। संयोग कि एंक दिन वह काबा के तवाफ (परिक्रमा) में व्यस्त 

था। उसकी चादर के एक कोने पर किसी मुसलमान-का कदम पड़ 
गया। मारे क्रोध के उसका चेहरा सुर्ख हो गया। खींच कर इस जोर 
का थप्पड़ मारा कि वह घबरा गया लेकिन तत्काल ही उंसने पलंट 
कर ज़ोर का थप्पड़ मार दिया।: जिबिल्ला का गुस्सा और भड़क. 
उठा, हजरत उमर (रजि०) के पास भाग गया। हजरत उमर 
(ररज०) ने उसकी शिकायत सुनकर कहा :- 

'तुमने जो कुछ किया, उसकी सजा पाई।” 

बह यह उत्तर पाकर चकित रह गया, बोला, 'हम इतने ऊँचे 
रुत्बे के लोग हैं कि कोई व्यक्ति हमारे साथ गुस्ताबी से पेश आए 
तो उसकी हत्यां कर दी.जाती है।' 


हां, अज्ञान-काल में ऐसा ही था, लेकिन इस्लाम इस मतभेद 
को सहन नहीं कर सकता।” हजरत उमर ने जवाब दिया। 

वह झलला कर बोला, अगर इस्लाम ऐसा धर्म है, जिसमें 
कलीनों और नीच परिवारों में कोई अन्तर नहीं, तो मैं ऐसे इस्लाम 
से बाज आया' फिर वह वापस कुस्तुनतुनिया चला गया, लेकिन 
हजरत उमर (रजि०) ने उसके लिए इस्लामी न्याय में कोई 
परिवर्तन करना पसन्द न किया। 

एक बार मदीना में गवर्नरों की का्फ्रेन्स थी।. 
अमीरुलमोमिनीन ने हुक्म दिया कि अगर किसी व्यक्ति को किसी 
गवर्नर के खिलाफ़ कुछ कहना हो, तो निःसंकोच भरी सभा -में. 
शिकायत करे। इतने में एक आदमी ने उठकर कहा, कि फ्लां 
गंवर्नर ने बे-वजह मुझको सौ दुर्रे मारे हैं। हजरत उमर (रजि०) ने 
फरमाया, - उठ, अपना बदला ले।'. ु 

हजरत अम्न इब्ने आस (रजि०) ने कहा, 'अमीरुलमोमिनीन! 


]78 
।इस तरीके से तो तमाम गवर्नरों कां मानाजाता रहेगा। हजरत उमर 
(राजि०) ने फ़रमाया, फिर भी ऐसा जुरूर होगा। फिर उस व्यक्ति ने 
'कहा कि 'अपना काम कर।' आखिर हजरत अम्र इब्ने आस ने उस 
व्यक्त को इस बात पर राजी किया कि वह दो सौ ले ले और अपने 
दावे से बाज आ जाए। 

यह हजरत उमर (रजि०) का न्याय और समता का भाव ही 
था कि हजरत अम्न इब्ने आस (रजि०) ने मिस्र की जामा मस्जिद में 
मिम्बर (आसन) बनाया तो लिख भेजा कि, क्‍या तुम यह पसन्द: 
करते हो कि और मुसलमान नीचे बैठे हों औ तुम ऊपर बैठो?” 

एक बार हजरत उबई इब्न काब से किसी मामले में मतभेद 
हो गया। हजरत जैद इब्न साबित के यहाँ मुकदमा पेश हुआ।: 
हजरत उमर (राजि०) जब हाजिर हुए तो उन्होंने सम्मान में जगह 
खाली कर दी। हज़रत उमर (रजि०) तुरन्त बोले, यह पहला 
अन्याय है, जो तमने इस मुकदमे में किया।' यह कह कर अपने 
फरीकु के बराबर बैठ गए। 

हजरत उमर (रजि०) का यह नियम था कि हर दिन सुबह के 
वक्‍त वे लोगों की शिकायतें सना करते थे। यह इसलिए कि कुछ 
लोग दसंरों के सामने आपनी शिकायतें पेश नहीं कर सकते। हरेक 
से अकेले में मुलाकात करते और जिस क्रम से लोग आते, उसी क्रम 
से उनसे मलाकात की जाती। एक दिन अरब कबीलों के कुछ 
प्रतितिष्ठठ जन कछ कहने के उद्देश्य से हाजिर हुए। उनसे पहले . 
कछ गलाम भी इसी उद्देश्य से हाजिर हुए थें। अमीरुलमोमिनीन ने 
उसी क्रम से गलामों को पहले मुलाकात का मौका दिया। प्रतिष्ठित 
जनों को शिकायत हुई कि गुलामों पर उनको प्रमुखता दी गईं है। 
मगर आपने कहा, इस्लाम की दृष्टि में दास और स्वामी .सब 
बराबर हैं, इसलिए'कीई अन्तर नहीं किया जा सकता।' वे कहां 
करते- 


7 [79 


स्वामी और दास में अन्तर करना मानवता में बिगांड़ प्रैदा 
करना है और यही एक बुरी चीज है, जिसको मिटाने के लिए प्यारे 
नबी (सल्ल०) भेजे गए थे। 


अल 


' भाई-भतीजावाद के खिलाफ 


जहां हजरत उमर (राजि०) की नीति सबको समान दृष्टि और 
निष्पक्ष भाव से देखने की थी, वहीं आप भाई-भतीजावाद के भी 
बहुत खिलाफ़ थे और कोई एक काम भी ऐसा करना पसंन्द नहीं 
करते थे, जिससे भाई-भतीजावाद का ज॒रा-सा भी संदेह हो सफे। 
आप ने आदेश दे रखा था कि आपके कुबीले के लोगों को कभी कोई 
पदाधिकारी न बनाया जाए। अगर उनमें से कोई सरकारी नौकरी 
करना भी चाहे तो उसको अरब से बाहर जाना होगा। इसके अलावा 
गवर्नरों की हमेशा तब्दीलियां करते रहते, प्रभावपूर्ण व्यक्तियों को 
अरब के बाहर न जाने देते। एक बार हजरत अब्दर्रहमान इब्ने 
औफ़ ने इसका कारण पूछा,तो'फ़रमाया, इसका उत्तर न देना ही 
बेहतर है। 

एंक बार युद्ध में प्राप्त शत्रु का कुछ माल आया, आपकी 
सुपुत्नी और प्यारे रसूल (सलल०) की धर्म-पत्नी हज़रत हफ्सा को 
खबर हुईं! वह अमीरुलमोमिनीन हजरत उमर (रजि०) के पास 
आई. और कहा, अमीरुलमोमिनीन! इसमें से मेरा हक मुझे दे 
दीजिए, क्योंकि मैं जविल कुर्बा (करीबी रिश्तेदार) हूं। आपने कहा 
ब्रेशक तुम मेरे हिस्से में से ले सकती हो, मगर यद्ध में प्राप्त शत्र कै 
माल में से जविल कूर्बा (रिश्तेदार-नातेदार को देने) का प्रश्न पैदा 
नहीं होता। आपने अपनी बेटी को समझा-बुझा दिया और वह 
बेचारी परेशान होकर चली गई। 

सीरिया की विजय के बाद कुँसरे रूम (रूमी सम्राट) से मैत्रीपूर्ण 


ज्ा80. | + 
संबंध स्थापित हो गए. थे और पत्न-व्यवहार रहने,लगा था। एक 
बार उम्मेकलसूम (हजरत उमर (तक ) की पत्नी) ने साम्राज्ञी को 
इत्र की कछ शीशियां भेजीं। इसके उत्तर में शीशियों को. , 
जवाहरात से भरकर भेजा। :हजरत उमर (रजि०) को यह हाल 
मालम हआ तो फरमाया, यद्यंपि इत्र तुम्हारा था, लेकिन जो दूत 
इन्हें लेकर गया था, वह सरकारी था और उंसका ' खर्च आम 
आमदनी में से अदा किया गया। तात्पर्य यह कि वे जवाहरांत लेकर 
-बैतलमाल में दाखिल कंर दिए गएं और उनको कुछ मुओंवज़ा दे' 
दिया गया। ' * 
बैतुलमाल (राजकोष) से कुछ लेने-देने में हजरत उमर - 
(रजि०) अत्यधिक सावधानी दिखाते थे। एक बार बीमार पड़े, 
लोगों ने इलाज में शहद तजंबीज किया और शहद सरकारी खजाने. 
_ में.मौजूद था। मस्जिदे नबवी में जोकर लोगाँ से कहा कि अगर आप 
इजाजत दें तो बैत॒लमांल से थोड़ा-सा शहदं ले लूं और जब इजाजत 
मिल गई तभी आपने शहद इस्तेमाल किया। इस पूरी कार्रवाई से 
जहां, आपका उद्देश्य इजाजत हासिल करना था वहीं यह बताना भी 
था कि सरकारी खजाने पर वक्‍त के खलीफ़ा को मनमानी करने का 
कछ भी अधिकार नहीं। * 
जनता की सुख-सुविधा प्रंर विशेष ध्यान 
.. हजरत उमर .(रजि०) ने अपने शासन-काल में इसका विशेष 
प्रबन्ध किया था कि राज्य का कोई भी व्यक्ति भुखमरी का शिकार 
न हो। सार्वजनिक आदेश था और उसका सदैव पालन भी होता रहा 
कि देश में जितने भी अपंग, कमजोर और बूढ़े हों, सबको सरकारी 
खजाने से पेन्शन दी जाए। 'जनता सुखी रहे' इसके लिए आपने 
अधिकांश नगरों में मेहमानखाने बनवा रखे थे, जहाँ मुसाफिरों को 
सरकार की ओर से खाना मिला करता था। मदीना के मेहमानख़ाने 0! 
में तो आप प्रायः स्वयं जाकर अपनी निगरानी में खाना खिलवाते। 


॥8] 

लावारिस बच्चों की देख-भाल और खान-पान का प्रबन्ध भी 
सरकार. की ओर से होता था। यतीमों का पालन-पोषण और 
तिगरानी भी सरकार के कर्त्तव्यों में से एक था। 

सन्‌ [8 हि० में जब अरब में अकाल पड़ा, तो आपने सरकारी 
तौर पर जो प्रबन्ध किया, उससे आपकी कर्त्तव्यपरायणता और 
जनता की सुख-सुविधा पर दिए जां रहें विशेष ध्यान को समझा जा | 
सकता है। सबसे पहला कोम आपने यह किया कि अकाल का 
मुकाबला करने के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया, फिर 
सभी राज्याधिकारियों को आदेश दिया कि हर ओर से अरब प्रांत को 
अन्न की सप्लाई तेजी के साथ की जाए। फलत: हजरत अबू उबैदा 
(रजि०) ने चार हज़ार ऊंट, अनाजों से लद्दे हुए भेजे। हजरत अग्र 
इब्नुल आस (रजि०) ने लाल सागर के रास्ते से 20 जहाज गृल्ले से 
लंदे 'हुंए भेजे। हज़रत उमर (रजि०) इन जहाजों के निरीक्षण के | 
लिए स्वयं बन्दरगाह तंक गए, जिसका नाम जार था, जो मदीना से 
तीन मंज़िल दूर है। अन्न के अलावा मांस की सप्लाई भी सरकारी 
स्तर पर बराबर होती रही। वह हर समय इस कोशिश में रहते कि 
जनता को कोई कष्ट न होने पाएं। रातों को सफ़र करते, मसाफिरों 
से हालात पूछते, शिष्टमंडल आते और निः:संकोच भाव से वे अपनी * 
शिकायतें रखते, उन्हें दूर करने की तुरन्त कोशिश करते, फिर भी . 
हजरत उमर (रजि०) को इन.कोशिशों से तसल्‍ली न होती और 
बेचैन रहते कि शायद लोगों के असली हालात उनके कान तक-नहीं 
पहुंचने पा रहे हैं। 


इसी बात को दृष्टि में रखते हुए आपने फैसला किया कि समचे._ 


देश का दौरा करें और लोगों के हालात सुनकर उत्तकी परेशानियां 
दूर करने की कोशिश करें, लेकिन मौत ने महलत न दी, फिर भी 
सीरिया प्रदेश का दौरा आपने किया। .एक जिले में गए, लोगों की 
शिकायतें सुनीं और उन्हें दूर करने की-क्रोशिश की। 


82 

वापसी के समय रास्ते में एक खेमा देखा। इजाजत लेकर खेमे . 
के अन्दर॑ गए। एक जुढ़िया औरंत दीख पड़ी पूछा, 'उमर का कुछ 
हाल मालूम है? 

हां, सीरिया से चल चुके हैं, लेकिन खुदा उंसे गारत करे, आज 
तक मझंकी उसके यहां से एंक दांना तक नहीं मिला है।  बुढ़िया ने 
झुंझलांकंर कहा। , 
. « «लेकिन इतनी दर का हाल उमरं को कैसे मारलम हों सकता 
हैं? उमर ने पूछा। - , 


जब उसे जनंता का हाल मालमं नहीं.तो खलीफा क्‍यों बन 
बैठा है?' बढ़िया ने खीज़ कर, उत्तर दिया। हि 

इस बात से हज़रत उमर (रजि०) इतने प्रभावित हुए कि 
रोते-रोते-उनकी हिचकी बंध गई । फ़िंरं उंसका वजीफ़ा तय कर 
दिया गैया। 3 
एंक बार काफ़िला मदीना में आया और .शहंर के 'बाहर 
उतरा। उसकी देख-भाल और हिफ़ाजत के लिए खुद तश्रीफ़ ले 
गए। सनते क्या हैं कि एक खेमे से बच्चे के रोने.की आवाज आ रही 
है।. मां को जाकर संमझाया कि बंच्चे कों रूलाओ नहीं, बंहलाओ। 
थोड़ी देरं बादं फिर उंधर से गुंज़रें तो बच्चा अब भी रो रहा था। - 
क्रोध आ गया, बोले, 'त॑ बड़ी निर्दयी माँ है, आंखिर बच्चे को चुप 
क्‍यों नहीं कराती। 

तंम को सच्ची बात तो.मालूम नहीं, खामखाही मुझे आंखें 


दिखा रहे हो। बात यह है कि उमर (रजि०).ने आदेश निकाला है. 
कि बच्चे- जब तक दध न्‌ छोड़ें,.बैतलमाल. से उनेका वजीफा न. 


म॒क्रर किया जाए में इसी उद्देश्य से इंसका दूध छड़ा रही हूं और 
यह- है कि रोएं जा रहा हैं।' औरत. ने समझा कर कहा। 


यहं सुर्न करे हजरत उमर (रंजिं०) अंबाक्‌ रह गेंए। सोचने 


[83 

लगे, 'हाय उमर ने इस तरह तो न जाने कितने बच्चों का खून किया 
होगा?” सोचते-सोचते दिल भर आया, आँखें भीग ' गईं, अश्र-धारा 
बह निकली, वापस हए तो उसी वक्त ऐलान करा दिया कि बच्चे 
जिस दिन से पैदा हों, उसी दिन से उनका वजीफ़ा बांध दिया जाए 

सूखे के समय में आपः रात को मदीना की पास-पड़ोस की 
आबादियों तक जा निकलते। एक रात मदीना से तीन मील के 
फासले पर आपने देखा कि एक औरत कछ पका रही है और 
दो-तीन बच्चे रो रहे हैं। पास जाकर वास्तविकता का पता लगाया, 
तो मालूंम हुआ कि कई वक्‍त से .बच्चों को खाना नहीं मिला है। 
उनके बहलाने के लिए खाली हांडी में पानी डाल कर चढ़ा दिया गया 
है। हजरत उमर (रजि०) .उसी समय उठे। मदीना आकर 
बैतुलमाल से आटा, गोश्त, घी और खजूरें लीं और अपने दास 
,असलम से कहा, मेरी पीठ पर रख दो। असलम ने कहा, मैं लिए: 
चलता हूं। फ़रमाया, हां, लेकिन 'क़यामत.- में मेरा बोझ तुम नहीं 
उठाओगे। तात्पर्य यंह कि सब चीजें खुद लाद कर ले आए और 
'औरत के आगे रख दीं। उसने आटा गुंधा, हांडी चढ़ा दी। हजरत 
उमर (रज्०) खुद चूल्हा फंके जाते थे। खाना तैयार हुआ तो बच्चों 
ने खूब पेट भर कर खाना खाया और उछलने-कूदने लगे। हज़रत 
उमर (रज़ि०) देखते थे और प्रसन्‍न॑ होते थे। औरत ने कहा, खुदा 
तुमको अच्छा बदला दे, सच यह हैं कि अमीरुलमोमिनीन (खलीफा) 
होने योग्य तुम हो, न कि उमर (रजि०) 

एकं बार रात को हजरत उमर (रजि०) गश्त लगा रहे थे। 
एक बदूंदू खेमे से बाहर जुमीन पर बैठा हुआ था। पास जाकर बैठ 
गए और इधर-उधर की बातें शुरू कर दीं। अचानक खेमे से रोने 
की आवाज आई। हजरत उमर (र्राज०) ने पूछा, कौन रो रहा है?” 
उसने बताया; पत्नी है, जिसे प्रसव-पीड़ा हो रही है। हजरत उमर 
(ररजृ०) घर वापस ओ गए और हजरत उम्मे कंलसूम (पत्नी) को 


484. 


साथ ले लिया। बदद से इजाजुत लेकर उम्मे कलसूम को खेमे में 

भेज दिया। थोड़ी देर बाद बच्चा पैदा हुआ। उम्मे कुलसूम ने हजरत 

उमर (रजि०) को पुकारा, अमीरुलमोमिनीन अपने दोस्त को 

मबारक बाद दीजिएं।' अमीरुलमोमिनीन का शब्द सुनकर बददू 

चौंक पड़ा और आदरपूर्वक बैठ गया। हजरत उमर (रजि०) ने 

फरमाया कि, नहीं कछ ख़योल न करो, कल मेरे पास आना, मैं इस 
बच्चे का वजीफ़ा तय कर दूंगा। 


अर्ब्दरहमान इब्न औफ़ का बयान है कि एक बार हंज़रत 
उमर (र्राजु०) रात को मेरे मकान पर-आए। मैंने कहा, आपने क्‍यों . 
कष्ट किया, मझे बला लिया होता।फ़रमाया कि अभी मुझे मालूम 
हआ कि शहर से बाहर एक काफिला उतरा है, लोग थके-मांदे 
होंगे, आओ हम तम चलकर पहरा दें। अतः दोनों गए और रात भर 
पहरा देते रहे। 
जिस वर्ष अरब में अकाल पड़ा, उनकी विचित्र स्थिति हो गई ' 
थी। जब तक अकाल रहा, मांस घी, मछली, तात्पर्य यह कि कोई. 
स्वादिष्ट वस्त न खाई। बहत गिड़गिड़ा-गिड़गिड़ा कर दुआएं मांगते 
थे कि ऐ खुदा! मुहम्मद (सल्ल०) की उम्मत (अनुयायियों) को मेरे 
: आमाल की शामत से तबाह न करना। असलम, उनके दास का 
बयान है कि 'अकाल के समय में हज़रत उमर (रजि०) को जो 
चिन्ता रहती थी, उससे अन्दाजा.किया जा सकता थां कि अगर 
अकाल दर न हआ तो वह इस गम में तबाह हो जाएंगे। अकाल ही 
: के दिनों में एक बदूदू उनके पास आया और उसने निम्न पद प्ढ़े :- 
हे उमर (राज०)! मज़ां अगर है, तो जन्नत का मजा है। मेरी 
लड़कियों को और उनकी मां की कपड़े पहना। खुदा की कृसम! तुझ 
को यह करना होगा। पे 
और मैं तम्हारी बात न पूरी. कर सकं तो क्‍या होगा? 


85 

तुझ से" कयामत में मेरे बारे में प्रश्न होगा और त 
हकक्‍्का-बकका रह जाएग़ा। फिर या दोजख की ओर या बहिश्त की 
ओर जाना होगा। 

हजरत उमर (रजि०) इस पर इतना रोए कि दाढ़ी तर हो 
गईं। फिर द्वास से कहा कि मेरा यह कर्ता उसको दे दो, इस वक्‍त 
उसके सिवा और कोई चीज मेरे मास नहीं। , 

एक बार रात को गश्त कर रहे थे। एक औरत अपने कोठे पर 
बैठी ये पद पढ़ रही थी :- 

रात काली है और लम्बी होती जा,रही है और मेरे पहल में 
शौहर नहीं, जिससे रति-क्रीड़ा करू। 

उस औरत का शौहर जिहाद पर गया था और बह उसकी 
जुदाई में यह दर्द भरे पद पढ़ रही थी। हजरत उमर (रजि०) को 
बड़ा दुख हुआ कि मैंने अरबी औरतों पर बड़ा अत्याचार किया। 
हजरत हफ़्सा (राजि०) के पास आए और पूछा कि औरत मर्द के 
बिना कितने दिन तक रह सकती है। उन्होंने कहा, 'चार महीने 
सुबह हुई तो हर जगह हुक्म भेज दिया कि कोई सिपाही चार महीने 
से ज़्यादा बाहर न रहने पाए। - 


86 


आदर्श चरित्र. /: 


एक बार प्यारे नबी हजरत (सल्ल० ) ने फ़रमाया, मैंने एक 
सपना देखा है कि अबृबक्र (ररज०),उमर (राज) और मैं एक कुएं 
पर मौजद थे। पहले उस कएं से मैंने बहुत-सा पानीं निकाला, फिर 
अबूबक़ (र्राजु०) ने। मगर उन्हें पानी निकालने में बड़ी कठिनाई 
हुई, लेकिन उमर (र्राजु०) ने उसी क॒एं से इतना पानी निकाला कि 
परा जंगल पानी से भर उठा। 
यह थी हजरत उमर (र्राज०) के बारे में प्यारे नबी (सल्ल०) 
की भविष्यवांणी, जो बाद में साकार हुईं। हज़रत उमर (रजि०) एक 
* ऐसा व्यापक व्यक्तित्व रखते थे कि, वह एक ही समय में योद्धा भी 
थे, प्रशासक भी, हाकिम भी थे, काजी भी, सामाजिक जीवन तो 
जैसा कछ था, था ही, निजी. जीवन' भी. एक आदर्श जीवन था- 
आदशं चरित्र, आदर्श आचरण। 
हजरत उमर (राजि०) उच्च श्रेणी के वक्ता भी थे, 
भाषण-कला में प्रवीण। शब्दों का चयन-गठन सुन्दर, आवाज 
जोरदार और रोबदार, इसीलिए तो क्रैश ने उन्हें दूत पद पर 
आसीन कर रंखा था। आपकी कलम में भी काफी जोर था और जब 
लेखनी चलती तो भाव धारा-प्रवाह व्यक्त होते चलते। शब्दों का 
गठन, सशक्त भावाभिव्यक्ति औरं-अलंकृत भाषा, उनके लेखा की 
प्रमख विशेषता थी। उन्होंने गवर्नरों को जो पत्र लिखे हैं, उन्हें 
पढ़कर इसीलिए एक व्यक्ति चकित रह जाता है। 
कविता लिखने-पढ़ने के बारे में यर्याप यही मशहूर है कि वे 


487 

“कवि' नहीं थे, लेकिन इस पर सभी सहमत हैं कि उनके समय में 
उन से बेहतर कविताओं का पांरखी कोई और न था। उन्हें अंरब के. 
अधिकांश प्रसिद्ध कवियों की कविताएं याद थीं और हरं.काव के बारे 
में साहित्यिक दृष्टि से उनकी अपनी रायें भी थीं।-अच्छे पद सनते : 
थे, तो बार-बार मजे ले-लेकर- पढ़ते और दहराते. जाते थे। 

.. हजरत उमर (राजि०) वंशार्वालयों को याद-रखने में दक्ष थे। 
लिखनो-+पढ़नां तो जानते ही थे। मदीना पहंच कर इब्रानी भाषा भी 


: सीख ली थी। उन्होंने यह भाषा मभदीनां में यहूदियों से सीखी थी। 


एंक बार -वे प्यारे नबी (सलल०) को तौंरात से. कछ पढ़ कर सना 
रहे थे। हुजूर को यह देखकर बड़ा आश्चरय हुआ कि हजरत उमर 


. (रजि०) इब्रानी भाषों में कितने दक्ष हैं कि बिना किसी-अवरोध के- 


तौरात पंढ़ं सकते हैं। वे प्रायः यहाँदयों के मुहल्ले में आया-जाया 
करते थे और उनका तौरात-पाठ सुनते थे। यहूदी कहा करते थे कि 
हजरत उमर (रराज़०) हमकों संब से ज़्यादा अज़ीज़ हैं, क्योंकि वे: 


, हमारे दिलों से बहुत करीब हैं। 


: हजरत उमर (र्रज़०) के नीतिपरक कथन तो आज कहावतें 
बन गयीं हैं जैसे- 
. जो व्यक्ति अपना रहस्य छिपाता है, वहे अंपना अधिकार 
अपने हांथ. में रखता है। 5 ५ 9.२२, 

जिंससे तुम॑ की घृणा हो, उसंसे डरते रहो।' 

“आज का काम कल पर न उठा रखो! 

. जो चीज़ पीछे हटी, फिर आगे नहीं बढ़ती। 
“जो व्यक्ति बुंराईं को बिल्कल नहीं जानता, वह बराई में 


* जरूर पड़ जायेगा। 


-,. जब कोई मुझ से पूंछता है, तो मुझे उसकी बुद्धि का अन्दाजा 
हो जाता है। ह 


लोगों की चिन्ता में तुम अपने को भूल न जाओ। 
दिया थोड़ी-सी लो तो स्वतंत्र-जीवन- बिता सकोगे। 
'तौैबा की तकलीफ से गुनाह छोड़ देना अधिक सरल है। 
“अगर सब्र व शक्र दो सवारियाँ होतीं, तो मैं इसंकी न परवाह 
करता कि दोनों में से किस पर सवार हूं।'. 

खां: उस व्यक्ति का भंलां करे जो मेरे ऐंब मेरे पास तोहफे में 
भेजता है।' (अर्थात मुझ पर मेरे-ऐब जाहिर करता है) 
सझ-बूझ के व्यक्ति हे ० 

एक अल्लाह पर ईमान किसी भी व्यक्ति में सूझ-बूझ पैदा कर 
देता है। हजरत उमर (र्राज०) में सूझ-बूझ अपनी चरम सीमा को 
पहंची. हई थी। हजरत .अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रजि०) फरमाया 
करते थे कि उमर (रजि०) किसी मामंले में यह कहतें कि. 'मेरा 
इसके बारे में यह विचार है, तो प्राग्रः होता वही था, जो उनका: 
विचार होता। इससे अधिक सूझ-बूझ के उदाहरण और क्या हो 
सकते हैं कि उनकी बह॒त सी रायें 'धर्म-आदेश' बन गई हैं। नमाज 
* की अजान हजरत उमर (रजि०) की सूझ-बूझ का ही परिणाम है। 
पर्दे के आदेश हंजरत उमर (राजु०) के मतानुसार उतरे थे। 
मुनाफिकों (कपटाचारियों) पर नमाज-जनाजा न पढ़ने का आदेश * 
हजरत उमर की राग्र के मुताबिक्‌ था। हजरत उमर (रजि०) की ही . 
राय थी कि करआन का संकलन वजूद में आया। जब यह समस्या 
पैदा हुई कि हजरत उमर के बाद कौन खलीफा बनेगा और कुछ 
लोगों के नाम विचाराधीन आए -तो हजरत उमर (रजि०) ने पूरे 
विस्तार में हरेक के बारे में अपना मत व्यक्त किया और वह पूरे का. 
प्रा सही निकला। वह हर कार्य में सोच-विचार को काम में लाते थे 
और जाहिरी बातों पर भरोसा नहीं करते थे। उनका कथन था कि, 
पंक्सी की प्रसिद्धि या.ढिढोरी सुन कर धोखे में न आओ। ' अक्सर . 
कहा करते थे- 'किसी भी व्यक्ति के नमाज-रोजा पंर न जाओ 


89 
बल्कि उसकी सच्चाई और-बुद्धि को देखो।' 
. एक बार एक व्यक्ति ने उनके सामने किसी की प्रशंसा की। 
फ़रमाया 'तुम से कंभी मामला पड़ा है?” 
नहीं। 'उसने कहा। 
कभी सफ़र में साथ हुआ है?' पूछा। 
'नहीं। उसने उत्तर दिया। 
'तो, तुम वह बात कहते हो, जो जानते नहीं।' हज़रत उमर 
(रजि०) ने कहा। - 


धार्मिक जीवन 


दिन को राज्य-संचालन के कार्यों में इतना व्यस्त रहते कि 
बहुत कम सांस लेने की फूर्सत हो पाती, इसलिए इबादत का समय 
रात को निर्धारित किया था। रात में ज्यादा से ज्यादा नमाज पढ़ने का 
आपने चलन बना लिया था। सुबह होते ही घर वालों को जगा देते। 
फद्ध की नमाज में बड़-बड़ी सूरतें पढ़ते। नमाज जमाअत के साथ 
पढ़ना पसन्द करते और कहा करते, मैं इसको तमाम रात की 
इबादत पर प्रधानता देता हूं। | 
'फूर्ज रोज़ों के अलावा नफ़्ली रोजों का ध्यान हमेशा रखते।हज 
हर साल करते और खुद ही मीरे काफिला (कारवां के सरदार) 
रहते। 
क़यामत की पकड़ से बहुत डरते थे और हर वक़्त इसका _ 
ख़याल रहता था।'सही बुखारी"में है कि एक बार हजरत अब मसा 
अशभअरी (रजि०) की सम्बोधित कर के कहा कि क्‍यों अबू मूसा! 
तुम इस पर राजी हो कि हम लोग जो इस्लाम लाए और।हजरत की 
और प्यारे रसूल (सल्ल०) की सेवा में सदा हाजिर रहे, इन तमाम 
. बातों का बदला हमको यह मिले कि बराबर-बराबर छूट जाएँ, 
यानी न हमको अज़ाब मिले, न सवाब? 


490: ६ 
हजरतं अबू मूसा (राजि०) ने कहा, 'नहीं,मैं तो इस पर हरगिजु 
' राजी नहीं। हमने बहुत-सी नेकियां की हैं और हम को बहुंत कुछ 
आशाएं हैं। 
हजरत उमर (राजि०) बोले, 'उस हस्ती की कृसम! जिस के 
हाथ में. उमर की जान है, मैं तो सिर्फ इतना ही चाहता हूं कि बिना 
किसी पकड़ के छूट जाऊं। 
हजरत उमर (रजि०) यद्यपि इस्लाम धर्मःके मूर्तिमान थे; 
लेकिन उनमें साम्प्रदायिक द्वेषं व घृणा नाममात्र को भी न थी। यही 
कारण है कि वे -मरंते-मरते भी अपनी ईसाई व ग्रहूदी प्रजा को न 
भूले और उनके प्रति दया व कृपा का व्यवहार अपनांने की ताकीद 
आप शरओ मामलों में उसकी तह तक पहुंचने की. कोशिश 
करते, कुरआन. के शब्दों की आत्मा को समझतें। एक दिन-बदरी 
सहाबी (प्यारे नबी सल्‍ल09) :के वे. साथी, जो बदर- की. लड़ाई में 
शरीक (हुए थे) मज़्लिस में जमा थे। हजरत उमर (रजि०) ने पूछा, 
इज़ा ज़ाअ नसरुल्लाहे वल्‌ फंत्हो' (जब अल्लाह .की मदद और 
फतह आ गई.) से क्‍या तात्पयं है? | 
किसी ने कहा, अल्लाह का हुक्म है कि जब विजय मिले, तो 
हम खुदा का शुक्र बजा लाएँ। ' कुछ बिल्कूल चुप रहे। हज़रत उमर 
(रजि०) ने हजरत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास की ओर देखा। उन्होंने . 
कहा, इसमें प्यारे नबी के देंहावसान की ओर संकेत है। हजरत उमर - 
(रजि०) ने फरमाया, जो -तुम ने कहा, यही मेरा भी ख़याल हैं। 
अल्लाह के रसूल (सलल०) का आदर-सम्मान उन के मन व. 
मस्तिष्क में रचा:बसा था; और -इसी कारण हुजूर (सल्ल०) के, 
रिश्तेदारों का बड़ा ध्यान-रखते थे। जब सहाबियों के वर्जीफे तय .. 
होने लगे, तो हज़रत उमर (रजि०) ने इस प्रस्ताव को रह कर दिया 


9] 
कि आपके वजीफ़ को किसी प्रकार की प्रमुखता दी जाए।फ़रमाया 
सबसे पहले प्यारे नबी (सलल०) के ताललुक की दृष्टि से वजीफे तय 
किए जाएं 
*: सादा जीवन, उच्च विचार 
हजरत उमर (रजि०) के जीवन और उनंके रोब व दबदबे का 
.एक ओर हाल यह है कि रूम व सीरिया पर लड़ाई के लिए सेनाएँ 
भेजी जा रही हैं, कैसर व किसरा (रूमी व ईरानी सम्राट) के दतों से 
मामला पेश हैं, खालिद व अमीर मुआविया जैसे योद्धाओं से जवाब- 
तलबी हो रही है, हज़रत साद इब्ने अबी वकक्‍्क़ास, अबू मूसा 
: अशभअरी, अम्न॑ इब्नुल आस को आदेश लिखे जा रहे हैं, लेकिन 
अपना हाल यह है कि देह पर बारह पैवन्द का कर्ता है, सिर पर 
. फटी-सी पगड़ी है पाँवों में टूटे हुए जूते हैं, फिर इसी हालत में या तो 
' कंधे पर मश्क लिए' जा रहे हैं कि विधवाओं के घर पानी भरना है 
या मस्जिद के किसी कोने में, फर्श ही पर लेटे हैं, इसलिए कि काम 
करते-करते थक गए. हैं और नींद की झपकी आ गई: है। 
बार-बार मक्का से मदीनां तक यात्रा की, लेकिन खेमा या 
'शामियाना कभी साथ नहीं रहा। जहां ठहरे, किसी पेड़ पर चादर 
डाल दी और उसी के साए।में पड़ें रहे। इब्ने साद (रजि०) का कथन 
है कि उनका रोज़ानां का खर्च दो दिरहम था, जो इस समय मुश्किल 
से पैंसठ पैसे पड़ता है। । 
एक बार अहनफ़ इब्ने कैस अरब के सरदारों के साथ उनसे 
मिलने को गए, देखा तो दामत्र/चढ़ाए, इधर-उधर दौड़ते-फिरते हैं। 
अहनफ़ को देख कर कहा, आओ तुम भी मेरा साथ दो। बैतुलमाल 
का एक ऊंट भाग गया है। तुम जानते हो, एक ऊंट में कितने गरीबों 
का हक्‌ शामिल है। एक व्यक्ति ने कहा, अमीरुल मोमिनीन! आप 
क्यों कष्ट सहन करते हैं? किसी दास को हुक्म दीजिए, वह ढूँढ॑ 


म 92 
लाएगा। फरमाया, 'मुझंसे बढ़ कर कौन दास हो सकता है?' 
हजरत उमर (रजि०) ने सीरिया की यात्रा की तो शहा के. 


करीब पहुँच कर जरूरत पूरी करने के लिए सवारी से उतरे। उनका - , - 


दास असलम भी साथ. था। फारिग हो कर आए तो भल कर या 
किसी मसलहत से, असलम के ऊंट पर सवार हो गए। इधर 
सीरियावासी स्वागत के लिए आ रहे थे। जो आता था, पहले की 
ओर रुख कर लिया करता था। वह हजरत उमर (रजि०) की ओर 
इशारा करता था। लोगों को आश्चर्य होता था और आपस में 
कानाफूसी करते थे। हज़रत उमर (रजि०) ने फ़रमाया कि उनकी 
निगाहें शान व शौकत ढूंढ रही हैं, वह यहां कहां? 

एक बार खुत्बे में कहा कि लोगो! एक समय में, मैं इतना . 
निर्धन था कि लोगों को पानी भर कर ला दिया करता था। वे इसके 
बदले में मुझे छोहारे देते थे, वही खाकर बसर करता था। इतना कह 
कर मिम्बर से उतर आए। लोगों को आश्चर्य हुआ, यह मिम्बंर पर 
कहने की क्याबात'थी ?फ़रमाया कि मेरी तबीयत में तनिक गर्ब पैदा 
हो गया था, यह उस की दवा थी। 

सन्‌. 23 हि० में हज यात्रा की। यह वह समय था जब उनका. ' 
रोब व दबदबा चरमोल्कर्ष को पहुंचा हुआ था। हजरत सईद इब्नल 
मसस्यिब, उनके साथ थे। उनका बयान है कि हजरत उमर 
(रज०) जब अबतह में पहुंचे तो कंकड़ियों को समेट कर उस पर 
कपड़ा डाल दिया और उसको तकिया बना कर फर्श पर लेट गए।' 
फिर आसमान की ओर सिर उठाया और कहा- हे खुदा! मेरी उम्र 
अब ज्यादा हो गई और शक्ति घट गई, अब मुझको दुनिया से उठा 
ले4 

सामान्य रूप से अमीरुल मोमिनीन का भोजन जौ की रोटी 
और जैतून का तेल था। रोटी कभी-कभी गेहूं की भी हुआ करती 


* 493 है 
थी, लेकिन आटा छाना नहीं जाता था। सूखे के. दिनों में जौ अपने 
लिए अनिवार्य कर लिया था। दस्तरखान पर कभी-कभी ग्रोश्त भी 
. आ.जाता। दूध तरकारी और सिरका भी कभी खाने में आ जाता। 
पहनावा भी बहुत सादा था। प्रायः कर्ता और तहबन्द ही 
पहनते, सिर-पर अक्सर एक विशेष प्रकार की टोपी ओढ़े रहते, - 
जिसे ब्रनस कहते हैं। एक बार कुछ लोग आपसे मिलने के लिए 
आए और बाहर खड़े इन्तिज़ार करते रहे। आयंको घर से निकलने 
में! कुछ देर हो 'गईं:। पता लगाने पर मालम हुआ कि कपड़ों को धो 
कर धूप में डाल रखा था और इन्तिज़ार कर रहे थे कि सूख जाए तो 
'उन्हें पहन कर-बाहर आएं 
हजरत उमर (रजि०) का.जीवन बहुत ही सादा था। कपड़ों में." 
अक्सर पैवन्द लगा होता। लेकिन इन तमाम बातों से यह विचार 
नहीं करना चाहिए कि वे सन्‍्यास और संसार-त्याग के जीवन को 
पसन्द करते थे। एक बार एक व्यक्ति जिसे उन्होंने यमन का गवर्नर . - 
नियुक्त कर रखा. था, इस तरह उनसे मिलने आया कि देह पर अति 
मूल्यवान बस्त्र थे और बालों में खूब तेल पड़ा हुआ था। हज़रत 
उमर (रजि०) अति क्रूद्ध हुए और उन कपड़ों को.उतरबवा, उन्हें 
मोटा-झोटा कपड़ा पहना दिया। दूसरी बार. फिर मिलने आयां तो 
परेशान हाल, बिखरे बाल और फटे-पुराने कपड़े पहन कर आया। 
फर्माया कि यह भी अभिप्रेत नहीं कि मनुष्य बेहाल घमता रहे। 
साढ़े दस साल .का शासन-काल 
हजरत उमर (र्रज०) ने लगभग साढ़े दास साल खिलाफ़त की 
और इस छोटी-सी मुहृत में अपूर्व उदाहरण प्रस्तत किया। आपने 
बैतुलमाल खोला, अदालतें कायम की, काजी मुक्रर किए, तारीख 
. और सन्‌ जारी किया, जो आज तक जारी है, फौजी दफ्तर तरतीब 
दिया, वार्लान्टियरों के वेतन निश्चित किए, दफ़्तरे माल कायम 
कियां, पैमाइश 'जारी की, जनगणना कराई, नहरें ख़दवाई नए 


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- शहर जैसे कूफ़ा बसरा, जंजीरा, फिस्तात और मूसल आदि आबाद 
किए, अधिकृत देशों को प्रान्तों' में विभाजित किया, उश्च' मुकुरंरं 
किया, जेलखांनां कायम किया, कोड़े का इस्तेमाल किया, रातों को 
गश्त लगाकर जनता की हालत जानने का तरीका निकाला, 
पलिस-विभोगं स्थापित कियां, फ़ौजी छाव॑तियां कायम कीं, सराएँ 
बनवाई', अनाथालयं बनवाए, बच्चों के व॑जीफे तय किए, 


'शांसन-काल इस्लामी ईतिहास का स्वर्णिम युग़ थां, एक आदर्श 
युगं।. गा 

अमीरुल मोमिनीन हजरत उमर (राजु०) के सात बेटे थे-- 
(!) हजरत अब्दुल्लाह (2) हजरत उबैदुल्लाह (3) हजरत आसिम 
(4) हजरत .अबू- शहमा (5) हजरत .अब्दुर्रहमान (6) 
हजरत जैद (7)-हंजरत मुजीर (रजि०)। इनमें से पहले तीन अधिक 
प्रसिद्ध हूंए हैं। हजरत अब्दुल्लाह तो फिक्ह (धर्मशास्त्र) और हदीस 
के विशेषज्ञ समझे जाते हैं। उन्होंने अपने पिता के साथ मक्का ही में 
इस्लाम कबूल किया थां। हज॒रतं मुहम्मद (सलल०) के साथ  . 
बहत-सी लड़ाइयों में भी शरीक हुए. थें। जंब अमीर -मुआविया 
(ररज्‌०) और हंजरत अली (र्रज०) के बीच खिलाफ़त के बारे में 
अचानक झगड़ा चल रहा था, तो मुसलमानों ने हजरत अब्दुल्लाह से 

' आ कर कहा कि आप खिलाफ़॒त' पर तैयार हो जाएँ; तो यह झगड़ा 

खत्म हां जाएगा। आप॑ बोले, मैं मुसलमानों के खून से खिलाफत 
खरीदना नहीं चाहता! हे ० बे. : 
उपसंहार रे हे 

सामान्य रूप से देखा जाता है कि कछ लोगों में कुछ गण होते 


हैं, तो कुछ अवग॒ुण भी, मगर हजरत उमर (रजि०) के पूरे जीवन 
परे गम्भीर दृष्टि डालिए।तो स्पष्ट हो जाएगा-कि उस व्यक्ति मेँ 


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अवग॒णों का दूर-दूर तक पंता नहीं;। वे विश्वविजेता सिकन्दर भी 


थे और दार्शनिक अरस्तू भी, वे चमत्कारी मसीह भी थे और - 


न्यायी शासंक सुलैमान भी, वे वीर योद्धा तैमूर भी थे और 


बेहतरीन प्रशासक नौ शेरवां भी, वेः फिक्ह (धर्मशास्त्र) के इमाम 


, अबू हनीफ़ा भी थे और त्यार्गप्रिय इब्राहिम अदहम भी। सिकन्दर 
हर मौके पर अररुतू की हिदायतों का सहारा लेकर चलता था, 


अकबर के पर्दे में अबुल फ़जल और टोडरमल काम करते थे, - 


अब्बासियों की महांनता बरामका के दम से थी, लेकिन हजरत उमर 
(राजि०) को सिर्फ आत्म-विश्वास और अल्लाह का फज़्ल प्राप्त 
था। हजरत खालिद (रजु०) की चमत्कारी विजयों को देखकर 
लोगों.का विचार हो गया था कि सफलता की कंजी तो उन्हीं के हाथ 
में हैं, लेकिन जब हजरत उमर (रजि०) ने उन्हें पदच्युत कर दिया 


तो किसी को एहसास तक न हुआ कि कल में से कौन पर्जा निकल , 


गया हं। 


जब आप सीरिया की यात्रा के लिए तैयार हुए तो हलचल मंच 


गई, मगर सिवाय एक ऊंट के आप के पास कछ भी न्ञ था। 
सिकन्दर, चंग्रेज़ और नैपोलियन, जिनके साथ हजारों और लाखों 


सवार हुआ करते थे, हरीर व दीबाज के ख़ेमे उनकी शानोशौकत - 
जाहिर करने और लोगों के दिलों में रोब व दाब पैदा करने के लिए 


काफ़ी थे, जिनकी तलवारों की चमक॑ आंखों को चुंधिया देती थी, 
नेजे और बन्दूकें दिलों को-हिला देती थीं, फिर भी उनका वह रोब न 
था, जो हज़रत उमर (राजि०) का था, जिनके क्॒तों में |2-2 पैवन्द 
लगे होते थे, जो कांधे पर मश्क रख कर गरीब औरतों के यहां पानी 


भर आते थे, ऊंटों के बदन पर अपने हाथ से तेल मलते थे, पहरेदार -' 
और 'बाडी गार्ड' के नाम तक को न जानते थे। हम तो यह ज़रूर , 


कहेंगे कि बेशक हजरत उमर (रजि०) उन इन्सानों में से थे जिस 
पर मानवता भी गर्व करे, तो कम हैं।